सीएम पद पर 1998 वाले दांव से कैसे गहलोत को घेर रहा पायलट कैंप, समझिए

राजस्थान में कांग्रेस की आपसी गुटबाजी ने पार्टी के लिए नई समस्या खड़ी कर दी है। अशोक गहलोत के रुख से पार्टी का आलाकमान भी हैरान है। उसे इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि अध्यक्ष पद के चुनाव के बीच उनके भरोसेमंद ही इस तरह की चुनौती खड़ी कर देंगे।

Understand how the pilot camp is besieging Gehlot due to the 1998 bet on the post of CM
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नई दिल्ली : राजस्थान के मुख्यमंत्री कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़ेंगे या प्रदेश के सीएम बने रहेंगे। यह सवाल यदि तीन दिन पहले किया गया होता तो जवाब साफ होता कि वह कांग्रेस अध्यक्ष बनकर दिल्ली ही जाएंगे। लेकिन पिछले 48 घंटों में जिस तरह से घटनाक्रम में नाटकीय तरीके से बदलाव हुआ है उससे अब गहलोत के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के साथ ही राजस्थान के सीएम पद पर बने रहने को लेकर भी तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। बताया जा रहा है कि पार्टी आलाकमान रविवार के बाद से गहलोत से नाराज चल रहा है। दिल्ली से जयपुर पहुंचे पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट के बाद से पार्टी आलाकमान क्या कदम उठाएगा इस पर सबकी नजरें हैं। इस बीच सचिन पायलट कैंप सीएम अशोक गहलोत को घेरने के लिए साल 1998 वाला दांव लगा रहा है।

नहीं दोहराया गया पिछला इतिहास
दरअसल साल 1998 से अब तक तीन बार प्रदेश में सीएम का चुनाव कांग्रेस अध्यक्ष की तरफ से किया जाता रहा है। इसके तहत प्रदेश कांग्रेस की तरफ से एक लाइन का प्रस्ताव पारित किया जाता है। इसमें पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को प्रदेश का सीएम चुनने के लिए अधिकृत किया जाता है। रविवार को जब दिल्ली से जयपुर पार्टी पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खड़गे और राष्ट्रीय महासचिव अजय माकन पहुंचे थे तो वह भी इस तरह का प्रस्ताव पारित कराना चाहते थे। हालांकि, अशोक गहलोत समर्थक विधायकों ने दिल्ली के इस प्लान पर पानी फेर दिया। इसके उलट विधायकों ने बागी रुख अपनाते हुए अपना इस्तीफा लेकर विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी के पास पहुंच गए थे।

जब 1998 में सीएम बने थे गहलोत
राजस्थान में पायलट कैंप के एक नेता ने कहा कि जब गहलोत पहली बार 1998 में मुख्यमंत्री बने, तो विधायी समूह ने कांग्रेस अध्यक्ष को अपना नेता चुनने के लिए अधिकृत करने वाले एक लाइन के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। उस समय गहलोत राजस्थान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी नहीं थे। साल 1998 में जब अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने थे तो वे विधायक भी नहीं थे। उस समय वे एक सांसद थे। इसके बावजूद एक प्रस्ताव को मंजूरी दी गई और गहलोत सीएम चुना गया था।

पुराने कांग्रेसियों को भी नहीं थी ऐसी उम्मीद
इसी तरह साल 2008 और साल 2018 में एक लाइन का प्रस्ताव पारित किया गया था। उस समय किसी ने भी इस पर आपत्ति नहीं की थी। लेकिन अब ऐसा क्या हो गया कि गहलोत के समर्थक विधायक इस तरह के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। इतना ही नहीं विधायकों ने अपनी तरफ से मामले को सुलझाने के लिए शर्तें भी रख दीं। जो लोग सालों से गहलोत को जानते हैं उनको भी इस ऐसा होने की उम्मीद नहीं थी। दूसरी तरफ, पायलट ने पिछले हफ्ते राहुल गांधी के साथ भारत जोड़ी यात्रा में भाग लेने के लिए केरल पहुंचे थे। गहलोत खेमे ने इसे इस तरह से दिखाया कि पायलट को गांधी परिवार का भरोसा है। गहलोत के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद पायलट मुख्यमंत्री पद के लिए उनका विकल्प हो सकते हैं।

पायलट को सीएम बनाने का नहीं था प्रस्ताव
पायलट कैंप का दावा है कि केंद्रीय पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खड़गे और अजय माकन पायलट के लिए सहमति लेने के लिए राजस्थान में नहीं थे। एक अन्य नेता ने कहा कि पायलट समर्थकों का कहना है कि दोनों पर्यवेक्षकों ने विधायकों के आने के लिए पांच घंटे तक इंतजार किया। लेकिन 90 से ज्यादा विधायक नहीं आए। खड़गे और माकन ने कभी नहीं कहा कि पायलट को मुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव है। यह केवल कांग्रेस अध्यक्ष को अधिकृत करने के लिए था।