शिमला: छोटा पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश कर्ज के पहाड़ तले दबता चला जा रहा है. हिमाचल पर कर्ज का बोझ एक लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने ही वाला है. राज्य के खुद के आर्थिक संसाधन न के बराबर हैं. फिर बजट का अधिकांश हिस्सा सरकारी कर्मियों के वेतन व पेंशनर्स की पेंशन के अलावा कर्ज चुकाने में खर्च हो जाता है. विकास के लिए बजट का मामूली हिस्सा ही बचता है. इधर, मानसून सीजन में हिमाचल प्रदेश हर साल भयावह नुकसान झेलता है. केंद्र की मदद पर निर्भर राज्य आपदा से निपटने के लिए स्पेशल पैकेज की मांग उठाता रहा है. इस बार की त्रासदी ने पीएम नरेंद्र मोदी को भी हिमाचल का एरियल सर्वे करने पर मजबूर कर दिया. पीएम मोदी हिमाचल को अपना दूसरा घर मानते और बताते आए हैं. वे हिमाचल में सक्रिय रहकर यहां के चप्पे-चप्पे से वाकिफ हैं. ऐसे में खुद से त्रासदी के जख्म देखने के बाद उन्होंने 1500 करोड़ रुपए की वित्तीय मदद का ऐलान किया है. इधर, राज्य के सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू दिल्ली में हैं. उन्होंने वित्तायोग के चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया से मिलकर राज्य की मांगें उनके समक्ष रखी हैं. खासकर रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट के तहत एक अच्छा-खासा अमाउंट राज्य को मिले, सीएम ने इसकी पैरवी की है. ऐसे में ये देखना होगा कि राज्य की आर्थिक स्थिति कैसी है, कितना कर्ज है, बजट की रकम कहां-कहां खर्च होती है और आने वाले समय में आत्मनिर्भर होने के लिए कौन से विकल्प हैं. यहां इन बिंदुओं की पड़ताल करेंगे.
कर्ज लेकर चल रही गाड़ी
हिमाचल प्रदेश पर कर्ज का बोझ कोई नया नहीं है. हर सरकार की गाड़ी कर्ज के सहारे ही चली है. अपवाद स्वरूप 15वें वित्तायोग से जब राज्य को अच्छी-खासी रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट मिली तो उससे कुछ राहत महसूस की गई थी. खैर, राज्य पर इस समय 98 हजार करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज हो गया है. हाल ही में संपन्न विधानसभा के मानसून सेशन में कर्ज से जुड़े सवाल के जवाब में राज्य सरकार ने जानकारी दी है कि 98182 करोड़ रुपए का लोन है. इसके जल्द ही एक लाख करोड़ होने के आसार हैं. वित्त वर्ष 2025-26 में मूलधन चुकाने के लिए 4243 करोड़ व ब्याज चुकाने के लिए 6738 करोड़ रुपए से अधिक की रकम का प्रावधान है. ध्यान देने लायक बात ये है कि विधानसभा में राज्य सरकार ने खुद ये स्वीकार किया है कि हिमाचल के खुद के आर्थिक संसाधन सीमित हैं, इसलिए राज्य को केंद्र पर निर्भर होना पड़ता है. जुलाई 2017 से जीएसटी लागू होने के बाद हिमाचल की निर्भरता केंद्र सरकार पर और बढ़ गई. फिर वित्त आयोग की तरफ से अनुशंसित रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट भी निरंतर कम होकर इस वित्त वर्ष में केवल 3257 करोड़ रुपए रह गई है. वर्ष 2020-21 में ये ग्रांट 11431 करोड़ रुपए थी.
बजट का अधिकांश हिस्सा वेतन व पेंशन पर खर्च
हिमाचल में बजट को यदि सौ रुपए के मानक के हिसाब से देखें तो इस बार के बजट (17 मार्च 2025 को पेश) में सरकारी कर्मियों के वेतन पर 25 रुपए, पेंशन पर 20 रुपए, लिए गए कर्ज की ब्याज अदायगी पर 12 रुपए लोन वापसी पर 10 रुपए के अलावा स्वायत्त संस्थाओं की ग्रांट पर 9 रुपए खर्च होते हैं. ऐसे में विकास के लिए महज 24 रुपए ही बचते हैं. पिछले सालों पर नजर डालें तो वर्ष 2021 में हिमाचल के बजट ने पहली बार 50 हजार करोड़ रुपए का आंकड़ा पार किया था. उस समय के बजट में सौ रुपए में सरकारी कर्मियों के वेतन पर 25.31 रुपए खर्च था. इसी तरह पेंशन पर 14.11 रुपए, ब्याज की अदायगी पर 10 रुपए, लोन की अदायगी पर 6.64 रुपए खर्च हुए थे. तब सरकार के पास विकास कार्य के लिए सिर्फ 43.94 रुपए ही बचे थे. नई नियुक्तियों व पेंशनर्स की संख्या में बदलाव के साथ ही वेतन व पेंशन का खर्च बदलता रहता है, लेकिन ये तथ्य अकाट्य है कि बजट का एक बड़ा हिस्सा वेतन-पेंशन, कर्ज-ब्याज अदायगी आदि में चला जाता है.
आपदा से हर साल अरबों का नुकसान
पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश हर साल मानसून सीजन में आपदा के कारण भारी नुकसान सहता है. वर्ष 2023 में 509 लोग मृत्यु का शिकार हुए. इस साल अभी तक 380 लोगों की मौत हुई है. वर्ष 2023 में हुए नुकसान को सदी का सबसे बड़ा नुकसान कहा गया था, लेकिन इस साल तो हालात और भी भयावह हो गए हैं. हिमाचल को वर्ष 2023 में 9000 करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति का नुकसान झेलना पड़ा था. इस साल अभी तक 4306 करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है. मुख्य नुकसान जल शक्ति विभाग व लोक निर्माण विभाग को होता है. सड़कें, पुल टूटने सहित पेयजल व सिंचाई योजनाओं को होता है. विगत आठ साल का हिसाब लगाएं तो हिमाचल को मानसून सीजन में 22 हजार, 647 करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हुआ है. इस अवधि में 3094 लोग मौत का शिकार हुए हैं. ये आंकड़े केवल मानसून सीजन में आपदा के हैं. मानसून सीजन की आपदा का आलम कई बार इतना भयावह हो जाता है कि पीड़ा वर्णन नहीं की जा सकती. उदाहरण के लिए 14 अगस्त 2023 को एक ही दिन में भारी बारिश के कारण हिमाचल में 55 लोग मौत के मुंह में चले गए थे.
आपदा के बाद पुनर्निर्माण चुनौती का पहाड़
हर साल आपदा के दौरान केंद्रीय टीम नुकसान का जायजा लेने आती है. हर सरकार के समय में ये समस्या पेश आती है कि केंद्र से पर्याप्त मुआवजा अथवा नुकसान की भरपाई नहीं हुई. पीडीएनए यानी पोस्ट डिजास्टर नीड्स असेसमेंट के तहत आई रकम को हमेशा नाकाफी बताया जाता रहा है. विगत तीन साल की बात करें तो मानसून सीजन में नुकसान को लेकर केंद्र से विभिन्न मदों में 3247 करोड़ रुपए प्राप्त हुए. ये जानकारी भी हिमाचल विधानसभा के मानसून सेशन में सरकार की तरफ से ही जारी की गई. इ
समें स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट फंड, नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट फंड, स्टेट व नेशनल डिजास्टर मिटीगेशन फंड के तहत मिली रकम आती है. हिमाचल ने पिछले साल भी केंद्र से विशेष पैकेज की मांगी की थी. इस बार भी बाकयदा विधानसभा में प्रस्ताव पास कर हिमाचल में आई आपदा को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने व विशेष पैकेज जारी करने की मांग की गई है. पीएम नरेंद्र मोदी ने फिलहाल 1500 करोड़ रुपए देने का ऐलान किया है.
केंद्र की मदद से ही राहत
वरिष्ठ मीडिया कर्मी धनंजय शर्मा के अनुसार, “इस तथ्य से सभी एकमत हैं कि कर्ज के बोझ तले दबे हिमाचल को केंद्र से विशेष मदद मिले बिना बात नहीं बनेगी. इसमें एक पेंच है. अगर हिमाचल को केंद्र ने विशेष पैकेज दिया तो अन्य पहाड़ी राज्य व नार्थ ईस्ट स्टेट्स भी ऐसी मांग करेगी. राष्ट्रीय आपदा घोषित करने के भी अपने नियम होते हैं. ऐसे में हिमाचल को स्पेशल पैकेज मिलने की संभावनाएं कम हैं. अटल सरकार के समय हिमाचल को स्पेशल इंडस्ट्रियल पैकेज जरूर मिला था, लेकिन वो भी यूपीए सरकार के समय राजनीति का शिकार हो गया था. हिमाचल को मानसून सीजन के दौरान होने वाले नुकसान की भरपाई काफी हद तक केंद्र से मिलने वाली मदद से ही संभव है. राज्य सरकार अपने संसाधनों से पुनर्निर्माण नहीं कर सकती.”
पूर्व मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता रमेश धवाला भी संसाधनों के संदर्भ में खैर की लकड़ी बेचने से लेकर वनों में गिरे हुए पेड़ों को उपयोग में लाने की सलाह दे चुके हैं. कैग ने 2012 में चेताया था कि हिमाचल को अपनी आय के संसाधन तलाशने के लिए एग्रीकल्चर सेक्टर पर ध्यान देना होगा. साथ ही सिंचाई योजनाओं का जाल बिछाने का काम करना होगा.
“हिमाचल हमेशा से ही कर्ज के सहारे रहा है. यहां आय के संसाधन सीमित हैं. पर्यटन व हाइड्रो पावर सेक्टर की भी अपनी सीमाएं हैं. इनसे भी एक हद तक ही आय हो सकती है. ऐसे में राज्य को नए संसाधन तलाशने होंगे. पर्यटन सेक्टर में नए इनिशिएटिव लाने होंगे. नए आकर्षक स्थल खोजने पड़ेंगे. इसके अलावा सरकार को अपने खर्चों पर लगाम लगानी होगी. पूर्व में वीरभद्र सिंह सरकार के समय रिसोर्स मोबिलाइजेशन कमेटी बनी थी, लेकिन न तो कायदे से उसकी सिफारिशें सामने आई और न ही उन पर अमल के प्रयास हुए. सरकारी गाड़ियों के काफिले को कम करने और उनमें पेट्रोल की खपत पर अंकुश लगाने से भी सहायता मिल सकती है. बूंद-बूंद से घड़ा भरने वाली कहावत को चरितार्थ करने की आवश्यकता है.” – केआर भारती, पूर्व वित्त सचिव
सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने दिल्ली में वित्तायोग के चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया से मुलाकात के दौरान कहा कि पिछले तीन साल में मानसून से राज्य को 15 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है. पर्यावरण और बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान की भरपाई के लिए राज्य को उदार आर्थिक सहायता की जरूरत है. सीएम सुक्खू ने अरविंद पनगढ़िया से आग्रह किया कि राज्य को रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट के रूप में सालाना न्यूनतम राशि दस हजार करोड़ रुपए तय की जाए.
वहीं, नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर का भी मानना है कि हिमाचल में इस बार मानसून में भारी तबाही हुई है. सराज क्षेत्र व मंडी जिले के अन्य इलाकों सहित प्रदेश के दूसरे जिलों में नुकसान हुआ है. सड़कें व पुल टूट गए हैं. सिंचाई योजनाएं ध्वस्त हुई हैं. राज्य को पुनर्निर्माण के लिए अधिक से अधिक सहायता मिलनी चाहिए. केंद्र से उदार सहायता मिल रही है. ये आने वाले समय में भी जारी रहनी चाहिए. वहीं, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम कर रहे कुलभूषण उपमन्यू का कहना है कि राज्य को अपने विकास की अवधारणा अपनी ही भौगोलिक परिस्थितियों के हिसाब से बनानी चाहिए.