What is Delimitation Bill: भारत की राजनीति में इन दिनों विपक्षी खेमों में टूट की चर्चा तेज है। ममता बनर्जी की टीएमसी बुरी तरह बिखर चुकी है। इसके अलावा, उद्धव ठाकरे की पार्टी में भी बगावत हो चुकी है। इन दोनों सियासी घटनाओं के बाद लोकसभा सीटों की संख्या को लेकर एक बार फिर सरगर्मियां तेज हो गई हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है परिसीमन विधेयक। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार इस बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले विधेयक को पारित कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत का गणित साधने में जुटी है। विपक्षी दलों में मची उथल-पुथल ने इस चर्चा को और हवा दे दी है।
क्या है परिसीमन विधेयक और क्यों है विवाद?
परिसीमन का सीधा अर्थ है देश में जनसंख्या के बदलावों के आधार पर लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को दोबारा तय करना। भारतीय संविधान के अनुसार, हर जनगणना के बाद सीटों का पुनर्गठन होना चाहिए लेकिन दक्षिणी राज्यों के विरोध के बाद 1976 में 42वें संशोधन द्वारा इस पर रोक लगा दी गई थी, जिसे बाद में 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया था। मोदी सरकार का प्रस्ताव इस बिल के जरिए लोकसभा की कुल सीटों की संख्या को मौजूदा 543-550 से बढ़ाकर लगभग 850 करने का है।
सरकार का तर्क है कि देश की आबादी 1971 के बाद से बहुत बढ़ चुकी है। एक-एक सांसद 40 से 50 लाख मतदाताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जिससे विकास कार्यों में बाधा आती है। वहीं, दक्षिणी राज्यों जैसे कि तमिलनाडु, केरल का मानना है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के उपायों को कड़ाई से लागू किया जबकि उत्तर भारत के राज्यों जैसे कि उत्तर प्रदेश, बिहार में आबादी तेजी से बढ़ी। अगर आबादी के आधार पर सीटें बढ़ीं तो हिंदी भाषी राज्यों का लोकसभा में दबदबा हो जाएगा और दक्षिण भारत राजनीतिक रूप से हाशिए पर चला जाएगा।
जब पास नहीं हो सका बिल
यह पूरा मामला तब और गरमा गया जब 17 अप्रैल 2026 को मोदी सरकार को अपने कार्यकाल में पहली बार किसी बड़े संविधान संशोधन विधेयक पर संसद में हार का सामना करना पड़ा। सरकार महिला आरक्षण को जमीन पर उतारने और लोकसभा विस्तार के लिए एक तीन-विधेयक का पैकेज लेकर आई थी, जिसमें मुख्य रूप से 131वां संविधान संशोधन विधेयक 2026 शामिल था।
इसे पास कराने के लिए लोकसभा में उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत यानी कि कम से कम 352 वोट की आवश्यकता थी। उस दिन संसद में 528 सांसद उपस्थित थे। इस बिल के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। सरकार इस बिल को पास कराने से चूक गई। उसे 54 और वोटों की आवश्यक्ता थी। INDIA गठबंधन ने एकजुट होकर इस बिल का विरोध किया। विपक्ष का आरोप था कि सरकार महिला आरक्षण की आड़ में देश का चुनावी नक्शा बदलना चाहती है। इस ऐतिहासिक शिकस्त के बाद सरकार को मुख्य संविधान संशोधन के साथ-साथ उससे जुड़े परिसीमन विधेयक 2026 को भी वापस लेना पड़ा था।
क्या बीजेपी का रास्ता हो रहा है साफ?
अप्रैल की इस करारी हार के बाद मोदी सरकार चुप नहीं बैठी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मॉनसून सत्र में इस बिल को दोबारा लाने की तैयारी है और इसके लिए विपक्षी खेमे में बड़ी सेंधमारी चल रही है। हाल के घटनाक्रम इसकी गवाही देते हैं।
तृणमूल कांग्रेस में बड़ी बगावत
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी को बड़ा झटका लगा है। टीएमसी के 29 लोकसभा सांसदों में से लगभग 20 सांसदों ने बगावती रुख अपनाते हुए लोकसभा अध्यक्ष से संसद में अलग बैठने की व्यवस्था करने की मांग की है। यदि ये बागी सांसद एनडीए के पक्ष में मतदान करते हैं या वॉकआउट करते हैं, तो सरकार का आंकड़ा काफी मजबूत हो जाएगा।
उद्धव ठाकरे की शिवसेना पर मंडराता संकट
महाराष्ट्र में भी राजनीतिक हलचल तेज है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) के 9 लोकसभा सांसदों में से 5 से 6 सांसदों के टूटने की अटकलें गर्म हैं। हालांकि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने दावा किया है कि सभी सांसद एकजुट हैं, लेकिन मातोश्री में हुई आपातकालीन बैठकों से साफ है कि उद्धव खेमे में भी ‘ऑपरेशन टाइगर’ का डर बना हुआ है।
डीएमके ने बढ़ाई विपक्ष की चिंता
तमिलनाडु में कांग्रेस और अन्य दलों के साथ समीकरण बदलने के बाद एम.के. स्टालिन की पार्टी डीएमके भी इंडिया गठबंधन से दूरी बनाती दिख रही है। सूत्रों की मानें तो यदि डीएमके के 22 सांसद वोटिंग के दौरान अनुपस्थित हो जाते हैं, तो सदन की कुल संख्या कम हो जाएगी, जिससे दो-तिहाई बहुमत का जादुई आंकड़ा 360 से घटकर लगभग 345 पर आ जाएगा। इसे हासिल करना बीजेपी के लिए बेहद आसान हो जाएगा।
मोदी सरकार इस बार परिसीमन विधेयक को एक देश, एक चुनाव (One Nation, One Election) के बड़े एजेंडे के साथ जोड़कर पेश कर सकती है। राज्यसभा में भी आगामी चुनावों के बाद एनडीए की ताकत बढ़ने की उम्मीद है।