ईरान पर हमले को ‘जंगलराज’ से जोड़ने वाला चीन अंदर से खुश बहुत है! अमेरिका ने रास्ता साफ कर दिया

चीन के लिए ईरान कितना महत्वपूर्ण है, इसे आप ऐसे समझिए कि तेहरान का 90 प्रतिशत तेल बीजिंग को ही बेचा जाता है. प्रतिबंध से बचने के लिए तीसरे देश से होकर चीन पहुंचता है. अब अमेरिका और इजरायल ने बम मारना शुरू किया तो चीन ने रूस के साथ मिलकर यूएन में बैठक कराई, खामेनेई की हत्या की निंदा की. अब इस हमले का जिक्र कर दुनिया के देशों को ‘जंगलराज’ से आगाह कर रहा है लेकिन असल कहानी कुछ और है. अंदर ही अंदर अमेरिका ने उसे बैठे-बिठाए मौका दे दिया है. क्रोनोलॉजी समझिए.

ईरान पर हमला वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को घर से उठवाने की कार्रवाई के कुछ हफ्ते बाद हुआ है. अमेरिका ने यह कहकर मादुरो के खिलाफ ऐक्शन को सही ठहराया कि उन्हें ड्रग्स तस्करी के आरोपों का सामना करने के लिए न्यूयॉर्क लाया गया. हालांकि एक संप्रभु देश के राष्ट्रपति के साथ ऐसा करना क्या सही था? इस पर दुनिया बहस कर ही रही थी कि ईरान के सुप्रीम लीडर को ताबड़तोड़ बमबारी कर अमेरिका-इजरायल ने मार डाला. दोनों घटनाओं से चीन चिंतित दिखा. कुछ दिन पहले जर्मन चांसलर के साथ मीटिंग में चीन के प्रेसिडेंट शी जिनपिंग ने कहा कि साल 2026 की शुरुआत अच्छी नहीं रही.

चीन बाहर से कुछ, अंदर से कुछ
शी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय झगड़े आपस में बहुत गहराई से जुड़े हैं. यह भी कहा कि दुनिया बड़े बदलावों के साथ एक अहम मोड़ पर आ गई है. अब, पश्चिम एशिया में लड़ाई छिड़ने के बाद चीन दुनिया के देशों को ‘जंगल के कानून या जंगलराज’ के खिलाफ चेतावनी दे रहा है. उसने दुनिया के पावरफुल देशों से ‘अपनी बड़ी सैन्य ताकत के आधार पर दूसरे देशों पर मनमाने ढंग से हमला न करने’ की बात कही है.

बीजिंग कह रहा है कि वह अमेरिका नहीं बल्कि संयुक्त राष्ट्र को मजबूत देखना चाहता है और यूरोप के साथ रिश्ते बढ़ाना चाहता है. इस लिहाज से देखिए तो ईरान पर अमेरिका और इजरायल का हमला चीन को अपने सबसे बड़े दुश्मन के खिलाफ भावनाएं भड़काने और ग्लोबल लीडरशिप के उसके दावे को चुनौती देने का एक अच्छा मौका दे रहा है. इस तरह वह यूरोप के करीब जाने की सोच सकता है जो हाल के समय में अमेरिका से उतने खुश नहीं हैं.

ईरान पर हमले से चीन का क्या फायदा?
इसकी वजह खास है. ईरान पर अमेरिका और इजरायल का हमला चीन को भी अपने हितों की रक्षा करने के लिए रास्ता दे रहा है. वो रास्ता जिस पर अमेरिका, ब्रिटेन या उसके कोई भी मित्र देश बोल नहीं पाएंगे. उदाहरण के तौर पर अगर चीन ट्रंप की बातों को सही मान लेता है तो बीजिंग को भी ताइवान स्ट्रेट (जलडमरूमध्य) पार करने और स्वायत्त लोकतांत्रिक आइलैंड पर कभी भी हमला करने की इजाजत है. वह अपनी रक्षा का दावा बड़े आराम से कर सकता है. अब तक अमेरिका ताइवान के साथ दिखते हुए ‘चौधरी’ बन रहा था लेकिन अब चीन को मौका मिल गया है.

असल में बीजिंग ताइवान को चीन का हिस्सा मानता है और जरूरत पड़ने पर इस इलाके को अपने कंट्रोल में करने की कसम खाता रहता है.

बड़ा सवाल बीजिंग के लिए प्राथमिकता का भी है. चीन खुद को एक मजबूत, जिम्मेदार देश के तौर पर दिखाना चाहता है जो अपनी ग्लोबल इमेज सुधारने की उम्मीद में मनमाने ढंग से जबरदस्ती का इस्तेमाल न करे लेकिन मौजूदा घटनाक्रम उसे मौका दे रहा है. अब आने वाले समय में चीन की सरकार भी इस मौके का फायदा उठाकर ताइवान पर कंट्रोल करने के लिए आगे बढ़ सकती है.