Bihar Chunav 2025: बिहार विधानसभा चुनाव के लिए रण सज चुका है. तैयारियां चल रही हैं. पार्टियां खेमों में बंट चुकी हैं. सत्तारूढ़ एनडीए में भाजपा, जेडीयू, लोजपा रामविलास, हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा और राष्ट्रीय लोक मोर्चा शामिल हैं तो विपक्षी महागठबंधन में राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस, भाकपा माले, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और विकासशील इंसान पार्टी शामिल हैं. दोनों खेमों की ओर से बयानबाजी और शक्ति प्रदर्शन का दौर चल रहा है. महागठबंधन की ओर से कांग्रेस नेता राहुल गांधी 16 दिन बिहार में बिताकर गए हैं तो पीएम मोदी की मां को गाली के विरोध में भाजपा 4 सितंबर को बिहार बंद का आयोजन कर रही है. इन सबके बीच राजद नेता तेजस्वी यादव ने पटना में बुधवार को विधायक दल की बैठक बुलाई तो दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भारतीय जनता पार्टी, बिहार की कोर ग्रुप की बैठक ली. दोनों पक्षों की ओर से तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है. अब आइए जानते हैं कि 2020 के विधानसभा चुनाव की तुलना में 2025 के चुनाव में क्या बदल गया है.
2020 और 2025 के विधानसभा चुनावों के बीच जो सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम बदला, उसमें बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू प्रसाद के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव का परिवार और पार्टी से अलग होना रहा. कुछ महीने पहले तेज प्रताप यादव के अनुष्का यादव के साथ संबंधों को लेकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट वायरल हो गया था, जिसमें तेज प्रताप यादव ने अनुष्का यादव से संबंध कबूल किए थे. हालांकि तेज प्रताप यादव का कहना था कि वो पोस्ट किसी ने उनकी आईडी हैक कर साजिश के तहत किया था. इस पोस्ट के वायरल होते ही राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने तत्काल परिवार और पार्टी से तेज प्रताप यादव को आउट कर दिया था.
उसके बाद तेज प्रताप यादव चुनाव की तैयारियों में तो जुटे हुए हैं, लेकिन उन्होंने कोई नई पार्टी नहीं बनाई है. हालांकि वे अपने दो चार समर्थकों को टिकट दे रहे हैं और प्रत्याशी बनाने का ऐलान तक कर दिया है. अभी तेज प्रताप यादव हसनुपर सीट से विधायक हैं, लेकिन माना जा रहा है कि वे महुआ विधानसभा सीट से चुनाव लड़ सकते हैं. महुआ विधानसभा क्षेत्र में तेज प्रताप यादव की सक्रियता बढ़ने से भी इस बात को बल मिलता है. इससे पहले 2020 में तेज प्रताप यादव राष्ट्रीय जनता दल से चुनाव लड़े थे और 2022 में जब नीतीश कुमार ने पलटी मारी थी और राजद के साथ मिलकर सरकार बनाई थी, तब तेज प्रताप यादव मंत्री भी बने थे.
सुशील कुमार मोदी की गैरमौजूदगी
बिहार भाजपा के लिए यह पहला चुनाव होगा, जब सुशील कुमार मोदी साथ नहीं होंगे. सुशील कुमार मोदी का 13 मई, 2024 को कैंसर की बीमारी के चलते दिल्ली एम्स में 72 साल की उम्र में निधन हो गया था. निधन के समय सुशील कुमार मोदी राज्यसभा सांसद थे. निश्चित रूप से बिहार भाजपा को सुशील कुमार मोदी की कमी महसूस होगी. सुशील कुमार मोदी भाजपा के दिग्गज नेता हुआ करते थे और हर चुनाव में उनकी रणनीतियों से भाजपा को फायदा होता था. यह पहला विधानसभा चुनाव होगा, जब सुशील कुमार मोदी नहीं होंगे.
सुशील कुमार मोदी के बदले उम्मीद जताई जा रही है कि उनकी पत्नी जेसी जॉर्ज भाजपा की ओर से चुनावी मैदान में उतर सकती हैं. इस साल 13 मई को सुशील कुमार मोदी की पुण्यतिथि के मौके पर जेसी जॉर्ज ने इस बात के संकेत भी दिए थे. हालांकि उन्होंने यह भी कहा था कि इसका फैसला पार्टी को लेना है. उन्होंने कहा था कि यदि उन्हें सक्रिय राजनीति में उतरने को कहा जाता है तो मैं भाजपा के इस फैसला का सम्मान करूंगी.
मुकेश सहनी महागठबंधन में तो उपेंद्र कुशवाहा एनडीए में
2020 का विधानसभा चुनाव याद कीजिए. तब मुकेश सहनी एनडीए का हिस्सा थे. एनडीए में उन्हें 12 सीटें चुनाव लड़ने को दी गई थीं, जिसमें से 3 पर विकासशील इंसान पार्टी के प्रत्याशियों ने जीत हासिल की थी. बाद में मुकेश सहनी का भाजपा से मतभेद हो गया था और उनके तीनों विधायक टूटकर भाजपा में शामिल हो गए थे. उसके बाद वे महागठबंधन में शामिल हो गए और लोकसभा चुनाव भी विपक्षी गठबंधन में रहकर ही लड़े थे. लोकसभा चुनाव में मुकेश सहनी को राजद की ओर से 3 सीटें लड़ने के लिए दी गई थीं, लेकिन सहनी की पार्टी एक सीट पर भी जीत हासिल नहीं कर पाई थी.
राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा 2020 के विधानसभा चुनाव के मौके पर महागठबंधन का हिस्सा थे. 2019 के लोकसभा चुनाव से ऐन पहले नैतिकता के आधार पर उपेंद्र कुशवाहा ने एनडीए छोड़ दिया था और महागठबंधन के साथ चले गए थे. लोकसभा चुनाव के डेढ़ साल बाद हुए बिहार विधानसभा चुनाव में भी उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी महागठबंधन के साथ ही थी, लेकिन वे वहां रहकर भी कोई कमाल नहीं दिखा सके थे. 2020 के चुनाव में करारी हार के बाद उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश कुमार से नजदीकियां बढ़ाईं और अपनी पार्टी का जेडीयू में विलय कर दिया. दो साल बाद 2022 में उपेंद्र कुशवाहा और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच फिर से अनबन हो गई और वे अलग हो गए थे. बाद में उन्होंने राष्ट्रीय लोक मोर्चा नाम से अपनी पार्टी बनाई थी. हालांकि 2024 का लोकसभा चुनाव उन्होंने एनडीए में रहकर ही लड़ा था, लेकिन काराकाट से हार गए थे. उसके बाद उपेंद्र कुशवाहा को भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा में भेजा था.
राहुल गांधी का आक्रामक रवैया
2020 में कांग्रेस इतनी आक्रामक नहीं थी, जितनी 2025 में है. यह सब राहुल गांधी की देन है. राहुल गांधी 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले से भाजपा को लेकर काफी आक्रामक हैं. अपनी आक्रामकता के जरिए ही राहुल गांधी के सौजन्य से कांग्रेस लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतने में कामयाब रही थी. एक बार फिर राहुल गांधी आक्रामक हो गए हैं और साथ ही पूरी पार्टी भी आक्रामक है. राहुल गांधी वोटर अधिकार यात्रा के दौरान 16 दिनों तक कांग्रेस पार्टी के लिए बिहार में कैंप किए रहे और 1300 किलोमीटर से अधिक का सफर तय किया. राहुल गांधी के चलते ही पहली बार बिहार में कांग्रेस जीवंत होती दिख रही है. माना जा रहा है कि वोटर अधिकार यात्रा का जबर्दस्त रिस्पांस देखने को मिला और इसके बाद कहा जा रहा है कि कांंग्रेस अब शायद ही राज्य में 70 से कम सीटों पर चुनाव लड़ने को राजी हो.
सूत्रों का तो यह भी दावा है कि कांग्रेस के कोर ग्रुप के नेताओं में इस बात को लेकर आम सहमति है कि पार्टी को बिहार में कम से कम 90 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहिए. हालांकि जब सीट शेयरिंग को लेकर बैठक होगी, तब देखना होगा कि कांग्रेस का क्या रुख रहता है. कांग्रेस इस बार अधिक से अधिक सीटें लेने की तो सोच ही रही है, साथ ही उन सीटों पर भी पार्टी की नजर है, जहां जीतने के चांसेज ज्यादा हैं. इससे पहले 2020 और उससे पहले के चुनाव में होता यह था कि राजद को जो सीटें मुश्किल लगती थीं, वो कांग्रेस के खाते में डाल देती थी, जिससे कांग्रेस का स्ट्राइक रेट हमेशा से डाउन ही रहता था.
कई भोजपुरी स्टार्स के चुनाव लड़ने की संभावना
2020 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो भोजपुरी कलाकार केवल चुनाव प्रचार में भाग लेने जाते थे. कभी किसी प्रत्याशी के पक्ष में तो कभी किसी प्रत्यााशी के पक्ष में. भोजपुरी कलाकारों में एक विनय बिहारी ही 2020 या उससे पहले से सक्रिय राजनीति में थे. 2025 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो कई भोजपुरी कलाकार राजनीति में अपना भाग्य आजमाने की सोच रहे हैं. इनमें पवन सिंह, अक्षरा सिंह, रितेश पांडेय, खेसारी लाल यादव और गुंजन सिंह शामिल हैं.
पवन सिंह की पत्नी ज्योति सिंह ने भी खुद के विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है और यहां तक कहा है कि किसी पार्टी से टिकट नहीं मिला तो निर्दलीय ही भाग्य आजमाउंगी. खेसारी लाल यादव के बारे में कहा जा रहा है कि पिछले महीने उनकी तेजस्वी यादव से मुलाकात हो चुकी है और उसके बाद से उनके एक्स पर पोस्ट की भाषा सियासी हो चली है. माना जा रहा है कि अगर खेसारी लाल यादव खुद मैदान में नहीं कूदे तो संभव है कि उनकी पत्नी या फिर उनके भाई को यह मौका मिल जाए. गुंजन सिंह ने तो बाकायदा बतौर निर्दलीय लोकसभा चुनाव में अपना भाग्य भी आजमा लिया था. अब शायद वे विधानसभा चुनाव की तैयारी में भी जुटे हुए हैं. रितेश पांडे की बात करें तो वे जन सुराज पार्टी का हिस्सा बन चुके हैं और वे बाकायदा जन संपर्क में भी जुट गए हैं.
अनंत सिंह और आनंद मोहन जेल से बाहर
2020 के विधानसभा चुनाव के मौके पर मोकामा के बाहुबली अनंत सिंह जेल में थे. तब नीतीश कुमार से अनंत सिंह का मोहभंग हो गया था. राजद ने इस मौके का फायदा उठाया और अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी को मोकामा से चुनाव मैदान में उतार दिया था. नीलम देवी को जीत हासिल हुई थी और मोकामा सीट से जेडीयू को बड़ा नुकसान हुआ था. हालांकि 2024 में जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दोबारा भाजपा के साथ आए और सरकार बनाने के बाद विश्वास मत साबित करने की नौबत आई, तब नीलम देवी विधानसभा में सरकारी खेमे की ओर बैठी दिखीं. उसके बाद से अंदाजा लग गया था कि अनंत सिंह परिवार की निष्ठा अब एक बार फिर से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ होगी.
2024 में जब नीतीश कुमार भाजपा संग आने के बाद विश्वास मत साबित करने पहुंचे तब विधानसभा में सरकारी खेमे की ओर राजद के एक और विधायक बैठे थे. वो विधायक थे चेतन आनंद. बाहुबली से राजनेता बने आनंद मोहन के बेटे चेतन आनंद ने भी तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार का साथ दिया था. इससे पहले नीतीश कुमार की सरकार ने एक कानून बनाकर उम्र कैद की सजा काट रहे आनंद मोहन के जेल से बाहर आने का रास्ता साफ किया था. गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी. कृष्णैया मर्डर केस में आनंद मोहन को उम्र कैद की सजा सुनाई गई थी. उसके बाद आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद
जेडीयू के टिकट पर शिवहर से लोकसभा चुनाव लड़ीं और जी भी हासिल की थी.
प्रशांत किशोर का जनसुराज फैक्टर
2020 और 2025 के विधानसभा चुनावों में जो एक बड़ा अंतर है, वो है प्रशांत किशोर का फैक्टर. 2020 के चुनाव में प्रशांत किशोर की पार्टी नहीं थी. प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी का गठन 2 अक्टूबर, 2024 को हुआ था. इस तरह से जन सुराज पार्टी का यह पहला विधानसभा चुनाव है. पार्टी बनाने से पहले प्रशांत किशोर ने दो साल तक पूरे बिहार में पदयात्रा की. गांव गांव घूमे, लोगों से बातचीत की, चुनाव के मुद्दे तलाशे, पसीना बहाया और फिर पटना में जन सुराज पार्टी का गठन किया. पार्टी बनने से पहले जनसुराज एक अभियान था, लेकिन अब पीके चुनाव में एक बड़ा फैक्टर बन चुके हैं. भले ही महागठबंधन और एनडीए के नेता प्रशांत किशोर की नेतागीरी को खारिज कर रहे हैं, लेकिन बिहार के चुनाव में वे दोनों खेमों को तगड़ी चोट देने वाले हैं. प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी मुद्दों पर अडिग रही है. पहले दिन से जो मुद्दे लेकर प्रशांत किशोर चले थे, आज भी उस पर कायम हैं.
2020 में पुष्पम प्रिया चौधरी का क्रश, अब बिल्कुल नहीं
2020 का विधानसभा चुनाव अपने तरह का विचित्र चुनाव था. उस चुनाव में लंदन से पढ़ी लिखी एक लड़की पुष्पम प्रिया चौधरी की एंट्री होती है और एक नई पार्टी का गठन होता है, प्लूरल्स पार्टी. तब जानकारों ने बताया था कि यह पश्चिम की राजनीति की नकल है. वहां भी राजनीतिक दलों के नाम ऐसे ही होते हैं. पुष्पम प्रिया चौधरी ने तब बेरोजगारी और शिक्षा को बड़ा मुद्दा बनाया था. बिहार की ठेठ राजनीति में पहली बार किसी अंग्रेजीदा लड़की ने पार्टी बनाई थी और राजनीति में उतरी थी, लेकिन उनकी अंग्रेजीदा पॉलिटिक्स बिहार के लोगों को पसंद नहीं आई और दो जगह से चुनाव लड़ने के बाद भी पुष्पम प्रिया चौधरी विधानसभा का मुंह तक नहीं देख पाईं और खुद हार गईं.