खतरे में युवा पीढ़ी… हिमाचल में सिर्फ चिट्टे का ही नहीं, कई नशों का फैला है जाल; कैसे निकले समाधान?

शिमला। हिमाचल में नशे का कारोबार तेजी से स्वरूप बदल रहा है। कभी चरस के लिए बदनाम रहा प्रदेश अब चिट्टा, एलएसडी, अफीम, गांजा, नशीली गोलियों की तस्करी का बड़ा ट्रांजिट और उपभोक्ता राज्य बन चुका है। पुलिस और एसटीएफ की कार्रवाई बताती है कि राज्य में सबसे अधिक मामले अब चिट्टे के आ रहे हैं।

प्रदेश में अवैध नशा कारोबार में करीब 70 प्रतिशत हिस्सेदारी चिट्टे की हो चुकी है। चिट्टा कम मात्रा में अधिक नशा देता है, आसानी से छिपाया और एक जिले से दूसरे जिले तक पहुंचाया जा सकता है।

पंजाब से लगी सीमा के कारण इसकी तस्करी के नेटवर्क हिमाचल तक आसानी से पहुंच रहे हैं। सोशल मीडिया, आनलाइन भुगतान और कुरियर सेवाओं का इस्तेमाल कर तस्कर नए तरीके अपना रहे हैं। एक समय प्रदेश में चरस की तस्करी सबसे बड़ी चुनौती थी, लेकिन अब पुलिस रिकॉर्ड बताता है कि एनडीपीएस मामलों में चिट्टे से जुड़े केस लगातार बढ़े हैं।

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पूरे प्रदेश में एंटी-चिट्टा अभियान चलाया जा रहा है। पुलिस के साथ स्पेशल टास्क फोर्स सक्रिय है। पंचायतों को रेड, येलो और ग्रीन जोन में वर्गीकृत किया गया। बड़े तस्करों पर पीआइटी-एनडीपीएस एक्ट के तहत कार्रवाई की गई और नशा तस्करों की अवैध संपत्तियां जब्त की गई हैं। पुलिस का दावा है कि अभियान के बाद कई अंतरराज्यीय गिरोहों को पकड़ा गया है। अकेले शिमला पुलिस ने 2026 में अब तक 19 ड्रग नेटवर्क ध्वस्त किए और कई बड़े सप्लायरों तक पहुंच बनाई।

प्रदेश में विशेष अभियान चलाकर सैकड़ों वाहनों की जांच, संदिग्धों के नमूने और लगातार छापेमारी की जा रही है। सरकार ने नशा कारोबार से जुड़ी करीब 51 करोड़ रुपये की संपत्तियों पर कार्रवाई भी शुरू की है और इस मॉडल में राष्ट्रीय स्तर पर भी रुचि दिखाई गई है।

कुछ माह पहले शिमला पुलिस ने करीब एक करोड़ रुपये की 562 एलएसडी स्ट्रिप्स बरामद कर यह संकेत दिया कि अब तस्कर पारंपरिक नशों से आगे बढ़कर महंगे सिंथेटिक ड्रग्स का नेटवर्क भी चला रहे हैं।