न गोली चली, न जुबानी जंग, भारत में चुपचाप ले लिया ट्रंप से टैरिफ का बदला! अमेरिका को ₹4.5 लाख करोड़ का फटका

India on US Tariff: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से बार बार भारत पर हमले हो रहे हैं. भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपना दोस्त बताकर ट्रंप पीठ में छुरा घोंपने का काम कर रहे हैं. कभी टैरिफ का बम फोड़ते है तो कभी तेल पर जंग छेड़ते है और कभी धमकी देकर ट्रेड डील रोकते हैं. ट्रंप भारत की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. उनकी मंशा रही कि भारत पर मोटा टैरिफ लगाकर भारत को अपनी शर्तों पर झुका लेंगे. जब भारत की ओर से कोई बयानबाजी नहीं हुई तो ट्रंप ने 500 फीसदी टैरिफ का बम फोड़ने का अल्टीमेटम दे दिया, लेकिन ट्रंप अब अपनी ही चाल में बुरी तरह से फंस गए हैं. ट्रंप पर उनकी चालबाजी ही भारी पड़ गई है. भारत ने बिना किसी शोर-शराबे के अमेरिका को 4.5 लाख करोड़ रुपये का भारी भरकम झटका दे दिया है. अगर यूं कहें कि भारत ने बिना हंगामा किए टैरिफ का बदला लेना शुरू कर दिया है. भारत की बदली रणनीति डॉलर को कमजोर कर देगी. भारत बिना किसी युद्ध लड़े ट्रंप को परास्त कर देगा तो ये गलत नहीं होगा.

भारत की चाल भांप नहीं पाएं ट्रंप, अपनी चालबाजी में फंसा अमेरिका

अमेरिका जो भारत के साथ करना चाहता था वो दांव उसपर ही उल्टा पड़ गया. ब्‍लूमबर्ग की ओर से जारी रिपोर्ट के मुताबिक भारत की ओर से अमेरिकी ट्रेजरी नोट्स में हिस्‍सेदारी तेजी से घटाई जा रही है. सिर्फ एक साल में भारत ने अमेरिकी ट्रेजरी नोट्स में अपनी हिस्सेदारी को 21 फीसदी तक घटा दिया है. जियोपॉलिटिकल टेंशन के बीच भारत ने अपनी फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व की रणनीति को बदल दिया है. भारत ने इसे डाइवर्सिफाइड करते हुए अमेरिकी बॉन्ड में निवेश को कम कर दिया है. यूं ही समुद्री डकैत नहीं बन रहे ट्रंप! तेल के बाद अब ‘पानी की जंग’ में उतरा अमेरिका,ट्रंप का प्लान क्यों है दुनिया के लिए खतरनाक?

भारत के एक फैसले से अमेरिका को तगड़ा झटका

रिपोर्ट में जारी आंकड़ों के मुताबिक 31 अक्तूबर 2024 से लेकर 31 अक्टूबर 2025 तक भारत ने अमेरिकी ट्रेजरी नोट्स में हिस्सेदारी को 21 फीसदी तक घटा दिया है. जो अक्तूबर 2024 में 241.4 अरब डॉलर से गिरकर 190 अरब डॉलर पर पहुंच गया है. सबसे खास बात ये बीते एक साल में हुआ है, जब भारत ने अमेरिकी बॉन्ड में निवेश को घटाया है. इससे पहले या तो निवेश बढ़े थे, या फिर स्थिर रहे थे. निवेश में आई ये गिरावट भारत का अमेरिका के लिए बदली रणनीति का नतीजा है. जिस तरह से अमेरिका भारत को दवाब में लाकर अपनी शर्तों को बनवाना चाहता है, भारत की ओर से ये उसका जवाब है. क्योंकि अमेरिकी बॉन्ड में ये गिरावट उस वक्त की गई है, जब अमेरिकी बॉन्ड बाजार में रिटर्न बेहतर है.अमेरिकी ट्रेजरी पर रिटर्न करीब 4 से 4.8 फीसदी के बीच रही, लेकिन इसके बावजूद भारत ने अमेरिकी ट्रेजरी से अपनी होल्डिंग कम की है. कहीं गले ही हड्डी न बन जाए सस्ता रूसी तेल, 500% टैरिफ का पहाड़ फोड़ने की फिराक में ट्रंप…अगर ऐसा हुआ तो भारत की मुश्किल समझिए

भारत से क्यों कम किया निवेश

डॉलर के घटते दबदबे की झलक इन आंकड़ों से मिलती है. ग्लोबल फॉरेक्स रिजर्व में डॉलर की हिस्सेदारी गिरकर 40% पर पहुंच गई है, जो 20 साल के निचले स्तर पर है.बीते 10 सालों में इसमें 18% की गिरावट आई है. भारत की फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व की पॉलिसी में बदलाव करते हुए अपनी रणनीति को बदला है. सिर्फ अमेरिका पर फोकस करने के बजाए भारत अपने निवेश को ज्यादा फैलाने की कोशिश कर रहा है. सिर्फ अमेरिकी डॉलर पर निर्भर रहने के बजाए वो सोने और दूसरे देशों के सरकारी बॉन्ड और करेंसी में निवेश बढ़ा रहा है. जिस तरह से दुनियाभर में युद्ध और अनिश्चितता का माहौल है भारत अपना सारा पैसा एक जगह नहीं रखना चाहता है.अमेरिका पर बढ़ते कर्ज के चलते रिजर्व बैंक ने अमेरिकी बॉन्ड में निवेश घटाया है. इसके अलावा अमेरिकी डॉलर इंडेक्स के हाल में समय में दिखी कमजोरी, अमेरिका में कमजोर होता नौकरी बाजार, बढ़ती महंगाई संकेत दे रहे हैं कि आने वाले दिनों में डॉलर और कमजोर हो सकता है. वहीं जिस तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी फेडरल रिजर्व पर ब्याज दरों में कटौती का दबाव बनाए हुए हैं, लॉग टर्म में डॉलर से जुड़े निवेश को कम आकर्षक बना करेगा.

सोने के सहारे अमेरिका का मुकाबला

अमेरिकी बॉन्ड में निवेश घटाने के बाद रिजर्व बैंक उसे सोने में लगा रहा है. यूएस बॉन्ड से पैसा निकालकर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया सोना खरीद रहा है. भारत का कुल गोल्ड रिजर्व880 टन है, जो पहले 867 टन के करीब था.भारत के कुल फॉरेक्स रिजर्व में सोने की हिस्सेदारी 9 फीसदी से बढ़कर 14 फीसदी पर पहुंच गई है. रिजर्व बैंक सोने में निवेश बढ़ा रहा है, क्योंकि सोना सेफ हेवल माना जाता है. इसकी वैल्यू कभी घटती नहीं बल्कि समय के साथ बढ़ती है. किसी भी वॉर या क्राइसिस की स्थिति में सोना सुरक्षित निवेश माना जाता है. दुनियाभर के सेंट्रल बैंक सोने की खरीदारी बढ़ाकर अपने खजाने को मजबूत कर रहे हैं.