Anand Mahindra X Post: महीने की शुरुआत में सोने-चांदी की कीमत में तेजी आने के बाद अब दोनों ही कीमती धातुओं के दाम में गिरावट देखी जा रही है. इस बीच मशहूर कारोबारी आनंद महिंद्रा ने गुरुवार को एक्स (X) पर पुरानी यादों को साझा किया. उन्होंने बताया यह याद 1962 के भारत-चीन जंग से जुड़ी थी. उस समय भारतीय महिलाओं ने देश के लिए अपना सोना और गहने दान किये थे. उनकी पोस्ट एक ऐसे ट्वीट के जवाब में थी, जिसमें बताया गया कि भारतीय महिलाओं के पास 10 देशों की महिलाओं से ज्यादा गोल्ड है. आंकड़ों पर गौर करें तो भारतीय महिलाओं के पास 25,488 टन सोना है.
नेशनल डिफेंस फंड बनाकर गहने दान करने की अपील की
इसके बाद अमेरिका (8133 टन), जर्मनी 3351 टन, इटली 2451 टन, फ्रांस 2437 टन, रूस 2332 टन, चीन 2279 टन, स्विट्जरलैंड 1039 टन, जापान 845 टन, नीदरलैंड 612 टन और पोलैंड 448 टन का नंबर है. महिंद्रा ने अपनी एक्स पोस्ट में लिखा कि यह आंकड़ा काफी दमदार है. इसने मुझे अपने बचपन की एक याद दिला दी. उन्होंने लिखा 1962 की भारत-चीन जंग के दौरान सरकार ने नेशनल डिफेंस फंड बनाया और लोगों से सोना व गहने दान करने की अपील की.
जब इकट्ठा हो गया था हजारों करोड़ का गोल्ड
ऑनलाइन जानकारी के अनुसार उस समय आज की कीमत में हजारों करोड़ का सोना इकट्ठा हो गया था. अकेले पंजाब ने करीब 252 किलो सोना दान किया था. महिंद्रा ने अपना किस्सा शेयर करते हुए लिखा, ‘मुझे याद है, 7 साल की उम्र में मैं अपनी मां के साथ बॉम्बे (अब मुंबई) की सड़क पर खड़ा था. सरकारी ट्रक माइक के जरिये लोगों से गहने दान करने की अपील कर रहे थे. मेरी मां ने चुपके से अपनी सोने की चूड़ियां और हार एक कपड़े की थैली में डाले और ट्रक पर सवार स्वयंसेवकों को दे दिए.’
क्या आज भी संभव है ऐसा दान?
आनंद महिंद्रा ने लिखा कि क्या आज के समय में इतने बड़े पैमाने पर स्वेच्छा से देशभक्ति और भरोसे का इस तरह का काम हो सकता है. उन्होंने लिखा, ‘क्या आज की दुनिया में इतना बड़ा वॉलेंटियरी दान और भरोसा संभव है?’ उन्होंने कहा कि 1962 की यह याद बताती है कि देश की ताकत सिर्फ पॉलिसी पर नहीं, बल्कि लोगों की सामूहिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है.
महिंद्रा की सोशल मीडिया पोस्ट ने लोगों को भावुक कर दिया. एक यूजर ने लिखा, ‘नहीं सर, आज ऐसा भरोसा नहीं होगा. ज्यादातर दान लूट लिए जाएंगे और आंकड़ों के साथ छेड़छाड़ होगी. जैसे 1999 में ओडिशा के सुपर साइक्लोन में राहत सामग्री गरीबों तक नहीं पहुंची.’ दूसरे ने लिखा, ‘यह याद दिलाता है कि नागरिकों और देश के बीच गहरा रिश्ता था. आज के संदेह और अविश्वास के दौर में ऐसा ऐसा दान असंभव लगता है. यह याद दिलाता है कि असली ताकत सेना या पॉलिसी में नहीं, बल्कि लोगों के भरोसे और इच्छाशक्ति में है.’