जयंत चौधरी छूटे पर हरेंद्र मलिक को नहीं भूले अखिलेश, मुजफ्फरनगर का टिकट देकर निभाया वादा

Jayant Chaudhary was left out but Akhilesh did not forget Harendra Malik, kept his promise by giving ticket to Muzaffarnagar
Jayant Chaudhary was left out but Akhilesh did not forget Harendra Malik, kept his promise by giving ticket to Muzaffarnagar
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मुजफ्फरनगर: समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव अपनी बात पर अडिग रहे। उन्होंने मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट से हरेंद्र मलिक को एसपी का कैंडिडेट घोषित कर अपने वादे को निभाया। एक तरह से उन्होंने राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष चौधरी जयंत सिंह का साथ छोड़ना मंजूर किया, लेकिन हरेंद्र मलिक को साथ नहीं छोड़ा। दरअसल मुजफ्फरनगर सीट को ही आरएलडी और एसपी गठबंधन के टूटने की वजह माना जा रहा हैं। एसपी की ओर से मंगलवार को प्रत्याशियों की नई सूची जारी की गई। शिवपाल यादव को बदायूं, धर्मेंद्र यादव को आजमगढ़ से प्रत्याशी बनाया गया। अमरोहा से पूर्व मंत्री और विधायक महबूब अली और कैराना से इकरा हसन को प्रत्याशी बनाया गया है। बरेली से प्रवीण एरन प्रत्याशी बनाए गए।

आरएलडी से अलग हो जाने के बाद एसपी ने मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट से पूर्व राज्यसभा सांसद हरेंद्र मलिक को उम्मीदवार घोषित कर दिया है। पश्चिम यूपी की राजनीति में रसूख रखने वाले मलिक चार बार विधायक रहे और अब तक लोकसभा के भी चार चुनाव लड़ चुके हैं। एसपी-आरएलडी गठबंधन में लोकसभा के टिकट के लिए उनका नाम सबसे आगे माना जा रहा था। लेकिन आरएलडी नेता उनके नाम पर सहमत नहीं थे। इसके बाद आरएलडी गठबंधन से अलग होकर एनडीए में चला गया। एसपी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पिछले दिनों लखनऊ में जिले के नेताओं की बैठक बुलाई थी, जिसमें पूर्व सांसद के नाम पर ही भरोसा जताया गया।

मुजफ्फरनगर सीट को लेकर रालोद से हुई खटास

यूपी में चंद दिन पहले तक इंडिया गठबंधन में सपा और आरएलडी की सियासी दोस्ती सबसे मजबूत मानी जा रही थी। लेकिन सीट बंटवारे पर दोनों में खटास आ गई थी। सियासी जानकारों की मानें तो आरएलडी की तरफ से मांगी गई सीटों को देने में एसपी को कोई एतराज नहीं था, लेकिन एसपी मुजफ्फरनगर सीट नहीं देना चाहती थी। इस सीट पर दोनों ही दलों ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। चौधरी जयंत का कहना था कि 2019 में उनके पिता चौधरी अजित सिंह इस सीट से बेहद कम अंतर से हारे थे, इसलिए वह इस सीट को चाहते है। अखिलेश यादव का कहना था कि वह पहले की पूर्व सांसद हरेंद्र मलिक को मुजफ्फरनगर से चुनाव लड़ाने का वादा कर चुके हैं। इसलिए यह सीट नहीं दे सकते।

मुजफ्फरनगर सीट नहीं तो गठबंधन नहीं के हालात बन गए थे

बताते हैं कि बात बनाने के लिए कैंडिडेट हमारा सिंबल तुम्हारा का रास्ता भी रखा गया। जिसके तहत हरेंद्र मलिक आरएलडी के सिंबल पर चुनाव लड़ लें, ऐसा तय भी हो गया लेकिन चंद घंटे बाद आरएलडी खेमे में इसका कर विरोध शुरू हो गया। हालात यहां तक पहुंच गए कि मुजफ्फरनगर सीट नहीं तो गठबंधन नहीं। और जयंत चौधरी ने इंडिया गठबंधन से अलग होने का ऐलान कर एनडीए में जाने के संकेत दे दिए। जिसके बाद अब अखिलेश यादव ने अपने वादे के मुताबिक हरेंद्र मलिक को ही सपा का कैंडिडेट घोषित कर दिया। सियासी हलकों में कहा जा रहा है कि अखिलेश ने खुद के किए वादे को पूरा करने के लिए बड़ा सियासी नुकसान (आरएलडी से गठबंधन टूटने का ) उठाना मंजूर किया।

जाट-मुस्लिम समीकरण बनाने के लिए जताया भरोसा

पूर्व राज्यसभा सांसद हरेंद्र मलिक वेस्ट यूपी की राजनीति में खासा रसूख रखते हैं। मलिक चार बार विधायक रहे है। लोकसभा के भी चार चुनाव लड़ चुके हैं। राज्यसभा रहे हैं। एसपी ने वेस्ट यूपी में जाट राजनीति में मजबूत पकड़ बनाने के लिए पहले उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाया था। हरेंद्र मलिक छात्र राजनीति से निकलकर राज्यसभा तक पहुंचे। मलिक ने 1982 में बीडीसी का चुनाव लड़ा। 1985 में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने उन्हें खतौली से टिकट दिया। वह पहली बार विधायक बने। 1989, 1991 और 1993 में वह बघरा सीट से विधायक रहे। 2004 में इंडियन नेशनल लोकदल ने राज्यसभा भेजा था। मलिक ने एसपी के टिकट पर मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट से 1998 में पहला और 1999 में दूसरा चुनाव लड़ा। 2009 में कांग्रेस के टिकट लड़े। 2019 में कांग्रेस के टिकट पर कैराना से चुनाव लड़े, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। मलिक वक्ता के साथ दल बदलते गए। राजनीति की शुरुआत लोकदल से की। फिर सपा में शामिल हुए। इसके बाद इनेलो का हिस्सा बनें। फिर कांग्रेस में रहे। दोबारा सपा में आकर फिलहाल राष्ट्रीय महासचिव हैं। मलिक ने बेटे पंकज मलिक को तीसरी बार विधायक बनवाकर अपनी पकड़ का अहसास कराया। फिलहाल चरथावल से पंकज मलिक सपा के विधायक हैं।