India China Russia Relation: चीन के तिआनजिन शहर पर दुनियाभर की निगाहें टिकी है. चीन के शहर में जो हो रहा है, वो दुनिया के पावर गेम का एंगल बदल सकता है. चीन में हो रहे SCO समिट में वो तस्वीर सामने आने वाली है, जो अमेरिका की न केवल चौधराहट और उसकी धौंस को कम करेगा, बल्कि अमेरिका के लीडरशिप वाले ग्लोबल आर्डर का विकल्प बनकर उभरेगा. ये समिट चीन, रूस, भारत , ईरान को अलग-अलग करने डोनाल्ड ट्रंप की कोशिशों को झटका देगा. सबसे बड़ा झटका अमेरिका राष्ट्रपति के टैरिफ वसूली को लगने वाला है. दवाब बनाकर ट्रेड डील करने की उनकी मंशा पर पानी फिरने वाला है. RIC यानी रूस, भारत और चीन अमेरिका के मनमाने टैरिफ को तोड़ निकालेंगे. अगर RIC यानी रूस, इंडिया और चीन साथ आते हैं तो ग्लोबल मंच पर डोनाल्ड ट्रंप अलग-थलग पड़ जाएंगे, जो टैरिफ पर अमेरिका की मनमानी को कंट्रोल करने के लिए काफी है.
चीन में दिखेगी आज महाशक्ति की महाताकत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2 दिवसीय चीन दौरे पर आज SCO की मीटिंग में हिस्सा ले रहे हैं. उनकी मुलाकात शी जिनपिंग के साथ हो चुकी है. करीब 1 घंटे तक दोनों नेताओं के बीच बैठक चली, जिसमें दोनों देशों के बीच सीमा से लेकर सीधी उड़ान और व्यापार पर चर्चा हुई. मीटिंग में क्या हुआ, किन मुद्दों पर बात हुई, इसकी बात आगे करेंगे, फिलहाल चीन में इकट्ठा हुई महाशक्ति कैसे अमेरिका की बेचैनी बढ़ा रहे हैं, वो समझते हैं. रूस, भारत और चीन अगर ये तीनों देश एक साथ जुड़ जाएं तो अमेरिका जैसे 9 देशों को अपने में समा लें. RIC देश आबादी में अमेरिका से 9 गुना बड़े हैं, GDP में अमेरिका से दो गुने ताकतवर हैं. ट्रेड और ताकत में ट्रंप को कहीं पीछे छोड़ सकते हैं.
रूस, भारत और चीन के साथ आने के क्या है मायने ?
रूस, भारत और चीन तीनों महाशक्तियों के साथ आने के मतलब है अमेरिका का विकल्प बनकर उभरना. ट्रंप अपने टैरिफ के हंटर से दुनियाभर के देशों को घायल करने की कोशिशों में जुटे हैं. भारत पर रूसी तेल की खरीद का मनमाना आरोप लगाकर उन्होंने 50 फीसदी टैरिफ लगा दिया तो वहीं चीन पर 30 फीसदी टैरिफ लगा रखा है. रूस पर दुनियाभर की पाबंदी लगा रखी है. ट्रंप कभी नोबेल प्राइज की मांग पर हामी चाहते हैं तो कभी भारत-पाकिस्तान युद्ध के सीजफायर का क्रेडिट लूटने की कोशिश कर रहे हैं. अगर रूस, भारत और चीन मजबूती के साथ एक साथ खड़े होते हैं तो ट्रंप की मनमानी पर लगाम लगना तय है.
RIC VS ट्रंप
शंघाई सहयोग संगठन (SCO). वैसे तो ये एक क्षेत्रीय संगठन है जो सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए एशियाई देशों का मंच है, लेकिन इइस समिट का पूरा फोकस पीम मोदी, जिनपिंग, पुतिन पर है . भारत ( 147 करोड़ आबादी), चीन (142 करोड़ आबादी ) और रूस (14.6 करोड़ आबादी) के सामने अमेरिका (34.7 करोड़ आबादी) कहीं नहीं टिकता है. अगर इन तीन देशों की जनसंख्या दुनिया की कुल आबाजी का 31 फीसदी है. यानी अमेरिका जैसे नौ देश इन तीनों देश में समा सकते हैं. सिर्फ आबादी ही नहीं क्षेत्रफल में भी तीनों देश अमेरिका जैसे 3 देश को अपने में समा सकते है.
RIC की अर्थव्यवस्था के सामने अमेरिका पस्त
सिर्फ अबादी ही नहीं अर्थव्यवस्था में भी ये तीनों देश अमेरिका पर भारी पड़ते हैं. दुनिया की कुल पर्चेजिंग पावर पैरिटी (PPP) 197.43 ट्रिलियन डॉलर की है. वर्ल्ड बैंक की डेटा के मुताबिक जिसमें से भारत, रूस और चीन की हिस्सेदारी 31.7 फीसदी यानी करीब 61.3 ट्रिलियन डॉलर की है, जबकि अमेरिका की 29. 3 ट्रिलियन डॉलर की है. यानी अगर रूस, भारत और चीन साथ मिल जाएं तो तीनों देशों की कंबाइड पीपीपी अमेरिका पर भारी पड़ जाएगी. बता दें कि SCO में वैश्विक इकोनोमी का 31% हिस्सेदारी है. आईएमएफ के 2025 के आंकड़ों के मुताबिक एसईओ के 10 सदस्य देशों की कुल जीडीपी लगभग 26.8 ट्रिलियन डॉलर और कुल जीडीपी लगभग 36 ट्रिलियन डॉलर है. जबकि पूरी दुनिया की जीडीपी 110 ट्रिलियन डॉलर है. रूस, भारत और चीन एससीओ के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं. चीन की जीडीपी 19 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है, उसके बाद भारत 4.2 ट्रिलियन डॉलर और रूस का 2.1 ट्रिलियन डॉलर है.
RIC का कारोबार Vs अमेरिका
ट्रेड के सामने भी अमेरिका इन तीनों देशों से पीछे है. साल 2024 में पूरी दुनिया में 33 ट्रिलियन डॉलर की ट्रेड हुई, जिसमें भारत ने 1.12 ट्रिलियन डॉलर, रूस ने 0.59 ट्रिलियन डॉलर और चीन ने 5.54 ट्रिलियन डॉलर की खरीद-फरोख्त की. अगर तीनों का कंबाइड ट्रेड देखें तो 7.25 ट्रिलियन का ट्रेड हुआ जबकि अमेरिका ने 4.99 ट्रिलियन डॉलर का आयात-निर्यात किया है. यानी ट्रेड में भी अमेरिका इन तीनों देशों के सामने टिक नहीं पा रहा. अगर ये तीनों देश चाहे तो अमेरिका को अलग-थलग कर ग्लोबल इकोनॉमी की घुरी बन सकते हैं.
अमेरिका पड़ेगा अलग-थलग
अगर ये तीनों देश मजबूती के साथ एक दूसर के साथ खड़े हो जाते हैं तो अमेरिका की हालात खराब होनी तय है. पहले से ही कर्ज के बोझ में डूबा अमेरिका टैरिफ की वजह से अलग-थलग पड़ जाएगा. अगर भारत और चीन ने अमेरिका को आंख दिखाया तो ट्रंप के देश में सामानों की मैन्यूफैक्चरिंग महंगी हो जाएगी. चूकी अमेरिका कंपनियां भारत और चीन में प्रोडक्शन करती है, ऐसे में ट्रंप का फैसला उनके लिए महंगा साबित हो सकता है. अमेरिका को न केवल मैन्यूफैक्चरिंग के लिए बल्कि सप्लाई और सामान बेचने के लिए भी चीन और भारत जैसे देश की जरूरत है. हथियारों के सबसे बड़े सप्लायर अमेरिका को अपने आर्म्स बेचने के लिए नए खरीदार तलाशने पड़ सकते हैं. भारत, रूस चीन जैसे देशों के एक साथ आने पर ब्रिक्स और एससीओ जैसे संगठन मजबूत होंगे और ग्लोबल मंच पर अमेरिका का दबदबा कम होगा. अमेरिकी करेंसी डॉलर की धौंस कम होगी. तीनों देशों के साथ आने से डोनाल्ड ट्रंप अलग-थलग पड़ जाएंगे, ऐसे में उन्हें टैरिफ पर नरमी रखनी ही पड़ेगी. भारत और चीन जैसे पड़ोसी देश का एक साथ आना महाशक्ति बनकर उभरने जैसा होगा.