नीतीश के कमजोर पड़ते ही JDU में बगावत की गुंज, आनंद मोहन के बयान से बिहार की सियासत में बवाल; जानिए अंदर की बात

जेडीयू सांसद लवली आनंद के पति और विधायक चेतन आनंद के पिता पूर्व सांसद आनंद मोहन के बयान पर बिहार में बवाल मचा हुआ है. नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले जेडीयू में ऐसी असहज स्थिति कभी पैदा नहीं हुई थी. पहले जेडीयू के किसी नेता की जुबान नहीं खुलती थी. पहली बार ऐसा हुआ है कि आनंद मोहन ने पार्टी के प्रतिकूल बयान दिए और जेडीयू के नेता लेसी सिंह, संजय सिंह और नीर कुमार ने उन्हीं के अंदाज में जवाब भी दिए हैं. आनंद मोहन भले न बोलें, लेकिन उनकी पीड़ा की मूल वजह चेतन आनंद को मंत्री नहीं बनाया जााना है.

क्या कहा है आनंद मोहन ने?
चेतन को मंत्री पद न मिल पाने के लिए वे नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द रहने वाली चौकड़ी को दोषी ठहरा रहे हैं. जाहिर है कि नीतीश के करीब अभी पार्टी के 3 लोग ही रहते हैं. इनमें एक जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा, दूसरे केंद्रीय मंत्री ललन सिंह और तीसरे विजय चौधरी ही हैं. यानी आनंद मोहन का इशारा इन्हीं तीन की ओर है. उनका गुस्सा इस कदर है कि जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार और उनके बेटे निशांत कुमार पर भी उन्होंने कड़ी टिप्पणी कर दी. उन्होंने कहा है कि दोनों बाप-बेटे को इलाज की जरूरत है. इसीलिए निशांत को स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया है.

जेडीयू में पहली बार कलह
बिहार की राजनीति में पूर्व सांसद और बाहुबली नेता आनंद मोहन के हालिया बयान ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया है. पहली बार जेडीयू में इस तरह का विस्फोट हुआ है. सीतामढ़ी में एक कार्यक्रम के दौरान उनकी तीखी टिप्पणियों ने जेडीयू के अंदरूनी कलह को उजागर किया है. उन्होंने नीतीश कुमार को जिंदा दफन किए जाने का आरोप लगाया और पार्टी को थैली की पार्टी करार दिया. यह बयान न केवल जेडीयू में हलचल का कारक बना है, बल्कि पूरे बिहार की राजनीति को प्रभावित कर रहा है. आनंद मोहन ने जेडीयू पर आरोप लगाया कि जिस नीतीश कुमार ने जेडीयू को खड़ा किया और सत्ता तक पहुंचाया, आज उन्हीं को पार्टी के भीतर नजरअंदाज किया जा रहा है. उन्होंने कहा- जिस व्यक्ति ने जनता दल यूनाइटेड को बनाने से लेकर इस मुकाम तक पहुंचाने में संघर्ष किया, उसी नीतीश कुमार को आज जिंदा दफन कर दिया गया है. उन्होंने पार्टी में पैसे की भूमिका पर भी सवाल उठाए. उनका दावा है कि जेडीयू अब थैली वाली पार्टी बन गई है, जहां मंत्री पद और टिकट पैसे देकर बांटे जा रहे हैं.

निशांत भी लपेटे में आए
नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को स्वास्थ्य मंत्री बनाए जाने पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा- बाप-बेटे दोनों को डॉक्टर की जरूरत है. इसलिए निशांत को स्वास्थ्य विभाग दिया गया. बेटे चेतन आनंद को मंत्री नहीं बनाए जाने पर आनंद मोहन की नाराजगी साफ झलकी. उन्होंने कहा कि चेतन आनंद ने सरकार बचाई, लेकिन उसे नजरअंदाज किया गया, जबकि थैली लेकर जाने वालों को पद मिल रहे हैं. उन्होंने एक चांडाल चौकड़ी का जिक्र भी किया, जो पार्टी को बर्बाद कर रही है. टिकट बंटवारे से मंत्री पद फाइनल करने में जेडीयू के जन 4 नेताओं की प्रमुख भूमिका रही है, उनमें नीतीश कुमार के अलवा संजय झा, केंद्रीय मंत्री ललन सिंह और बिहार के डेप्युटी सीएम विजय चौधरी ही हैं. जाहिर है कि आनंद मोहन का इशारा इसी चौकड़ी की ओर है.

JDU ने भी पलटवार किया
आनंद मोहन के बयान के बाद जेडीयू नेताओं ने तेज पलटवार किया है. भवन निर्माण मंत्री लेसी सिंह ने कहा कि जेडीयू में फैसले अब भी नीतीश कुमार ही लेते हैं. उन्होंने आनंद मोहन को चेतावनी दी कि सोच-समझ कर बोलें. जेडीयू एमएलसी संजय सिंह ने इसे पुत्र मोह बताया और कहा कि आनंद मोहन धृतराष्ट्र बन गए हैं. उनका बेटा मंत्री नहीं बना, इसीलिए ऐसी बातें कर रहे हैं. जेडीयू के अन्य नेताओं ने याद दिलाया कि आनंद मोहन की जेल से रिहाई नीतीश कुमार के प्रयासों का ही नतीजा है. उन्होंने उनके बयान को गलतफहमी और सड़क छाप बताया. जेडीयू का रुख साफ है कि नीतीश कुमार पार्टी के सर्वमान्य नेता हैं और कोई उन्हें दफन नहीं कर सकता.

कहीं टिक नहीं पाते आनंद
आनंद मोहन की राजनीतिक यात्रा अस्थिर रही है. वे विभिन्न पार्टियों में रहे, लेकिन लंबे समय तक टिक नहीं पाए. जनता दल से शुरूआत हुई. फिर समता पार्टी, जेडीयू और अपनी बिहार पीपुल्स पार्टी में रहे. वे राजपूत-भूमिहार एकता के प्रतीक रहे हैं, लेकिन बार-बार पार्टी बदलने और विवादों के कारण स्थायी जगह नहीं बना पाए. हालांकि वे बिहार की ऊपरी जाति की राजनीति में प्रभावशाली आवाज जरूर रहे हैं. 2023 में जेल से रिहाई के बाद जेडीयू से जुड़े, लेकिन अब फिर टकराव की स्थिति है. गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी कृष्णैया की हत्या में लंबे समय तक वे जेल में रहे. उन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई थी. नीतीश कुमार के रहमोकरम पर वे बाहर आ पाए. उनकी रिहाई के लिए नीतीश ने जेल मैन्युअल ही बदल डाला था.

आनंद मोहन की ताकत
आनंद मोहन बिहार के कोसी क्षेत्र के बाहुबली नेता माने जाते हैं. 1954 में सहरसा में जन्मे आनंद मोहन छात्र आंदोलन से राजनीति में आए. 1990 के दशक में राजपूत और भूमिहार समुदायों के बीच एकता का प्रतीक बने. मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद वे इसके विरोध में खड़े हुए. उन्हें सवर्ण जातियों का समर्थन भी मिला. कोसी के इलाके- सहरसा, सीतामढ़ी, शिवहर और मधेपुरा जैसे इलाकों में उनकी सवर्ण वोटरों पर खासी पकड़ है. उनकी छवि बाहुबली पोलिटिशियन की रही है. वे अच्छे वक्ता भी हैं. वे अनडीए और विपक्षी खेमों में हमेशा चर्चा में रहते हैं. उनकी रिहाई के समय भी कई पार्टियां उन्हें अपने पाले में लाने की कोशिश कर चुकी हैं.

आनंद के बयान के निहितार्थ
आनंद मोहन के बयान का निहितार्थ गहरा है. यह जेडीयू के अंदरूनी कलह, उत्तराधिकार की बहस और नीतीश कुमार की कमजोर होती पकड़ को उजागर करता है. यह संकेत देता है कि पार्टी में पैसे और कुछ खास नेताओं का दबदबा बढ़ रहा है. यह बयान एनडीए के अंदर भी दरार पैदा कर सकता है, क्योंकि आनंद मोहन जेडीयू के कलह की तरफ इशारा कर रहे हैं. साथ ही उनके इस आचरण से राजद या अन्य विपक्षी दलों को जेडीयू पर हमला करने का मौका मिल गया है. नीतीश कुमार के स्वास्थ्य और उनके फैसले लेने की क्षमता पर उठे सवाल राजनीतिक अस्थिरता बढ़ा सकते हैं.

गुस्सा इस वजह से तो नहीं
आनंद मोहन का गुस्सा मुख्य रूप से उनके बेटे चेतन आनंद को मंत्री पद न मिलने के कारण है. चेतन आनंद जेडीयू के टिकट पर जीत तो गए, लेकिन कैबिनेट विस्तार में उन्हें जगह नहीं मिली. आनंद मोहन ने इस नाराजगी को छिपाने की कोशिश नहीं की. हालांकि यह सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि बड़े सवाल से जुड़ा है. उन्होंने जेडीयू में मेरिट बनाम मनी की लड़ाई उजागर की है. अगर यह सिर्फ पुत्र मोह होता तो इतना बड़ा बवाल नहीं मचता. यह जेडीयू के संगठनात्मक ढांचे और नीतीश की कमजोर होती भूमिका की ओर इशारा करता है. आनंद को यह बात भी खलती होगी कि नीतीश कुमार की सरकार बचाने के लिए उनके बेटे चेतन आनंद ने राजद से बगावत कर सदन में साथ दिया, मगर जेडीयू उनके इस एहसान को भूल गया.

बिहार की राजनीति पर असर
इस विवाद का बिहार की राजनीति पर व्यापक असर पड़ रहा है. जेडीयू में फूट साफ दिख रही है, जो एनडीए की एकता को प्रभावित कर सकती है. आनंद मोहन जैसे नेता का विद्रोह ऊपरी जाति के वोटों को प्रभावित कर सकता है. राजद-कांग्रेस गठबंधन इसे भुनाने की कोशिश करेगा. नीतीश कुमार की छवि पर भी असर पड़ा है. लंबे समय में यह घटना बिहार में जाति, पैसे और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की राजनीति को फिर उजागर कर सकती है. अगर जेडीयू इस कलह को संभाल नहीं पाया तो पार्टी में बड़े बदलाव भी हो सकते हैं. आनंद मोहन की ताकत और बयान बिहार की सियासत को नई दिशा दे सकते हैं.

तो क्या टूट जाएगा जेडीयू!
नीतीश कुमार के बारे में अभी तक सिर्फ विपक्ष ही यह प्रचारित करता रहा है कि वे अस्वस्थ हैं. पार्टी के फैसले भी वे नहीं कर पाते. इसे विपक्ष का बकवास बता कर जेडीयू या एनडीए के नेता खारिज करते रहे हैं. पर, अब तो जेडीयू से ही इस तरह की बात निकल रही है. वैसे भी नीतीश ने जब से राज्यसभा जाने का फैसला किया, तभी से जेडीयू में जुबान खोलने की शुरुआत हुई है. पहले निशांत को सीएम और बाद में डेप्युटी सीएम बनाने के लिए जेडीयू समर्थकों के एक धड़े ने बवाल काटा. इस मामले में भी निशाने पर संजय झा और ललन सिंह ही रहे. इस बार आनंद मोहन के निशाने पर भी ये ही दोनों हैं.

संजय झा से खुन्नस क्यों?
राजनीति में संजय नामधारी यानी संजय झा, संजय यादव, संजय राऊत, संजय सिंह जैसे लोग जहां भी हैं, उन्होंने पार्टी का कितना भला किया, यह तो वे ही ईमानदारी से बता सकते हैं, पर पार्टी में इनका दबदबा जरूर है. जिन दलों से ये जुड़े हैं, उनके चीफ के भी ये चहेते हैं. संजय झा भाजपा से होकर जेडीयू से जुड़े. नीतीश कुमार के वे इस कदर करीबी बन गए कि पहले एमएलसी बना दिए गए. फिर मंत्री बने. नीतीश ने उन्हें जेडीयू का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया. अभी वे नीतीश की अनुकंपा से राज्यसभा के सदस्य हैं. पहले से ही पार्टी में उन्हें लेकर सभी लोग सहज नहीं रहे हैं. नीतीश के राज्यसभा जाने के फैसले के बाद संजय झा के खिलाफ खुल कर गुस्सा दिखने लगा है. इइसी कड़ी में आनंद मोहन के बयान को भी देखा जाना चाहिए.