बिना दहेज होती शादी.. बिहार के 150 गांव निभा रहे परंपरा, फिजूल खर्च और दिखावा भी नहीं करते लोग

गयाजी। एक ओर जहां समाज में दहेज प्रथा आज भी बेटियों के परिवारों के लिए बड़ी सामाजिक और आर्थिक चुनौती बनी हुई है, वहीं जिले के इमामगंज विधानसभा क्षेत्र का भोक्ता समुदाय इस कुरीति के खिलाफ वर्षों से एक सशक्त सामाजिक संदेश देता आ रहा है। जंगल-पहाड़ों से घिरे इस क्षेत्र के करीब 150 गांवों में रहने वाला भोक्ता समाज कई पीढ़ियों से बिना दहेज शादी की परंपरा को निभा रहा है। बदलते समय, बढ़ती आधुनिकता और दिखावे की संस्कृति के बीच भी यह परंपरा आज तक अक्षुण्ण बनी हुई है।

हिंदू रीति-रिवाज से होती है शादी
भोक्ता समुदाय के लोगों का रहन-सहन आम ग्रामीण परिवारों जैसा ही है। वे खेती-बाड़ी, मजदूरी, सरकारी सेवा और छोटे व्यवसाय से जुड़े हैं। लेकिन सामाजिक सोच के मामले में यह समाज एक अलग पहचान रखता है। यहां बेटा और बेटी की शादी पूरी तरह हिंदू रीति-रिवाज से संपन्न होती है, लेकिन दहेज लेना सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं माना जाता। सबसे खास बात यह है कि विवाह को लेन-देन का सौदा नहीं, बल्कि दो परिवारों के पवित्र रिश्ते के रूप में देखा जाता है।

पूर्वजों ने बनाया था नियम
समाज के बुजुर्ग बताते हैं कि इस परंपरा की जड़ें कई पीढ़ियों पुरानी है। उनके पूर्वजों ने यह तय किया था कि विवाह में दहेज जैसी प्रथा को कभी स्थान नहीं दिया जाएगा। उसी सामाजिक अनुशासन और सामूहिक सहमति का परिणाम है कि आज भी भोक्ता समाज में एक रुपये का दहेज लेना भी गलत माना जाता है। यही कारण है कि यहां शादी-ब्याह में अनावश्यक तड़क-भड़क और शाही खर्च से भी दूरी रखी जाती है।

आर्थिक क्षमता के अनुसार शादी का आयोजन
विवाह समारोह सादगीपूर्ण होते हैं। दोनों पक्ष अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार शादी का आयोजन करते हैं। कोई प्रतिस्पर्धा नहीं, कोई दिखावा नहीं और न ही आर्थिक बोझ का दबाव। इससे बेटियों के परिवार को सम्मान मिलता है और विवाह खुशियों का अवसर बना रहता है, चिंता का नहीं।

इमामगंज प्रखंड के जंगल और पहाड़ों से घिरे गांव पथलधसा में इस वर्ष एक बार फिर इस परंपरा की मिसाल देखने को मिली। गांव के मुनारिक सिंह भोक्ता ने अपने बेटे की शादी बिना दहेज के संपन्न कर समाज के सामने सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत किया। परिवार के लोगों ने साफ कहा कि उन्हें दहेज नहीं, संस्कार और अच्छे रिश्ते चाहिए।

सरकारी नौकरी के बावजूद बिना दहेज के शादी
ऐसी ही प्रेरक मिसाल तारचुआ गांव में भी देखने को मिली। यहां भगवती सिंह भोक्ता के पुत्र, जो बिहार पुलिस में कार्यरत हैं, की शादी भी बिना दहेज के हुई। सरकारी नौकरी होने के बावजूद परिवार ने दहेज लेने से साफ इनकार कर दिया। समाज के लोगों का कहना है कि नौकरी या आर्थिक स्थिति चाहे जितनी बेहतर हो जाए, दहेज लेना उनकी परंपरा के खिलाफ है।

चपरवार गांव के देवनंद सिंह भोक्ता के पुत्र अशोक सिंह भोक्ता, जो बिहार पुलिस में कार्यरत हैं, ने भी बिना दहेज विवाह कर समाज की इस परंपरा को मजबूती दी।

भोक्ता समुदाय में शिक्षा का स्तर बढ़ रहा
अशोक कहते हैं कि शिक्षित समाज वही है जो अच्छी परंपराओं को बचाकर रखे। दहेज लेना शिक्षा और संस्कार दोनों के विरुद्ध है। भोक्ता समुदाय में शिक्षा का स्तर लगातार बढ़ रहा है। जिन गांवों में कभी शिक्षा की पहुंच सीमित थी, वहां अब नई पीढ़ी पढ़-लिखकर आगे बढ़ रही है।

समुदाय के कई युवा बिहार पुलिस, शिक्षा सेवक और अन्य सरकारी पदों पर कार्यरत हैं। शिक्षा ने उनकी आर्थिक स्थिति और सोच दोनों को मजबूत किया है, लेकिन परंपरा के मूल सादगी , सम्मान और समानता आज भी बरकरार हैं।

पीढ़ियों से बिना दहेज की शादी
इमामगंज के पकरी गुरिया के पूर्व पंचायत समिति सदस्य उपेंद्र सिंह भोक्ता बताते हैं कि हमारे समाज में कई पीढ़ियों से बिना दहेज शादी होती आ रही है। हमने अपने बुजुर्गों से यही सीखा है कि बेटी कोई बोझ नहीं होती। शादी रिश्तों का बंधन है, व्यापार नहीं। इसलिए हम दहेज लेने या देने में विश्वास नहीं रखते।

उनकी बातों में समाज की गहरी संवेदना झलकती है। आज जब दहेज के कारण कई परिवार कर्ज में डूब जाते हैं, बेटियों की शादी में वर्षों की कमाई खर्च हो जाती है और कई बार रिश्ते टूट भी जाते हैं, ऐसे समय में भोक्ता समाज का यह माडल पूरे राज्य के लिए सीख बन सकता है।

सामाजिक संकल्प से खत्म होगी दहेज प्रथा
सामाजिक जानकारों का मानना है कि यदि समाज के अन्य वर्ग भी ऐसी सोच अपनाएं तो दहेज जैसी कुप्रथा को जड़ से खत्म किया जा सकता है। कानून अपने स्तर पर काम करता है, लेकिन वास्तविक बदलाव तब आता है जब समाज स्वयं संकल्प ले। इमामगंज का भोक्ता समाज यही साबित कर रहा है कि परिवर्तन के लिए बड़े संसाधनों की नहीं, मजबूत सामाजिक इच्छाशक्ति की जरूरत होती है। जंगल-पहाड़ों के बीच बसे ये गांव आज पूरे बिहार को एक बड़ा संदेश दे रहे हैं बेटी सम्मान है, दहेज नहीं।

यह परंपरा केवल एक सामाजिक नियम नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का उत्सव है। ऐसे समय में जब रिश्तों पर बाजारवाद का असर बढ़ रहा है, इमामगंज के इन गांवों से उठती यह आवाज उम्मीद जगाती है कि समाज में अच्छाई अभी भी जीवित है और वही भविष्य को दिशा दे सकती है।