सरसों तेल, रिफाइंड हुए सस्ते; जानिए क्या रह गए हैं रेट

Mustard Oil Price: दूसरे देशों के बाजारों में मंदी के रुख के बीच दिल्ली के तेल-तिलहन बाजार में सरसों (Mustard), मूंगफली (Groundnut), सोयाबीन तेल- तिलहन

Mustard oil, refined cheaper; Know what are the rates left
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RILMustard Oil Price: दूसरे देशों के बाजारों में मंदी के रुख के बीच दिल्ली के तेल-तिलहन बाजार में शुक्रवार को सरसों (Mustard), मूंगफली (Groundnut), सोयाबीन तेल- तिलहन (Soybean oil-oilseeds), सीपीओ (CPO) और पामोलीन तेल (Palmolein Oil) सहित करीब सभी खाने के तेलों की कीमतों (Edible oil price) में गिरावट रही. बाकी तेल-तिलहन के भाव पहले के स्तर पर बने रहे.

मार्केट से जुड़े सोर्सेज ने बताया कि मलेशिया एक्सचेंज में लगभग 4.25 फीसदी की गिरावट थी, जबकि शिकागो एक्सचेंज लगभग डेढ़ फीसदी टूटा. विदेशी बाजारों की इस गिरावट के कारण सभी तेल तिलहनों के भाव में कमजोरी देखने को मिली. सोर्सेज ने बताया कि सरकार ने 24 मई को कहा था कि केवल उपभोक्ताओं को आपूर्ति करने वाली तेल रिफाइनिंग कंपनियां 20 लाख टन सूरजमुखी तेल और 20 लाख टन सोयाबीन डीगम का शुल्क मुक्त आयात कर सकती हैं. इसके बाद 24 मई के बाद से आयातकों ने Edible Oils खरीदना बंद कर दिया.

इन तेलों के लिए कुछ समय तक रह सकती है दिक्कत
इम्पोर्ट के लिए 18 जून तक परमिट जारी होने के बाद तेल खरीद और मालवाहक पोत पर लदान करवाने वाले ही शुल्क छूट का लाभ ले सकते हैं. इस घोषणा से पहले खरीदे गये तेल और आयात के रास्ते में तेल के लिए शुल्क छूट का लाभ नहीं मिलेगा. एक तरफ आयातक तेल खरीद नहीं कर रहे और दूसरी ओर परमिट मिलने के इंतजार में रिफाइनिंग कंपनियां भी बैठी हुई हैं. इससे हमें कुछ समय के लिए हल्के तेलों की दिक्कत देखने को मिल सकती है, क्योंकि सरकार के उक्त आदेश से आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई है.

सरसों की मंडियों में आवक हुई कम
सूत्रों ने कहा कि मलेशिया से पाम, पामोलीन का आयात करना आसान है लेकिन इस आयात के आने में 10-15 दिन का समय लगता है. जबकि हल्के तेल के आयात में डेढ़ से दो महीने लगते हैं. उसने कहा कि मंडियों में सरसों की आवक कम हो गयी है और इसका रिफाइंड बनना भी कम हुआ है, बिनौला लगभग खत्म हो गया है, आगे बरसात का मौसम फिर जाड़े में हल्के तेलों की मांग बढ़ेगी, जिसका सारा दबाव सोयाबीन पर आएगा. विदेशों में फिलहाल सोयाबीन के दाम ऊंचे हैं. दूसरा अगर रुपया अभी की तरह कमजोर बना रहा तो आने वाले दिनों में आयात के सौदे महंगे बैठेंगे. इन सारी विषम स्थितियों का इलाज देश में तेल तिलहन का उत्पादन बढ़ाकर ही किया जा सकता है.