भारी बर्फबारी के बीच लाहौल घाटी में लोगों ने मनाया हालडा पर्व, मशाल जलाकर भगाई बुरी शक्तियां

लाहौल-स्पीति: जिला लाहौल स्पीति के तिनन, रांगलो गांव में बीती रात से हालडा पर्व का शुभारंभ हो गया है. हालांकि बीते दिन से ही लाहौल घाटी में भारी बर्फबारी का दौर जारी है और बर्फीला तूफान भी कई जगह पर चल रहा है, लेकिन ऐसे में लोगों ने अपने पुराने हालडा पर्व की परंपराओं का पालन किया. इस दौरान ग्रामीणों ने हाथों में चलती हुई मशालें लेकर अपने-अपने इलाके का भ्रमण किया और बुरी शक्तियों को भी भगाया. आने वाले दिनों में कई अन्य इलाकों में भी हालडा पर्व को धूमधाम से मनाया जाएगा. बीती रात को माइनस डिग्री तापमान के बीच लोगों का त्योहार मनाने का जज्बा खूब रहा. स्थानीय लोग हाथों में जलती मशालें लेकर और लगातार हो रही बर्फबारी में बिना किसी छाते के अपनी इस पुरानी परंपरा को पूरा करते नजर आए. वहीं, स्थानीय विधायक अनुराधा राणा ने भी लोगों को हालदा पर्व की बधाई दी.

नववर्ष के स्वागत में उत्सव शुरू

लाहौल घाटी के स्थानीय निवासी दिनेश कुमार, मंगल चंद ने बताया कि “हिमाचल प्रदेश के लाहौल स्पीति जिला की चंद्रा घाटी के तिनन गांव में बौद्ध धर्म के नववर्ष के स्वागत के रूप में प्रसिद्ध हालडा उत्सव पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ शुरू हो गया है. इस पर्व का मुख्य आकर्षण सामूहिक रूप से मशालें जलाना है. ऐसे में घाटी के लोग रात को देवदार की टहनियों से तैयार की गई मशालें जलाकर एक निर्धारित स्थान पर एकत्रित हुए और हालडा हो के जयघोष के साथ बुरी शक्तियों को भगाने की देवताओं से प्रार्थना की गई.”

लाहौल घाटी के स्थानीय निवासी मंगल चंद ने बताया, “हालडा उत्सव मुख्य रूप से धन की देवी ‘शिश्कर आपा’ को समर्पित है. लोग आने वाले साल में बेहतर फसल और सौभाग्य की कामना करते हैं. इस उत्सव की तिथियां बौद्ध पंचांग के अनुसार लामाओं द्वारा निर्धारित की जाती हैं. जो घाटी के विभिन्न क्षेत्रों जैसे गाहर, चंद्रा और भागा घाटी में अलग-अलग समय पर मनाया जाता है. आगामी दिनों में भी हालडा की परंपरा को रिवायत अनुसार पूरा किया जाएगा.”

क्या है परंपरा, क्यों मनाई जाती है?

मंगल चंद ने बताया कि अब बुधवार को ग्रामीण कुसिल पर्व में लोग अपने घरों के भीतर परिवार के साथ रहकर नौ प्रकार के व्यंजनों का आनंद लेंगे. मान्यता है कि प्राचीन काल में मानव सिर्फ देवी-देवताओं की पूजा करते थे. इस बात से क्रोधित होकर असुर मानव बस्ती की ओर क्षति पहुंचाने के लिए आते थे. इस दौरान मानव जाति को बचाने के लिए तिनन खांगसर गांव के चार लोग अपने चेहरे पर मुखौटा लगाकर असुरों का रूप धारण कर नृत्य कर असुरों के बीच शामिल हो जाते थे. सांड को मारकर उसके मांस खाने का अभिनय करते थे और इस दौरान नृत्य व मांस खाकर असुर भूल जाते थे कि वे किस लिए आए थे. ऐसे में वे बिना किसी मानव को क्षति पहुंचाए ही वापस चले जाते थे, तब से लेकर आज तक यह परंपरा निभाई जा रही है.