होर्मुज टेंशन से 120 डॉलर का डर लौटा वापस, भारत का दांव पर लगा है बहुत कुछ

नई दिल्‍ली: गोल्डमैन सैक्स ग्रुप इंक. ने बड़ी चेतावनी दी है। उसका कहना है कि अगर होर्मुज स्‍ट्रेट में रुकावटें जारी रहती हैं तो चौथी तिमाही तक ब्रेंट क्रूड की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती है। हालांकि, इन्वेस्टमेंट बैंक ने कहा कि ऐसी स्थिति की उसे बहुत उम्मीद नहीं है।

20 जुलाई के एक नोट में डान स्ट्रुवेन के नेतृत्व में एनालिस्ट्स ने कहा कि मिडिल ईस्‍ट में बढ़ते तनाव और फारस की खाड़ी से तेल की सप्लाई में भारी गिरावट ने एक बार फिर क्रूड की कीमतों को बढ़ा दिया है।

एनालिस्ट्स ने कहा, ‘मिडिल ईस्‍ट में तनाव बढ़ने और फारस की खाड़ी से तेल की सप्लाई के युद्ध-पूर्व स्तर के 45% से भी कम हो जाने के कारण तेल की कीमतें फिर से बढ़ गई हैं।’

तेल की कीमतों का आउटलुक
यह चेतावनी फरवरी के अंत में ईरान के साथ अमेरिका-इजरायल के टकराव के कुछ महीनों बाद आई है। उस समय कई एनालिस्ट्स ने अनुमान लगाया था कि अगर होर्मुज स्‍ट्रेट से सप्लाई में भारी रुकावट आती है तो क्रूड की कीमतें 150 डॉलर या 200 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ सकती हैं। इस रास्‍ते से दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल गुजरता है।

हालांकि, वे अनुमान पूरी तरह सच साबित नहीं हुए। ब्रेंट फ्यूचर्स की कीमत लगभग 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। यह 2008 में बने 147 डॉलर के रिकॉर्ड ऊंचे स्तर से काफी कम थी।

28 फरवरी और 11 जून के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमले रद्द कर दिए थे। तब ब्रेंट की औसत कीमत लगभग 101 डॉलर प्रति बैरल रह गई। जुलाई की शुरुआत में यह कुछ समय के लिए घटकर लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल हो गई थी।

गोल्डमैन सैक्स को अभी भी उम्मीद है कि मिडिल ईस्‍ट में तनाव कम होने पर चौथी तिमाही में ब्रेंट की औसत कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल और अगले साल 75 डॉलर प्रति बैरल रहेगी।

इसके बावजूद इन्‍वेस्‍टमेंट बैंक ने कहा कि उसके आउटलुक में कीमतें बढ़ने का जोखिम बना हुआ है। कारण है कि होर्मुज स्‍ट्रेट में रुकावटें जारी हैं। लाल सागर में शिपिंग से जुड़ी और समस्याएं होने की संभावना है।

टेंशन से फिर बढ़ीं तेल की कीमतें
इस महीने ग्लोबल ऑयल मार्केट पर फिर से दबाव बना है। अमेरिका-ईरान के बीच नई लड़ाई के बाद ब्रेंट की कीमत 91 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई। वहीं, यमन में ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब से होने वाली शिपमेंट को रोकने की धमकी दी।

चूंकि दूसरी जगहों पर रुकावटें जारी हैं। लिहाजा, फारस की खाड़ी से तेल को ग्लोबल खरीदारों तक पहुंचाने में लाल सागर से गुजरने वाले कार्गो की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है।

मंगलवार को ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 35 सेंट या 0.4% गिरकर 88.87 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। सितंबर डिलीवरी के लिए अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड की कीमत में कोई खास बदलाव नहीं हुआ। यह 82.47 डॉलर प्रति बैरल पर रही। दोनों बेंचमार्क पिछले ट्रेडिंग सेशन में देखे गए एक महीने से ज्‍यादा समय के सबसे ऊंचे स्तर से नीचे बने रहे।

गोल्डमैन सैक्स ने कहा कि दूसरी तिमाही में ग्लोबल ऑयल इन्वेंट्री कम होने से सप्लाई में रुकावट के प्रति मार्केट ज्‍यादा संवेदनशील हो गया है। साथ ही, चीन से क्रूड का कम इंपोर्ट और डिमांड में ज्‍यादा उतार-चढ़ाव की संभावना कीमतों में और बढ़ोतरी को सीमित कर सकती है।

भारत के लिए क्रूड की ऊंची कीमतों के मायने
भारत अपनी क्रूड ऑयल की जरूरतों का 85% से ज्‍यादा इंपोर्ट करता है।
ऐसे में तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी के दूरगामी आर्थिक नतीजे हो सकते हैं।
महंगा क्रूड देश का इंपोर्ट बिल बढ़ाता है।
करंट अकाउंट डेफिसिट (चालू खाता घाटा) में इजाफा करता है।
रुपये पर दबाव डालता है।
महंगाई को कंट्रोल करने की भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की कोशिशों को मुश्किल बनाता है।
जब घरेलू पंप कीमतें ग्लोबल क्रूड कीमतों के साथ नहीं बढ़तीं तो इससे सरकारी फ्यूल रिटेलर्स के मार्जिन पर भी असर पड़ता है।

कंज्यूमर्स को इसका कुछ असर पहले ही महसूस होने लगा है। मई में भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें कई बार बढ़ाई गईं। ऐसा तब हुआ जब सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर इंटरनेशनल क्रूड की ऊंची कीमतों का दबाव बढ़ गया था। इससे पता चलता है कि लंबे समय तक चलने वाले जियोपॉलिटिकल टेंशन का असर आखिरकार रिटेल फ्यूल की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

मिडिल ईस्ट पर भारत की निर्भरता काफी ज्‍यादा
मिडिल ईस्ट के साथ भारत के आर्थिक संबंध सिर्फ तेल तक ही सीमित नहीं हैं। यह क्षेत्र भारत के एक्सपोर्ट का लगभग 17% हिस्सा है। यहां से भारत को लगभग 55% क्रूड ऑयल मिलता है। देश में आने वाले वर्कर रेमिटेंस (विदेश से भारत भेजी गई कमाई) में इसकी हिस्सेदारी लगभग 38% है।

घरेलू ब्रोकरेज फर्म जेएम फाइनेंशियल का अनुमान है कि क्रूड ऑयल की कीमतों में हर 1 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का सालाना इंपोर्ट बिल लगभग 2 अरब डॉलर बढ़ जाता है।

फर्म ने यह भी कहा कि लंबे समय तक चलने वाले जियोपॉलिटिकल टेंशन से लॉजिस्टिक्स और मरीन इंश्योरेंस की लागत बढ़ सकती है। खाड़ी से होकर गुजरने वाले शिपिंग रूट बाधित हो सकते हैं। भारत के ट्रेड बैलेंस पर दबाव बढ़ सकता है।

दुनिया की कुल तेल सप्लाई का लगभग पांचवां हिस्सा होर्मुज स्‍ट्रेट से होकर गुजरता है। भारत का 40% से ज्‍यादा कच्चा तेल भी इसी संकरे समुद्री रास्ते से आता है। यह इस रास्ते पर देश की निर्भरता को दिखाता है।

कच्चे तेल की कीमतों में लंबे समय तक बढ़ोतरी आम तौर पर भारतीय रुपये के लिए नुकसानदायक होती है। कारण है कि देश अपनी तेल की जरूरतों का लगभग 90% हिस्सा आयात करता है। जैसे-जैसे तेल महंगा होता है, भारत को आयात के लिए ज्‍यादा अमेरिकी डॉलर की जरूरत पड़ती है। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है। चालू खाता घाटा बढ़ता है। रुपये पर दबाव पड़ता है।