ईरान ने अपने कुंभकरण को नींद से जगाया, अब दुनिया की धड़कन बंद करने की तैयारी

Iran War: अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध का परिणाम पूरी दुनिया भुगत रही है. अब इसके और भी व्‍यापक एवं खतरनाक होने की आशंका बढ़ गई है. ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर अयातुल्‍ला अली खामनेई ने जिस रेजिस्‍टेंस फ्रंट को तैयार किया था, अब उसको एक्टिव करने का समय आ गया है. दरअसल, तेहरान की ओर से यमन के हूती विद्रोहियों को यह संदेश भिजवाया गया है कि यदि अमेरिका की ओर से उसके क्रिटिकल एसेट्स (ऑयल प्‍लांट और अन्‍य महत्‍वपूर्ण इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर) पर किसी भी तरह का अटैक किया गया तो वह लाल सागर को शिपिंग के लिए बंद कर दे. रेड सी में ही बाल-अल-मंदेब स्‍ट्रेट (Bab el-Mandeb Strait) स्थित है. होर्मुज स्‍ट्रेट के बाद यदि इस समुद्री गलियारे में भी जहाजों का आवागमन प्रभावित होता है तो यह पूरी दुनिया में तेल और गैस की सप्‍लाई के लिहाज से काफी विनाशकारी हो सकता है. यह भारत के लिए भी चिंता का सबब बन सकता है, क्‍योंकि रूस से तेल आयात इसी रूट से होता है. बता दें कि भारत अपन ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्‍सा होर्मुज जलडमरूमध्‍य से आयात करता है. होर्मुज के बाधित होने से बाब-अल-मंदेब (Bab el-Mandeb) मजबूत वैकल्पिक मार्ग बनकर उभरा है, पर अमेरिका-ईरान के बीच टकराव बढ़ने की स्थिति में हालात बेकाबू हो सकते हैं.

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंताओं को और गहरा कर दिया है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने यमन के हूती विद्रोहियों से कहा है कि यदि अमेरिका ईरान के बिजली और एनर्जी इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर पर बड़े हमले करता है तो वे लाल सागर (रेड सी) के रणनीतिक बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य को बंद करने की तैयारी रखे. यदि ऐसा होता है तो मध्य पूर्व से दुनिया तक तेल की आपूर्ति के दो सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग एक साथ प्रभावित हो सकते हैं, जिससे वैश्विक तेल संकट और गहरा सकता है. रॉयटर्स ने दो सीनियर ईरानी सूत्रों के हवाले से बताया कि इस योजना पर ईरान के शीर्ष नेतृत्व के भीतर चर्चा हुई और इसका संदेश हूती लीडरशिप तक पहुंचा दिया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, हाल ही में हूती संगठन को इस संबंध में औपचारिक रूप से अवगत कराया गया है.

बाल-अल-मंदेब के आसपास मिसाइल और ड्रोन की तैनाती
रॉयटर्स के अनुसार, हूती संगठन से जुड़े एक सूत्र ने बताया कि विद्रोहियों ने बाब-अल-मंदेब स्‍ट्रेट के आसपास मिसाइलों और ड्रोन की तैनाती कर दी है और वे हमले शुरू करने के आदेश का इंतजार कर रहे हैं. रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के प्रतिनिधि यह तय करेंगे कि जलडमरूमध्य को कब और कैसे बंद किया जाए. यदि बाब-अल-मंदेब मार्ग बाधित होता है तो इसका असर पहले की तुलना में कहीं अधिक गंभीर होगा. फरवरी के अंत में होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान की कार्रवाई के बाद खाड़ी क्षेत्र से तेल निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ था. इसके बाद लाल सागर ग्‍लोबल ऑयल सप्‍लाई एंड शिपमेंट का प्रमुख वैकल्पिक मार्ग बनकर उभरा. जहाजों की निगरानी करने वाली संस्‍था क्लेपर (Kpler) के आंकड़ों के अनुसार, जून में बाब-अल-मंदेब से प्रतिदिन लगभग 74 लाख बैरल कच्चा तेल गुजरा, जो वैश्विक उत्पादन का करीब 7 प्रतिशत है. एक वर्ष पहले यह मात्रा लगभग 42 लाख बैरल प्रतिदिन थी.

सऊदी अरब ने भी अपनी अधिकतम तेल खेपों को लाल सागर स्थित यानबू बंदरगाह के जरिए भेजना शुरू कर दिया है. इसके साथ ही रियाद लाल सागर तक अपनी कच्चे तेल की पाइपलाइन क्षमता बढ़ाने पर भी विचार कर रहा है. ऐसे में यदि बाब-अल-मंदेब बंद होता है तो केवल जहाजों की आवाजाही ही नहीं रुकेगी, बल्कि खाड़ी क्षेत्र के तेल निर्यात के दोनों प्रमुख समुद्री मार्ग (होर्मुज और लाल सागर) एक साथ प्रभावित होंगे. यही वह स्थिति है जिसकी आशंका अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार लंबे समय से जता रहा है.
भारत पर भी पड़ सकता है गंभीर असर

इस संकट का असर भारत पर भी पड़ सकता है. भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों और रूस से आयात करता है. खाड़ी से आने वाला तेल होर्मुज और वैकल्पिक रूप से लाल सागर के रास्ते आता है, जबकि रूस से आने वाला यूराल्स कच्चा तेल स्वेज नहर और बाब-अल-मंदेब के जरिए भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचता है. यदि दोनों मार्ग बाधित होते हैं तो भारत को तेल आपूर्ति, शिपिंग लागत और ऊर्जा कीमतों के मोर्चे पर अतिरिक्त दबाव झेलना पड़ सकता है.

अमेरिका मानने को तैयार नहीं
इस बीच क्षेत्र में सैन्य तनाव लगातार बढ़ रहा है. अमेरिकी सेना ने शुक्रवार को बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर ईरान के खिलाफ लगातार छठी रात भी सैन्य कार्रवाई की गई. अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) के अनुसार, लड़ाकू विमानों, ड्रोन और युद्धपोतों की मदद से ईरान के कई सैन्य ठिकानों, तटीय निगरानी प्रणालियों, वायु रक्षा केंद्रों, सैन्य रसद ढांचे और समुद्री क्षमताओं को निशाना बनाया गया. अमेरिकी हमलों के जवाब में ईरान ने भी पलटवार करते हुए कुवैत, कतर, बहरीन और जॉर्डन में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया. दोनों देशों के बीच लगातार बढ़ते सैन्य संघर्ष और लाल सागर में संभावित नाकेबंदी की आशंका ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार को एक बार फिर गंभीर अनिश्चितता के दौर में पहुंचा दिया है.