South Korea Dog Meat Ban: साउथ कोरिया में अगले साल यानी फरवरी 2027 से डॉग मीट की बिक्री, उनके पालने और काटने पर पूरी तरह से बैन लगने जा रहा है. इस ऐतिहासिक कानून की तारीफ पूरी दुनिया में हो रही है, लेकिन इसके पीछे से एक बेहद परेशान करने वाली खबर आ रही है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में जिन फार्म्स में करीब 4 से साढ़े 4 लाख कुत्ते थे, वहां अब सिर्फ 20 हजार बचे हैं. सवाल उठ रहा है कि आखिर बाकी के लाखों कुत्ते अचानक कहां गायब हो गए? आशंका जताई जा रही है कि कानून लागू होने से पहले ही उन्हें काटकर खा लिया गया है.
साउथ कोरिया की सरकार के पास इस बात का कोई रिकॉर्ड नहीं है कि फार्म्स से गायब हुए लाखों कुत्ते कहां गए. वहां के कृषि मंत्रालय के एक इंस्पेक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उनका काम सिर्फ यह देखना है कि मुआवजा देने से पहले फार्म में कुत्ते न हों. वे इस बात की जांच नहीं कर रहे हैं कि कुत्तों का क्या किया गया. डेटा के मुताबिक, सिर्फ 623 कुत्तों को ही लोगों ने गोद लिया और 500 से कम कुत्ते शेल्टर होम भेजे गए. ऐसे में लाखों कुत्तों का गायब होना बड़े सवाल खड़े करता है.
क्या पहले ही काट दिए गए बेजुबान?
एनिमल राइट्स से जुड़ी संस्था ‘CARE’ के किम यंग-हवान का कहना है कि अगर इतनी बड़ी संख्या में कुत्ते बचाए जाते, तो हमें जरूर पता चलता. उन्होंने आशंका जताई कि कानून लागू होने के डर से और मुआवजे के लालच में इन कुत्तों को पहले ही मार दिया गया है. साउथ कोरिया में लोग घरों में छोटे कुत्ते पालना पसंद करते हैं, जबकि मीट वाले कुत्ते बड़े होते हैं. पूर्व डॉग फार्मर जू योंग-बोंग ने भी माना कि लापता हुए ज्यादातर कुत्ते शायद ‘पहले ही खाए’ जा चुके हैं.
बूचड़खानों की खौफनाक हकीकत
साउथ कोरिया में कुत्तों को कभी भी आधिकारिक तौर पर गाय या सुअर की तरह लाइवस्टॉक का दर्जा नहीं मिला. इसका फायदा उठाकर यह इंडस्ट्री बिना किसी नियम-कानून के चलती रही. पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि यहां कुत्तों को करंट देकर, फांसी पर लटकाकर या पीट-पीटकर बेरहमी से मारा जाता था. हाल ही में एक बंद पड़े बूचड़खाने में कुत्तों की खोपड़ियां और करंट लगाने वाले उपकरण मिले हैं, जो इसकी क्रूरता को बयां करते हैं.
किसानों का दर्द और गुस्सा
सरकार हर कुत्ते को हटाने के बदले किसानों को करीब 600,000 वॉन (यानी लगभग 39,000 रुपये) का मुआवजा दे रही है. लगभग 82% फार्म मालिकों ने काम बंद करने के लिए अप्लाई भी कर दिया है. लेकिन कई पूर्व किसान इस बैन से नाराज हैं. एक पादरी जू योंग-बोंग ने कहा कि यह बैन राजनीतिक वजहों से लगाया गया है और यह उनके साथ धोखा है. किसान अब दूसरा बिजनेस शुरू करना चाहते हैं, लेकिन सरकारी कागजी कार्रवाई बहुत धीमी है.