हमारी दिवाली तो काली… भोपाल की 70 साल पुरानी बस्ती के लोगों को बुलडोजर का डर, घरों पर लगाए पोस्टर

पूरे देश में दीपावली की चहल-पहल और उमंग का दौर चल रहा है, लेकिन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के पॉलिटेक्निक कॉलेज के पीछे बसी 70 वर्ष पुरानी आदिवासी बस्ती में इस बार अंधेरा छाया हुआ है. प्रशासन द्वारा जारी उजाड़ने के नोटिस ने यहां के 200 से अधिक निवासियों की जिंदगी पर काला बादल मंडरा रहा है.

25 अगस्त को जारी नोटिस में बस्तीवासियों को सात दिनों के अंदर सरकारी/वन भूमि खाली करने का आदेश दिया गया, वरना जुर्माना और कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई. अब बस्ती में डर का माहौल है, जहां किसी भी पल बुलडोजर की दहाड़ गूंज सकती है. यह बस्ती पीढ़ियों से आदिवासी परिवारों का आशियाना रही है.

दशकों पहले यहां आकर बसे थे…
यहां के निवासी बताते हैं कि दशकों पहले यह इलाका वीरान जंगल था, जहां वे बस गए थे. आज जब आसपास ऊंची इमारतें और कॉम्प्लेक्स बन गए हैं, तभी उनकी जमीन को ‘सरकारी’ घोषित कर दिया गया. बस्ती की दीवारों पर अब रंग-बिरंगी झालरों की जगह सफेद पोस्टर चिपके हैं, जिनमें काले अक्षरों से लिखा है “हमारी दिवाली में अंधेरा क्यों? हम घर नहीं, इंसाफ मांग रहे हैं. हमारा घर तोड़ा, सपने भी कुचले.” छोटे-छोटे बच्चे हाथों में पोस्टर थामे खड़े हैं, जिन पर लिखा है, “हमारी दिवाली काली है, अब क्या मनाएं?”

अब कहां जाएं…?
80 वर्षीय रैला बाई नम आंखों से कहती हैं, “हमारे मां-बाप, भाई-बहन सब यहीं रहे, यहीं मरे. अब कहते हैं, निकलो यहां से… क्या गरीब का घर होना अब गुनाह है?” अन्य पीड़ितों का भी यही दर्द है. एक युवा निवासी बोले, “जब घर पर बुलडोजर चलने का डर हो, तो रोशनी कैसी और त्योहार कैसा? हम इंसाफ चाहते हैं, न कि उजाड़.”
हर साल दीपावली से पहले यहां रंग-रोगन, मिठाइयां और बच्चों की हंसी गूंजती थी. इस बार सन्नाटा पसरा है. बस्तीवासी प्रशासन से वार्ता की मांग कर रहे हैं. क्या यह उजाड़ अभियान गरीबों के सपनों पर ही बुलडोजर चलाएगा?