जियोपॉलिटिक्स में तस्वीरें कभी-कभी शब्दों से ज्यादा कह जाती हैं. चीन में विक्ट्री डे परेड की एक फोटो वायरल हुई जिसमें उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक साथ दिखाई दिए. तीनों नेताओं का यह साथ अमेरिका और पश्चिमी देशों को एक मैसेज देने वाला था कि हम एकजुट हैं. लेकिन इस फोटो में भारत कहीं नहीं था? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस फ्रेम से गायब थे? आपके मन में भी सवाल उठ रहे होंगे कि आखिर पीएम मोदी इस तस्वीर में क्यों नहीं? इसके पीछे की कहानी 36 साल पुरानी है.
भारत, जो आज दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक ताकत है और इंटरनेशनल रिलेशन में बैलेंसिंग रोल निभाता है, आखिरकार क्यों इस तरह के ‘ऑटोरिटेरियन क्लब’ से दूरी बनाए रखता है? इसका जवाब हमें 4 जून 1989 की एक घटना से मिलता है, जिसने न सिर्फ चीन की राजनीति बल्कि भारत-चीन रिश्तों की दिशा भी बदल दी थी.
4 जून 1989- बीजिंग का खूनी रविवार
यह तारीख दुनिया के इतिहास में ब्लैक संडे के तौर पर दर्ज है. बीजिंग के तियानआनमेन स्क्वॉयर पर लाखों छात्र और आम नागरिक इकट्ठा हुए थे. उनकी एक ही मांग थी कि लोकतांत्रिक सुधार किए जाएं. छात्रों ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और पॉलिटिकल सेंसरशिप के खिलाफ नारे लगाए. उनका कहना था कि चीन को सिर्फ एक पार्टी की पकड़ से आजाद कर, जनता को असली अधिकार दिए जाएं.
कई हफ्तों तक यह प्रदर्शन चलता रहा. छात्रों ने स्क्वॉयर पर टेंट लगा लिए, वहां गॉडेस ऑफ डेमोक्रेसी की मूर्ति खड़ी की और दुनिया ने टेलीविजन पर पहली बार देखा कि चीन की युवा पीढ़ी आजादी के लिए सड़क पर उतर आई है. लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी ने इसे अपनी सत्ता के लिए खतरा मान लिया. फिर क्या था, सेना को आदेश दे दिए गए. 4 जून 1989 की सुबह, टैंक और भारी हथियारों से लैस सैनिक तियानआनमेन स्क्वॉयर की ओर बढ़े. उस दिन दुनिया ने एक खौफनाक मंजर देखा. निहत्थे छात्रों पर मशीनगन से गोलियां चलाई गईं. टैंक भीड़ में चढ़ा दिए गए. सही आंकड़े आज भी चीन छिपाता है, लेकिन माना जाता है कि सैकड़ों नहीं, बल्कि हजारों छात्र और नागरिक मारे गए. यही वह दिन था जब दुनिया ने चीन को लोकतंत्र का हत्यारा मान लिया.
भारत ने क्यों कहा- ‘ये लोकतंत्र की हत्या है’
भारत उस वक्त खुद ब्रिटिश हुकूमत से आजादी की लंबी लड़ाई लड़कर निकला था. भारत ने इस नरसंहार को बहुत गंभीरता से लिया. उस समय राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे. भारत ने आधिकारिक रूप से चीन की इस कार्रवाई की कड़ी निंदा की. नई दिल्ली से यह साफ संदेश गया कि लोकतंत्र सिर्फ एक व्यवस्था नहीं, बल्कि मानवीय अधिकार है और चीन ने 4 जून को उसी अधिकार को कुचल दिया. भारत ने कई वर्षों तक चीन के साथ हाईलेवल बातचीत से दूरी बनाए रखी. वही फार्मूला आज तक लागू है. यही वजह है कि जब आज भी चीन अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने के लिए बड़े आयोजन करता है तो भारत उससे दूरी बना लेता है.
क्या तभी से भारत चीन के इवेंट से दूर है?
यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि 1989 के बाद भारत ने चीन के किसी भी इवेंट में हिस्सा नहीं लिया. दोनों देशों के बीच व्यापारिक और रणनीतिक संबंध बने रहे, लेकिन ट्रस्ट डिफिसिट यानी भरोसे की कमी हमेशा रही. भारत और चीन ने 1993 और 1996 में सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए समझौते किए. 2008 तक दोनों देश आर्थिक साझेदारी को बढ़ाते रहे. लेकिन 1989 की घटना भारत के नीति-निर्माताओं के दिमाग में हमेशा जिंदा रही. भारत यह मानता रहा कि चीन की राजनीतिक व्यवस्था भारत जैसी लोकतंत्र से बिल्कुल अलग है और वहां कभी भी जनता की आवाज कुचल दी जा सकती है. यही वजह है कि भारत कभी भी चीन के नेतृत्व वाले ऑटोरिटेरियन फ्रेमवर्कका हिस्सा नहीं बनता.
2020 के बाद रिश्तों में और तनाव
2020 में गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों पर हुए हमले ने दोनों देशों के रिश्तों में और कड़वाहट घोल दी. भारत ने तब से चीन पर भरोसा करना लगभग छोड़ दिया है. 5जी नेटवर्क से लेकर ऐप्स तक, भारत ने कई स्तरों पर चीन को रोकने का काम किया. यही कारण है कि जब किम जोंग, पुतिन और जिनपिंग जैसे नेता एक साथ नजर आए तो भारत ने दूरी ना ली. क्योंकि भारत का विजन लोकतंत्र, बहुपक्षीय संतुलन और वैश्विक स्थिरता है.