ताजमहल पर रॉयल फैमिली ने क्यों किया दावा, यहां समझिए पूरा मामला

जयपुर की रॉयल फैमिली की ओर से ताजमहल को जयपुर राजघराने की प्रॉपर्टी बताने के बाद एक नई चर्चा शुरू हो गई। BJP सांसद दीया कुमारी ने इसे जयपुर राजघराने की प्रॉपर्टी बताया है

Why did the Royal Family claim the Taj Mahal, understand the whole matter here
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बीकानेर। जयपुर की रॉयल फैमिली की ओर से ताजमहल को जयपुर राजघराने की प्रॉपर्टी बताने के बाद एक नई चर्चा शुरू हो गई। BJP सांसद दीया कुमारी ने इसे जयपुर राजघराने की प्रॉपर्टी बताया है। वहीं, ताजमहल का राजस्थान से एक दूसरा कनेक्शन भी है। इसे बनाने के लिए राजस्थान में मकराना और आमेर से भारी मात्रा में संगमरमर भेजा गया था। इसके स्पष्ट प्रमाण बीकानेर के अभिलेखागार में मौजूद हैं।

दरअसल, आगरा में ताजमहल के निर्माण के दौरान जयपुर के आमेर (जिसे फरमान में आंबेर लिखा है) में भी सफेद संगमरमर की खदान थी। आमेर की खदान से निकला पत्थर भी ताजमहल के निर्माण में लगा। आमेर के अलावा मकराना और राजनगर की खदानों से भी सफेद मार्बल आगरा पहुंचा। यह जानकारी राजस्थान राज्य अभिलेखागार में रखे शाहजहां की ओर से जयपुर के मिर्जा राजा जयसिंह को लिखे फरमान से मिली।

पहला फरमान

9 सितंबर 1632 ईस्वी में शाहजहां की ओर से जयसिंह को भेजे फरमान में आंबेर (आमेर) में नई खान से संगमरमर निकालने के लिए मुलूकशाह को भेजने की बात कही गई थी। फरमान में ये भी कहा गया कि वे जितने मजदूर और गाड़ियां मांगे, उन्हें उपलब्ध करा दी जाएं। इसमें लगने वाला खर्च बादशाह के कोषाधिकारी की ओर से आपको भिजवा दिया जाएगा। शाहजहां ने फरमान की अवहेलना न होने के निर्देश दिए थे।

दूसरा फरमान- गाड़ियों का भुगतान पहले राजा जयसिंह ने किया

आगरा तक संगमरमर पहुंचाने में लगी गाड़ियों और छकड़ों का भुगतान पहले तो राजा जयसिंह ने ही किया। उन्हें बाद में शाहजहां के कोष कार्यालय से यह भुगतान मिला। 21 जनवरी 1632 में शाहजहां की ओर से राजा जयसिंह को दिए फरमान में कहा कि आगरा तक संगमरमर पहुंचाने के लिए आमेर सहित अन्य परगनों से छकड़ों और गाड़ियों की जरूरत है। इसके लिए शाहजहां की ओर से सैय्यद इलाहदाद को नियुक्त किया गया। इलाहदाद ही गाड़ियों और छकड़ों का हिसाब करने के लिए अधिकृत थे।

तीसरा फरमान-

21 जून 1637 को लिखे फरमान में शाहजहां ने जयसिंह को निर्देश दिए कि यह सूचना पहुंची है कि आपके आदमी उस तरफ की सीमाओं के पत्थर काटने वालों को आमेर और राजनगर में एकत्र कर रहे हैं। इस कारण से पत्थर काटने वाले मकराना कम पहुंच रहे हैं। अतः वहां पर कार्य बहुत ही कम होता है, इसलिए हम आदेश देते हैं कि आप (जो कि अपने समान व तुल्य लोगों में श्रेष्ठ हैं) अपने व्यक्तियों को निर्देश दें कि वे आमेर और राजनगर में पत्थर काटने वालों को बिल्कुल ही न रोकें। जितने भी संगतराश (पत्थर काटने वाले) वहां पहुंचे, उनको मकराना के अधिकारियों के पास भेज दें। आप इस विषय में पूरी ताकीद जानकर हर हाल में आदेशों की अवहेलना न करें, अपना उत्तरदायित्व समझें।

चौथा फरमान-
जिस दस्तावेज का दावा जयपुर की रॉयल फैमिली की सदस्य दीया कुमारी कर रही हैं, वो अभिलेखागार में तो मौजूद नहीं है, लेकिन कई इतिहासकार उनके दावे से इत्तेफाक रखते हैं। हिस्टोरियन डॉ. आनंद शर्मा और प्रो. आरएस खंगारोत का दावा है, शाहजहां ने ताजमहल की जमीन के बदले आगरा में सरकार अधिकृत 4 हवेलियां आमेर नरेश को दी। कोलकाता पत्रिका वैचारिकी जयपुर के इतिहासकार डॉ. आनंद शर्मा के 2020 में प्रकाशित शोधपत्र में बताया गया कि ताजमहल पहले राजपूत महल था, जिसमें मानसिंह प्रथम का निवास था। मुल्हा अब्दुल हमीद लाहौरी ने शाहजहां के आदेश पर बादशाहनामा लिखा था। इसे एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल ने फारसी से अनुवाद कर दो खंडों में प्रकाशित किया।

इसके प्रथम खंड के पृष्ठ 403 की बाइसवीं लाइन में बेगम के अवेशेषों को निकालकर आगरा लाने का उल्लेख है। इसके अगले पृष्ठ पर 23 से 41वीं तक लाइन में उसके अवशेष लाने वालों के नाम आगरा के मानसिंह प्रसाद में दफनाने और भवन के बदले जयसिंह को जमीन आदि देने का उल्लेख किया गया है। उसमें यह बताया गया था कि प्रासाद का केंद्रीय भवन जो राजा मानसिंह प्रासाद के नाम जाना जाता है, बाद में उनके पाैत्र राजा जयसिंह के अधिकार में था। समकालीन इतिहासकार उस्ताद अहम लाहौरी व अबुल फजल के दस्तावेजों व फरमानों का अध्ययन कर निष्कर्ष पर पहुंचे हिस्टोरियन प्रो. आरएस खंगारोत कहते हैं कि आगरा में आमेर के राजा मानसिंह प्रथम की ‘मान हवेली’ पर ही ताजमहल बना है। यह जमीन शाहजहां ने जय सिंह से ली थी।

राजस्थान यूनिवर्सिटी के हिस्ट्री डिपार्टमेंट के असिस्टेंट प्रोफेसर अभिमन्यु सिंह आढ़ा ने बताया कि उस वक्त सभी बड़े महाराजा और राजघराने अपनी जमीनें देश की राजधानी में रखते थे। जयपुर राजघराना उस वक्त पूरे हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा शक्तिशाली और महत्वपूर्ण सामंती परिवार था। मुगलों की पूरी मनसबदारी व्यवस्था में इनका ऊंचा ओहदा था। जमीन के लिए शाहजहां ने 28 दिसम्बर 1633 को आमेर नरेश राजा जयसिंह-प्रथम के नाम एक फरमान (राजपत्र-आदेश) जारी किया था। फरमान में राजा जयसिंह को एक गौरवशाली सरदार बताया गया। इसी फरमान में राजा मानसिंह की हवेली को मुमताज महल बेगम के मकबरे के लिए दान करने को कहा गया।

अभिलेखागार ने सहेजे हैं ये फरमान
शाहजहां के काल में जो भी फरमान राजस्थान के राजाओं को जारी हुए थे, उन्हें सुरक्षित रखते हुए बीकानेर के अभिलेखागार में रखवाया गया है। यहां शाहजहां के अनेक फरमान है, लेकिन इनमें दो-तीन ही ताजमहल से जुड़े हैं।

पुस्तक में प्रकाशित है फरमान
राजस्थान राज्य अभिलेखागार के निदेशक डॉ. महेन्द्र खड़गावत के अनुसार शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज की याद में ताजमहल का निर्माण करवाया। इसे बनाने में 22 साल लगे। 1631 में इसका निर्माण शुरू हुआ जो 1653 में पूरा हुआ। इसे बनाने में 20 हजार मजदूर लगे। इस पर शाहजहां ने तब करीब 3 करोड़ 20 लाख खर्च किए थे।