बालाघाट. मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में करीब 35 साल से माओवाद का असर देखने को मिल रहा है. इस दौरान सुरक्षाबलों के जवानों और आम लोगों सहित 105 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है लेकिन केंद्र सरकार ने मार्च 2026 तक नक्सलवाद के खात्मे की डेडलाइन तय की है. इसके बाद एंटी नक्सल ऑपरेशन तेज हुए हैं. नक्सलियों की कमर टूट चुकी है. कई एनकाउंटर हुए और ज्यादातर नक्सलियों को सरेंडर करना पड़ा है. ऐसे में अब नक्सल मुक्त भारत का सपना भी साकार होते नजर आ रहा है. वैसे तो इसके पीछे अलग-अलग सुरक्षाबलों का योगदान है लेकिन नक्सलियों की कमर तोड़ने में हॉक फोर्स की अहम भूमिका रही है.
बालाघाट में साल 1990 के बाद से ही माओवाद अपने पैर पसारने लगा था. पुलिस फोर्स भी कम थी और नक्सलियों से निपटना मुश्किल हो रहा था. तब मध्य प्रदेश पुलिस से एक स्पेशल यूनिट की स्थापना हुई, जिसका नाम हॉक रखा गया. यूनिट की स्थापना साल 1998 में हुई. इसका मकसद उस समय अविभाज्य एमपी यानी छत्तीसगढ़ सहित इलाकों में माओवादियों की गतिविधियों को खत्म करना था. उसके बाद से हॉक फोर्स मध्य प्रदेश के नक्सल प्रभावित जिलों में बालाघाट, मंडला और डिंडौरी में एक्टिव है. हॉक फोर्स का मुख्यालय पहले भोपाल में था लेकिन साल 2020 में एंटी नक्सल ऑपरेशन के बेहतर संचालन के लिए उस यूनिट का मुख्यालय बालाघाट के कनकी में कर दिया गया.
हॉक के जवानों को 70 फीसदी अतिरिक्त भत्ता
हॉक फोर्स के जवानों को नक्सल ऑपरेशन में जोखिम भरे कामों के लिए नक्सलाइट ऑपरेशन रिस्क अलाउंस दिया जाता है. इसे और आकर्षक बनाने के लिए पुलिस को मिलने वाले नियमित वेतन से 70 फीसदी ज्यादा वेतन का प्रावधान है. हॉक फोर्स के सभी कर्मचारियों और अधिकारियों को छठवें वेतन आयोग के ढांचे के आधार पर वेतन दिया जाता है लेकिन क्या आपको पता है यह अलाउंस जवानों को कैसे दिया जाने लगा. दरअसल 19 नवंबर को छत्तीसगढ़ में हो रहे संयुक्त ऑपरेशन में नक्सलियों की गोलियों से शहीद हुए आशीष शर्मा ने ही तब के सीएम शिवराज सिंह चौहान से इसके लिए गुजारिश की थी. उसी के बाद हॉक फोर्स के जवानों को अतिरिक्त भत्ता मिलने लगा.
नक्सल उन्मूलन में हॉक की अहम भूमिका
अगर नक्सलवाद खत्म हो रहा है, तो इसमें हॉक फोर्स का अहम योगदान है. दरअसल नक्सलियों से लड़ने के लिए हॉक फोर्स के जवानों की खास ट्रेनिंग मिली होती है, जिसमें जंगल युद्ध, मुखबिर से मिली जानकारी पर ऑपरेशन, जिसमें ‘पता लगाओ, निशाना बनाओ और बेअसर करो’ की नीति पर काम किया जाता है. इसके अलावा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नियमित रूप से सर्च और क्षेत्र पर नियंत्रण के ऑपरेशन चलाए जाते हैं, जिससे नक्सली संगठन कमजोर होते हैं और उन्हें सुरक्षित ठिकाने नहीं मिल पाते हैं.
एक साल में 2300 से ज्यादा ऑपरेशन
जब से केंद्र सरकार ने नक्सलवाद को खत्म करने की डेडलाइन तय की है. तब से हॉक ने सरकार के कमिटमेंट को पूरा करने के लिए अपनी जान की बाजी लगाई है. सुरक्षाबलों द्वारा एक साल में 2300 से ज्यादा सर्चिंग ऑपरेशन चले हैं, जो एमएमसी जोन में सबसे ज्यादा हैं. वहीं छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव और खैरागढ़ में 300 और महाराष्ट्र के गोंदिया में महज 20 ही ऑपरेशन चले हैं. ऐसे में बालाघाट में चल रहे सर्चिंग ऑपरेशन से बचने के लिए नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के सीमावर्ती इलाकों का सहारा लिया. नतीजतन, बीते एक साल में सुरक्षाबलों को बड़ी सफलता मिली, जिसमें 8 नक्सली मारे गए. वहीं करीब एक ने बालाघाट में तो 16 नक्सलियों ने पड़ोसी राज्यों में जाकर सरेंडर किया.
समय से पहले हासिल होगा लक्ष्य
एंटी नक्सल ऑपरेशन के एडिशनल एसपी आदर्श कांत शुक्ला ने बताया कि 1998 से लगातार ऑपरेशनल रणनीति को बेहतर किया है. इस साल भी काफी अच्छे परिणाम मिल रहे हैं. वहीं डेडलाइन को देखते हुए सघन सर्चिंग अभियान चल रहे हैं. ऐसे में समय से पहले ही लक्ष्य को हासिल कर लिया जाएगा.