खुफिया एजेंसी ने खोली ट्रंप के दावों की पोल! मिसाइलें खत्म होने की बात निकली झूठी, 30 ठिकानों पर ईरान का फिर कब्जा

US-Iran War: मिडिल ईस्ट में जारी भारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बेहद सनसनीखेज दावा किया है. ट्रंप का कहना है कि अमेरिकी हमलों के बाद ईरान की मिसाइल क्षमताएं पूरी तरह से घुटनों पर आ चुकी हैं और अब तेहरान के पास उसके पुराने सैन्य शस्त्रागार का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही बचा है. हालांकि, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की एक सीक्रेट रिपोर्ट ने राष्ट्रपति ट्रंप के इन दावों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छिड़ गई है.

‘मीट द प्रेस’ में दिए एक बेबाक साक्षात्कार में राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरानी सैन्य तंत्र को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है. अपने चिर-परिचित अंदाज में ट्रंप ने कहा कि अगर मैं प्रतिशत के हिसाब से बात करूं, तो हालिया अमेरिकी हमलों के बाद ईरान के पास उसके मिसाइल भंडार का शायद केवल 21 या 22 प्रतिशत हिस्सा ही बचा है. ये बहुत सारी मिसाइलें हैं, लेकिन ये वैसी स्थिति बिल्कुल नहीं है जैसी तब थी जब हमने पहली बार हमला किया था.

ट्रंप ने होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) में जारी समुद्री संकट के जल्द समाधान का भरोसा भी जताया और कहा कि उनके प्रशासन ने कई कमर्शियल तेल टैंकरों को वहां से सुरक्षित निकाला है. उन्होंने भविष्यवाणी की कि जल्द ही तेल की कीमतें पहले से भी नीचे गिर जाएंगी. दरअसल, अमेरिका में आने वाले मध्यावधि चुनावों (Midterm Elections) के बीच पेट्रोल की बढ़ती कीमतों को लेकर ट्रंप घरेलू राजनीतिक दबाव का सामना कर रहे हैं, इसलिए वे इसे अपनी बड़ी कामयाबी के रूप में पेश कर रहे हैं.

33 में से 30 ठिकानों पर ईरान का दोबारा कब्जा
भले ही राष्ट्रपति ट्रंप ईरान की कमर टूटने का दावा कर रहे हों, लेकिन अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का डेटा कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है. न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले महीने ही अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने सांसदों (कांग्रेस) को जो गुप्त आंकड़े दिए हैं, वे ट्रंप के दावों के ठीक उलट हैं. इस खुफिया जानकारी के अनुसार, ईरान ने रणनीतिक रूप से बेहद अहम होर्मुज स्ट्रेट पर स्थित अपने 33 मिसाइल ठिकानों में से 30 पर सफलतापूर्वक अपना नियंत्रण वापस पा लिया है. इतना ही नहीं, रिपोर्ट कहती है कि तमाम अमेरिकी हमलों के बावजूद ईरान के पास अभी भी युद्ध से पहले के मिसाइल भंडार का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा पूरी तरह सुरक्षित मौजूद है.

लेबनान के राष्ट्रपति का ईरान पर तीखा हमला
इस पूरे भू-राजनीतिक ड्रामे के बीच, लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन ने ईरान और उसके द्वारा समर्थित हिजबुल्लाह संगठन के खिलाफ अब तक का सबसे तीखा रुख अपनाया है. सीएनएन पर दिए एक इंटरव्यू में राष्ट्रपति औन ने सीधे ईरान के ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड्स’ को ललकारते हुए कहा कि यह आपका देश नहीं है, यह हमारा देश है… हमारे देश में दखल देना आपका काम नहीं है. लेबनानी राष्ट्रपति ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि ईरान, अमेरिका के साथ अपनी बातचीत में लेबनान को एक ‘सौदेबाजी के हथियार’ (Bargaining Chip) की तरह इस्तेमाल कर रहा है, जो कि बिल्कुल नामंजूर है. उन्होंने हिजबुल्लाह नेता नईम कासिम को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि लेबनान के आम लोग अब युद्ध से पूरी तरह तंग आ चुके हैं, और हिजबुल्लाह को इजरायल के साथ टकराव छोड़कर कूटनीति का रास्ता अपनाना चाहिए.

क्या टिक पाएगा नया युद्धविराम?
हाल ही में वाशिंगटन में इजरायली और लेबनानी दूतों के बीच एक नए युद्धविराम समझौते की रूपरेखा तैयार हुई है, जो हिजबुल्लाह द्वारा हमलों की पूर्ण समाप्ति पर टिकी है. हालांकि, इसकी स्थिरता पर गहरे बादल मंडरा रहे हैं क्योंकि पिछले महीने 17 अप्रैल को हुआ युद्धविराम भी दोनों पक्षों ने तोड़ दिया था. लेबनानी राष्ट्रपति ने इजरायल के राजनीतिक नेतृत्व को भी खुली चुनौती दी और कहा कि केवल बमबारी से कोई युद्ध जीता नहीं जा सकता. उन्होंने कहा कि इजरायल अपनी ताकत से पूरे देश को तबाह तो कर सकता है, लेकिन वे कभी भी अपना रणनीतिक लक्ष्य हासिल नहीं कर पाएंगे. उन्होंने गाजा में भी यही करने की कोशिश की थी, लेकिन हमास आज भी वहां मौजूद है. बता दें कि 1975-1990 के लेबनानी गृहयुद्ध के बाद से केवल हिजबुल्लाह ही ऐसा समूह है जिसे हथियार रखने की इजाजत है, जिसे वह इजरायल के खिलाफ अपना सुरक्षा कवच मानता है. अब देखना यह होगा कि क्या इस कूटनीतिक रस्साकशी के बीच मिडिल ईस्ट शांत होता है या जंग की आग और भड़कती है.