एक 23 साल की लड़की का अपहरण, जिसने पूरे देश को डरा दिया; 36 साल पुराना वो कांड अचानक सुर्खियों में क्यों आया?

Rubaiya Sayeed Kidnapping Case: केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने सोमवार को 1989 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद के आतंकवादियों द्वारा अपहरण से जुड़े मामले में एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया है. रुबिया का अपहरण कश्मीर के आतंकवादी आंदोलन में एक निर्णायक मोड़ था, जिसने आतंकवादियों को जम्मू-कश्मीर में बेखौफ होकर काम करने का हौसला दिया. KDC न्यूज़ एजेंसी ने सूत्रों के हवाले से बताया कि गिरफ्तार व्यक्ति की पहचान शफात अहमद शांगलू के रूप में हुई है. वह श्रीनगर का मूल निवासी है. जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के प्रमुख यासीन मलिक इस मामले में मुख्य आरोपी है. उसके खिलाफ 60 से अधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें भारतीय वायुसेना (IAF) के जवानों की हत्या का मामला भी शामिल है. वर्तमान में वह दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद है, जहां वह एक अलग आतंकी फंडिंग मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है.

JKLF के आतंकवादियों ने 8 दिसंबर 1989 को दोपहर करीब 3:45 बजे श्रीनगर में रुबिया का अपहरण कर लिया था, जब वह लाल डेढ़ मेमोरियल अस्पताल से इंटर्नशिप करके अपने घर लौट रही थी. साल 2022 में रुबैया ने अदालत में मलिक और तीन अन्य लोगों को अपना अपहरणकर्ता बताया था.रुबैया ने उस समय अदालत में कहा था, ‘यही वह शख्स है और इसका नाम यासीन मलिक है. यही वह आदमी था जिसने मुझे धमकी दी थी कि अगर मैं उनके हुक्म की तामील करने से इनकार करूंगी तो वह मुझे मिनी बस से घसीटकर बाहर निकाल लेगा.’

महज 5 दिनों के बाद ही रुबिया रिहा कर दी गईं
रुबिया को 5 दिन बाद रिहा कर दिया गया था जब तत्कालीन वीपी सिंह की केंद्र सरकार ने आतंकवादियों की मांग मान ली थी. इसके बाद 5 गिरफ्तार किए गए आतंकवादियों अब्दुल हमीद शेख, शेर खान, नूर मोहम्मद कलवाल, अल्ताफ अहमद और जावेद अहमद जरगर को रिहा कर दिया. तत्कालीन कश्मीर में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों ने बताया कि उस समय पूरी घाटी में जश्न का माहौल बन चुका था. राज्य सरकार की ओर सो घाटी में आतंकवादियों को व्यापक समर्थन प्राप्त था और लाखों लोग खुले आम सड़कों पर उतरकर रुबैया के अपहरणकर्ताओं और रिहा किए गए आतंकवादियों के समर्थन में नारे लगा रहे थे तथा जश्न मना रहे थे.

आतंकवादियों के समर्थन में कश्मीर की सड़कों पर लगे नारे
हिंदुस्तान टाइम्स के लिए लिखे एक लेख में हरिंदर बावेजा ने बताया कि राज्य सरकार नाममात्र की रह गई थी और पूरी घाटी जश्न मना रही थी. उन्होंने लिखा, ‘जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के 5 उग्रवादियों को रिहा करने के लिए मजबूर की गई राज्य की फारूक अब्दुल्लाह सरकार लगभग गायब ही थी. प्रशासन भय के शिकार होकर देखता रह गया कि उसकी जनता हजारों-कभी-कभी तो लाखों की संख्या में सड़कों पर ये नारे लगाते हुए,‘हम क्या चाहते, आजादी…’ के नारे लगा रही थी. बावेजा ने आगे लिखा कि यह घटना एक निर्णायक मोड़ साबित हुई जिसने तराजू को आतंकवादियों के पक्ष में पूरी तरह झुका दिया.

कश्मीर की जनता आतंकियों के साथ थीः आशा खोसा
वरिष्ठ पत्रकार आशा खोसा ने रेडिफ न्यूज से बात करते हुए बताया था, ‘रुबैया के लिए कोई सहानुभूति नहीं थी’ और कश्मीर की जनता ‘पूरी तरह आतंकवादियों के साथ थी.’ खोसा ने कहा कि यह घटना कई लोगों के लिए बहुत बड़ा झटका थी क्योंकि इस घटना ने इस बात का खुलासा कर दिया था कि कश्मीर की जनता में आतंकवादियों के लिए कितना बड़ा जनसमर्थन था. आशा खोसा ने आगे बताया, ‘रुबिया का अपहरण एक झटका था और सुरक्षा बलों को ऐसी किसी घटना के होने का कोई अंदाजा नहीं था. तब वहां पर आतंकवाद को लोग मजाक समझते थे. लोग बड़ी शान से कहते थे कि अरे मेरा चचेरा भाई आतंकवादी बन गया है अब उसके पास बंदूक भी आ गई है.’

कश्मीर की सड़कों पर था जश्न का माहौल, लग रहे थे देशविरोधी नारे
वरिष्ठ पत्रकार खोसा ने आगे बताया कि रुबिया के अपहरण की घटना ने कश्मीर में सबकुछ एकदम से बदल के रख दिया. इससे कश्मीर के लोगों को लगा कि वहां पर वास्तव में बहुत बड़ी मुसीबत आ चुकी है. रुबिया के अपहरण के बदले जब आतंकियों को रिहा किया गया तो कश्मीर की सड़कों पर जश्न का माहौल था. मैंने अपने जीवन इतने सारे लोगों को एक साथ कभी सड़क पर नहीं देखा था. ये लोग सड़कों पर नाचते हुए गा रहे थे, भारत विरोधी नारे लगा रहे थे.’