बिहार में करीब डेढ़ महीने से चल रहा राजनीतिक घटनाक्रम अब आखिरी चरण में है. अगले 3-4 दिनों में सब कुछ साफ हो जाएगा. किसकी सरकार बनेगी, कौन मुख्यमंत्री होगा और किसकी नीतियों पर काम होगा. इसे अंतिम रूप दिया जा चुका है. प्रथमदृष्यटया एनडीए की सरकार बननी तय है. हालांकि विपक्ष महागठबंधन की सरकार बनाने की फिराक में था. पर, अब यह स्पष्ट हो गया है कि महागठबंधन को फिलहाल यह मौका तो नहीं मिलने जा रहा. सब कुछ तय हिसाब से चलता रहा तो 2030 के पहले इसकी गुंजाइश भी नहीं दिखती. तेजस्वी को इसके लिए अभी अपने टूटे मनोबल को साबूत बनाना होगा. उन्हें सैर-सपाटे की बजाय बिहार पर लगातार फोकस करना होगा.
5 मार्च से गर्म था अटकलों का बाजार
नीतीश कुमार ने राज्यसभा जाने का फैसला मार्च के शुरू में ही ले लिया था. उन्होंने राज्यसभा के लिए नामांकन के पूर्व 5 मार्च की सुबह एक वीडियो सोशल मीडिया पर जारी किया. उसमें उन्होंने राज्यसभा जाने की अपनी इच्छा पहली बार अधिकृत तौर पर सार्वजनिक की. उसमें उन्होंने अपने इस फैसले की वजह भी बताई थी. उन्होंने कहा था कि वे लोकसभा, विधानसभा और विधान परिषद के सदस्य रह चुके हैं. वे चौथे और ऊपरी विधायी सदन-राज्यसभा का कभी सदस्य नहीं रहे. उनकी दिली इच्छा है कि वे चौथे सदन में भी अपनी उपयोगिता साबित करें. तरह-तरह की अकलों पर उन्होंने विराम 30 मार्च को लगा दिया, जब उन्होंने बिहार विधान परिषद की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया. इसके बावजूद चौंकाने वाली चर्चाओं का दौर जारी रहा. इस चर्चा के केंद्र में कुछ तो नीतीश की पार्टी जेडीयू के नेता-समर्थक ही थे. हालांकि राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेतृत्व वाले महागठबंधन की भूमिका भी भ्रम फैलाने में कम नहीं रही. इसके पीछे उसका मकसद था.
महागठबंधन के इरादों पर पानी फिरा
बिहार में राजद के नेतृत्व वाला महागठबंधन पूरी तरह आशान्वित दिख रहा था कि बिल्ली के भाग्य से छींका जरूर टूटेगा. पिछले 2 मौकों पर हुए राजनीतिक घटनाक्रमों का लाभ महागठबंधन के दल उठा चुके हैं. नीतीश की वजह से उन्हें सत्ता सुख मिल गया. खासकर राजद और कांग्रेस के नेताओं को. उनमें कुछ मंत्री बन गए. वाम दलों ने सरकार में शामिल होने से मना कर दिया था. यह तो बिन मांगी मुराद थी. उनके हिस्से की सीटें भी इन्हीं दोनों को मिल गईं. भाजपा से अनबन होने पर नीतीश 2015 में भी लालू यादव के झांसे में आकर राजद से सट गए थे. नीतीश को भाजपा जैसे एक सहयोगी की जरूरत भी थी. लालू के साथ जाने पर यादव जाति के 14 प्रतिशत वोट मिलने की गारंटी थी.
नीतीश के सामने लालू की शर्त सिर्फ यही थी कि मुख्यमंत्री बेशक आप रहें, लेकिन उनके दोनों बेटों को सियासी गुर सिखा दें. इसी क्रम में लालू ने दबाव डाल कर एक बेटे को डेप्युटी सीएम और दूसरे को मंत्री बनवा दिया. पर, स्वार्थ पर टिका संबंध 2 साल में ही दरक गया. नीतीश एनडीए में लौट आए. 2020 में जेडीयू को 43 सीटों पर सिमटने का मूल कारण नीतीश एलजेपी नेता चिराग पासवान को मानते थे. भाजपा से उनकी नफरत इसलिए हुई कि उनकी नजर में चिराग को भाजपा ने ही चढ़ाया था. बहरहाल नाराज नीतीश 2022 में फिर राजद से सट गए. महागठबंधन की सरकार बनी, पर नीतीश ने 2024 में फिर राजद का साथ छोड़ दिया. वही उम्मीद राजद इस बार भी पाले हुए था कि अगर वाकई नीतीश को भाजपा ने हाईजैक कर लिया है तो उनकी अंतरात्मा अवश्य जागेगी. पर, ऐसा कुछ नहीं हुआ.
नीतीश कुमार को लेकर भ्रम फैलाने में जेडीयू नेता भी पीछे नहीं रहे. किसी ने आग्रह भाव से कहा कि नीतीश बिहार न छोड़ें. विपक्ष ने हवा उड़ाई कि भाजपा ने उन्हें हाईजैक कर लिया है. जेडीयू नेताओं ने कहा कि संविधान के प्रावधान के मुताबिक 6 महीने वे मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं. 16 मार्च को राज्यसभा के नतीजे आने के बाद भी ‘खेला’ की चर्चा होती रही. इस पर दूसरी बार विराम 30 मार्च को लगा, जब नीतीश कुमार ने विधान परिषद की सदस्यता से निर्धारित 14 दिनों की अवधि पूरी होने के दिन इस्तीफा दे दिया. इस बीच राजनीति में महीने भर पहले ही आए उनके बेटे निशांत कुमार को सीएम बनाने की मांग उठती रही. अब भी खुलकर या दबी जुबान जेडीयू नेताओं-कार्यकर्ताओं की यह मांग बरकरार है. शायद अब थम जाए.
नीतीश कुमार तो खुद भाजपा के सक्षम शीर्ष नेताओं से बात करने नहीं गए, लेकिन उनके प्रतिनिधि के रूप में जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष और सांसद संजय कुमार झा के साथ जेडीयू कोटे से केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह दिल्ली के विमर्श में शामिल होते रहे. विमर्श की बात यकीनन वे नीतीश कुमार को बताते होंगे या उनकी कोई बात रहती होगी तो वे जरूर अपने इन दोनों नुमाइंदों को बताते होंगे. बहरहाल, नई सरकार के गठन का स्वरूप फाइनल हो गया है. नीतीश अब दिल्ली में सेवा करेंगे. बिहार में नई सरकार एनडीए की ही बनेगी. नया सीएम भाजपा का होगा. होम मिनिस्ट्री भी भाजपा को मिलने में कोई विवाद नहीं है. मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी को लेकर भी कोई लफड़ा नहीं है. सिर्फ डेप्युटी सीएम पर बात नहीं बन पाई है. इसलिए कि जेडीयू अभी तक यह तय नहीं कर पाया है कि निशांत कुमार को डेप्युटी सीएम बनाना है या नहीं. हालांकि नीतीश के साथ हमेशा खड़ी भाजपा को निशांत कुमार को डेप्युटी सीएम बनाए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है. यह फैसला नीतीश को करना है.