CM नीतीश से पंगा सुधाकर सिंह को पड़ गया महंगा, छोड़नी पड़ी कृषि मंत्री की कुर्सी

बिहार के कृषि मंत्री सुधाकर सिंह ने 12 सितंबर को कैमूर की सभा में कहा था कि उनके विभाग के अफसर चोर हैं, इस लिहाज से वे चोरों के सरदार हुए। कैबिनेट की बैठक में जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सुधाकर सिंह से उनके बयान पर सफाई मांगी तो बिना कुछ बोले उठकर चले गए।

Sudhakar Singh got costly due to CM Nitish, had to leave the chair of Agriculture Minister
Sudhakar Singh got costly due to CM Nitish, had to leave the chair of Agriculture Minister
इस खबर को शेयर करें

पटना: तो अंततः कृषि मंत्री सुधाकर सिंह को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से पंगा लेना महंगा पड़ गया। वो सीधे-सीधे नीतीश कुमार की नीतियों का खुलकर विरोध कर रहे थे। जिसके चलते सरकार की गाड़ी बेपटरी भी हो रही थी। ये भी सच है कि इस स्थिति से बचने के प्रयास में एक अच्छा खासा वक्त भी दिया गया। परंतु कृषि मंत्री की व्यवस्था विरोध की अग्नि और भी प्रज्वलित होती गई। परिणाम वही हुआ, जो राजनीतिक गलियारों में परवान पा रहा था कि कृषि मंत्री का प्रारब्ध इस्तीफा की ओर जा रहा है।

नहीं थम रही थी टकराहट की राजनीति
सरकार में रह कर सरकार की नीतियों का विरोध कृषि मंत्री सुधाकर सिंह जरूर कर रहे थे। ये राजनीति की गरिमा के विपरीत भी जा रहा था। व्यवस्था विरोध की बात उस दिन शुरू हुई, जब मंत्री बनते एक सभा में उन्होंने ये कह डाला कि विभाग के अधिकारी चोर हैं और मैं चोरों का सरदार। बात यहीं नहीं रुकी एक निजी संस्थान के कार्यक्रम में उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ड्रीम प्रोजेक्ट कृषि रोड मैप को एक सिरे से नकार दिया। उन्नत बीज को लेकर किए गए सारे प्रयोग को भी बेकार करार दिया। उन्होंने सरकार पर ये आरोप भी लगाया कि उन्नत बीज के प्रयोग इस कदर असफल हैं कि वैज्ञानिकों ने नाटा मंसूरी का विकल्प तक नहीं ढूंढ सके।

इथेनॉल प्रोजेक्ट का भी विरोध कर रहे थे सुधाकर
इथेनॉल प्रोजेक्ट का तो भरपूर विरोध प्रकट करते साफ सुधाकर सिंह ने कहा था कि मैं व्यक्तिगत रूप से इस प्रोजेक्ट का विरोध करता हूं। एक हद तक गन्ना के वेस्ट मिटिरियल से इथेनॉल बनाने पर सहमत हो भी जाऊं, पर चावल और मक्का से इथेनॉल तो मैं जब तक मंत्री हूं, ये काम नहीं होने दूंगा। गरीबों के पेट में अनाज नहीं और अमीरों के लिए पेट्रोल का विकल्प तैयार किया जाए ये मैं कभी बर्दास्त नही कर सकूंगा। उन्होंने राज्य सरकार के उस दावे से भी खुद को अलग कर लिया, जिसमें ये कहा गया था कि किसानों की आमदनी बढ़ी है। उनका आरोप कि निर्धारित मूल्य पर 10-20 प्रतिशत किसान ही अपनी अनाज बेच पाते हैं।

इस्तीफे का तात्कालिक कारण क्या बना?
कृषि मंत्री सुधाकर सिंह का अपनी सरकार की नीतियों के विरुद्ध खड़े रहने से मुख्यमंत्री और प्रशासन की भी चूलें हिल रही थी। हाल ही में जब कृषि मंत्री ने किसानों के हक की खातिर मंडी की स्थापना की बात कही तो ये मुख्यमंत्री के गलियारे में पचने जैसा तो उपक्रम नहीं था। नीतीश कुमार के शासन काल में ही बाजार समिति के कॉन्सेप्ट को खत्म किया गया था और एक बार फिर से नीतिश कुमार के शासनकाल में उल्टी गंगा बहाने जैसा है। हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चाहने वालों को उस दिन काफी खराब लगा, जब मंत्रिपरिषद की बैठक में उन्होंने कृषि मंत्री से उनकी परेशानी जानने की कोशिश की, बदले में कृषि मंत्री जब बगैर बोले मंत्रिपरिषद से चले गए। बाहर में मीडिया से बोल पड़े कि मेरे अभिभावक तो लालू प्रसाद और तेजस्वी यादव हैं। ये वही दिन था, जब कृषि मंत्री की उल्टी गिनती शुरू हो गई थी।

पहली बार किसी ने सीएम को दिखाया तेवर
एनडीए के शासनकाल में ऐसा कभी मौका नहीं आया, जब भाजपा के मंत्री ने कोई बेअदबी की। वो भी तब जब भाजपा मंत्री लगातार अपने अभिभावक से कहते रहते कि उनकी बात नहीं सुनी जाती है। फिर भी केंद्र से कोई रिस्पॉन्स नहीं मिलता था। कृषि मंत्री सुधाकर सिंह ने अपने विद्रोही तेवर से सीएम की धमक को कमतर करने की लगातार कोशिश करते रहे। ये मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के तेवर और अनुशासन के बिल्कुल विपरीत था। सो, ये तो होना ही था।

विद्रोही तेवर के रहे हैं सुधाकर सिंह
किसान आंदोलन को लेकर प्रयासरत सुधाकर कुछ ज्यादा ही विद्रोही स्वभाव के थे। एक बार तो वो अपने पिता जगदानंद सिंह की इच्छाओं के विरुद्ध भाजपा की सदस्यता ली और रामगढ़ विधानसभा से भाजपा की ओर से चुनाव भी लड़े। सिद्धांत की लड़ाई से न तो जगदानंद सिंह पीछे हटे और ना ही सुधाकर सिंह। जगदानंद सिंह ने सुधाकर सिंह के विरुद्ध कमर कस ली और अंततः सुधाकर सिंह को राजद के उम्मीदवार से हार का सामना करना पड़ा।

क्या कहा राजद के प्रदेश अध्यक्ष ने?
राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह जो कृषिमंत्री सुधाकर सिंह के पिता हैं, उन्होंने कहा कि किसानों के हित के लिए कभी-कभी बलिदान भी करना पड़ता है। कृषि मंत्री जिस रास्ते किसानों की खुशहाली चाहते थे, उस रास्ते पर चलने में खुद को कहीं असमर्थ पा रहे होंगे। सो, इस्तीफा अपने नेता को सौंपा है।