Earth Warming: ग्लोबल वार्मिंग की प्रक्रिया यूं ही जारी रही तो भविष्य में क्या होगा? अमेरिकी वैज्ञानिकों को तकरीबन 4 दशकों के रिसर्च में चौंकाने वाले तथ्य मिले हैं. इसके साथ ही दशकों पुराना मिथ यानी धारणा भी टूटी है. वैज्ञानिकों के शोध का लब्बोलुआब यह है कि यदि इंसान अपनी फितरत से बाज नहीं आता है तो आने वाला समय काफी तबाही वाला हो सकता है. दुनिया का तापमान लगातार बढ़ रहा है और इंसान इंच दर इंच तबाही के करीब पहुंचता जा रहा है.
क्लाइमेट चेंज को लेकर वैज्ञानिकों की चार दशक लंबी रिसर्च ने एक ऐसा खुलासा किया है, जिसने पृथ्वी के भविष्य को लेकर चिंता और बढ़ा दी है. अब तक माना जाता था कि जंगलों की मिट्टी में मौजूद गहराई वाले स्थायी कार्बन भंडार (Stable Soil Carbon) सुरक्षित रहते हैं और उनपर बढ़ते तापमान का खास असर नहीं पड़ता. लेकिन 37 से 40 वर्षों तक चले एक अध्ययन में सामने आया है कि लगातार बढ़ती गर्मी इन गहरे कार्बन भंडारों को भी तोड़ रही है, जिससे बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) वातावरण में पहुंच सकती है. इससे ग्लोबल वार्मिंग का चक्र और तेज होने की आशंका है.
यह अध्ययन अमेरिका के मैसाचुसेट्स स्थित हार्वर्ड फॉरेस्ट में किया गया, जहां लगभग 1,600 हेक्टेयर क्षेत्र में वैज्ञानिक पिछले कई दशकों से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं. इस जंगल की सतह से करीब 10 सेंटीमीटर नीचे विशेष तारों का एक नेटवर्क बिछाया गया है, जो पिछले 35 वर्षों से लगातार मिट्टी को उसके सामान्य तापमान से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म रख रहा है. इसका उद्देश्य भविष्य में जलवायु परिवर्तन से होने वाली संभावित गर्मी की परिस्थितियों का कृत्रिम रूप से निर्माण करना था. इस अध्ययन का नेतृत्व मरीन बायोलॉजिकल लेबोरेटरी के वैज्ञानिक जेरी मेलिलो ने किया, जो पिछले 37 वर्षों से इस प्रोजेक्ट से जुड़े हैं. वैज्ञानिकों ने प्रयोग की शुरुआत में 5 डिग्री सेल्सियस अतिरिक्त तापमान इसलिए चुना था, क्योंकि उस समय इसे वैश्विक तापमान वृद्धि के संभावित ऊपरी स्तर के रूप में देखा जा रहा था.
रिसर्च के चौथे दशक में वैज्ञानिकों ने पाया कि मिट्टी में मौजूद वे स्थायी कार्बनिक पदार्थ (जिन्हें अब तक बेहद स्थिर और सुरक्षित माना जाता था) वे भी टूटने लगे हैं. इनके विघटन (Decompose) से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में निकल रही है. इससे संकेत मिलता है कि भविष्य में जंगलों की मिट्टी अनुमान से कहीं अधिक कार्बन वातावरण में छोड़ सकती है. वैज्ञानिकों के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया में सूक्ष्मजीवों यानी माइक्रोब्स की अहम भूमिका है. माइक्रोब्स मिट्टी में मौजूद जैविक पदार्थों (Bio-Matter) को तोड़ते हैं और पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों का रीसायकल करते हैं. लेकिन बढ़ते तापमान के कारण इन सूक्ष्मजीवों की संरचना और व्यवहार बदल रहा है, जिससे मिट्टी में जमा कार्बन तेजी से खत्म हो रहा है.
यह खोज इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि दुनिया की मिट्टी में लगभग 3,500 अरब मीट्रिक टन कार्बन संग्रहित है, जो पृथ्वी के पूरे वायुमंडल में मौजूद कार्बन से कई गुना अधिक है. अब तक यह माना जाता था कि गहराई में मौजूद यह कार्बन हजारों वर्षों तक सुरक्षित रहेगा, लेकिन नए अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दे दी है. शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे एक खतरनाक ‘क्लाइमेट फीडबैक लूप’ बनने का खतरा है. यानी जैसे-जैसे पृथ्वी गर्म होगी, मिट्टी से और अधिक कार्बन डाइऑक्साइड निकलेगी, जिससे तापमान और बढ़ेगा. बढ़ा हुआ तापमान फिर मिट्टी से और अधिक कार्बन मुक्त करेगा. यह चक्र जलवायु परिवर्तन को और तेज कर सकता है.
अध्ययन के दौरान जंगल के पर्यावरण में भी कई बदलाव दर्ज किए गए. पहले की तुलना में वर्षा बढ़ी, बर्फबारी कम हुई और गर्मियों में सूखे की स्थिति अधिक गंभीर हुई. कई पेड़ बीमारियों का शिकार होने लगे, जबकि कुछ बाहरी आक्रामक प्रजातियों ने जंगल में प्रवेश करना शुरू कर दिया. मिट्टी की ऊपरी परत में रहने वाले बैक्टीरिया की आबादी और संरचना में भी उल्लेखनीय बदलाव देखे गए. वैज्ञानिकों के अनुसार औद्योगिक क्रांति के बाद से वैश्विक औसत तापमान पहले ही 1.1 से 1.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है. जेरी मेलिलो का कहना है कि भविष्य में तापमान कितना बढ़ेगा, यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि दुनिया ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कितनी तेजी से कम करती है. यदि जीवाश्म ईंधनों के उपयोग से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी लाई जाए और वनों की कटाई रोकी जाए, तो तापमान वृद्धि को सीमित किया जा सकता है.
शोधकर्ताओं का मानना है कि इस नई खोज को जलवायु परिवर्तन के वैश्विक मॉडलों में शामिल करना बेहद जरूरी है. अब तक अधिकांश जलवायु मॉडल केवल अल्पकालिक कार्बन उत्सर्जन को ध्यान में रखते थे, लेकिन यह 37 वर्षीय अध्ययन बताता है कि मिट्टी की गहरी परतों से दशकों तक धीरे-धीरे निकलने वाला कार्बन भी भविष्य के जलवायु आकलन में शामिल किया जाना चाहिए. वैज्ञानिकों के मुताबिक इससे पृथ्वी के कार्बन चक्र को बेहतर ढंग से समझने और जलवायु परिवर्तन के अधिक सटीक पूर्वानुमान लगाने में मदद मिलेगी.