सम्राट चौधरी के सामने सफल CM बनने की चुनौती! नीतीश सा सुशासन, योगी जैसा मॉडल और मोदी सा विजन होगा जरूरी

पटना: सम्राट चौधरी के सीएम बनने के बाद उनसे लोगों की अपेक्षाएं भी कम नहीं हैं. लोगों ने 2 दशक तक नीतीश कुमार का राज देखा है. बिहार को जंगल राज से बाहर निकाल कर नीतीश ने सुशासन कायम किया तो विकास की गंगा भी बहाई. सड़क, पुल, बिजली और पानी जैसी ढांचागत सुविधाओं से बिहार लैस हुआ है तो इसके पीछे नीतीश कुमार की सुविचारित योोजनाएं रही हैं. बाद के दिनों में नीतीश भले कमजोर पड़े, लेकिन पहले टर्म में उन्होंने अपराध नियंत्रण की दिशा में जो काम किए, उससे उस दौर की पीढ़ी कभी नहीं भूलेगी. अब बिहार की बागडोर सम्राट चौधरी के हाथ में हैं. भजापा को बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाने का सौभाग्य 75 साल बाद मिला है. इस ऐतिहासिक दौर की जिम्मेदारी सम्राट को मिलना सामान्य बात नहीं है. अब सम्राट के सामने अपनी काबिलियत साबित करने की बारी है. उन्हें 5 ऐसी बड़ी चुनौतियां विरासत में मिली हैं, जिन पर कायदे से उन्होंने काम कर लिया तो उनकी गिनती यूपी में अपराधियों पर नकेल कसने वाले योगी आदित्यनाथ की कतार में होने लगेगी. भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए उन्हें नरेंद्र मोदी के अंदाज में काम करना होगा. बिहार में भाजपा और आगे ले जाने की सियासी चुनौती भी उनके सामने है.

अपराध नियंत्रण का रहेगा इंतजार
नीतीश कुमार ने 2005 में पहली बार सीएम बनने के बाद बिहार को जंगल राज से मुक्ति दिलाई थी. इसकी फसल वे लंबे समय से काट रहे थे. पर, अब स्थिति वैसी नहीं रही. बिहार में अपराध लगातार बढ़ने लगे हैं. बढ़ते अपराध को विपक्ष लगातार मुद्दा बनाता रहा है. राजद नेता तेजस्वी यादव ने इसे चुनावी मुद्दा बना कर नीतीश कुमार सरकार की आलोचना की. अब भी वे अपराध के सवाल पर सरकार को कठघरे में खड़ा करने से नही चूकते. अपराधियों का मनोबल इतना बढ़ गया है कि पुलिस पर हमले आम हो गए हैं. नेशनल क्राइम ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2023 के आंकड़ों के अनुसार बिहार देश में सरकारी अधिकारियों और पुलिस पर हमलों में सबसे ऊपर रहा. आलोच्य अवधि में ऐसे 371 मामले दर्ज हुए. राज्य अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (SCRB) के आंकड़ों के मुताबिक 2015 से 2024 तक कुल अपराधों में 80.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई. 2024 में अपराध 3.52 लाख तक पहुंच गए, जबकि 2015 में यह संख्या कम थी. 2023 में हत्याएं 2,862 दर्ज की गईं. हालांकि 2025 में गंभीर अपराधों में कमी का सरकारी दावा है, लेकिन पुलिस पर हमले और छोटे अपराध अब भी जारी हैं. यही वजह है कि लोग अपराध नियंत्रण के लिए ‘योगी मॉडल’ की मांग करते हैं. योगी माडल में जीरो टॉलरेंस नीति और सख्त कार्रवाई पर जोर है. नई सरकार के लिए अपराध नियंत्रण सबसे बड़ी चुनौती होगी. बिना पुलिस सुधार और आधुनिक निगरानी के अपराध की गहरी जड़ों को खत्म करना मुश्किल है. आम जनता को अब इंतजार होगा कि सीएम सम्राट चौधरी कैसे इस पर अंकुश लगाते हैं.

भ्रष्टाचार पर जरूरी जोरदार प्रहार
नीतीश कुमार का 20 साल का शासन ‘क्राइम, करप्शन और कम्युनलिज्म’ से समझौता नहीं’ के नारे के साथ शुरू हुआ था. कम्युनलिज्म पर तो सरकार ने काबू पा लिया, लेकिन क्राइम और करप्शन उनके कार्यकाल में ही बेलगाम होने लगे. करप्शन का आलम यह है कि आर्थिक अपराध इकाई (EOU) और एसीबी रोज भ्रष्टाचारियों को गिरफ्तार कर रही हैं. 2025 में बिहार में रिकॉर्ड 122 भ्रष्टाचार के एफआईआर दर्ज हुए, जो लंबे समय के औसत से दोगुने हैं. इनमें 81 प्रतिशत मामले रिश्वतखोरी के थे. इसमें किसी को शक नहीं कि शराबबंदी ने संस्थागत भ्रष्टाचार को जन्म दिया है. विपक्ष का आरोप है कि प्रतिबंध के कारण 40,000 करोड़ रुपए का अवैध शराब कारोबार फल-फूल रहा है. पहले शराब से राज्य को 3,000-4,500 करोड़ रुपए की वार्षिक राजस्व आय होती थी, जो अब शून्य है. नई सरकार के सामने भ्रष्ट अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की चुनौती होगी. बिना जोरदार प्रहार के विकास की योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती रहेंगी.

अफसरशाही पर नकेल आवश्यक
2005 में राजद राज की डिमोरलाइज्ड नौकरशाही को नीतीश कुमार ने बिना दबाव के काम करने की छूट दी थी. लेकिन निगरानी की कमी ने अफसरशाही को बेलगाम बना दिया. आज स्थिति यह है कि हल्का कर्मचारी से लेकर बीडीओ-सीओ तक बिना रिश्वत लिए काम नहीं करते. हाल के दिनों में कई ऐसे मामले सामने आए भी है. फरवरी 2026 में गया के बीडीओ राकेश कुमार को 50,000 रुपए रिश्वत लेते गिरफ्तार किया गया. जनवरी 2026 में बक्सर के बीडीओ-कम-बीईओ को 10,000 रुपए रिश्वत लेते पकड़ा गया. पुलिस महकमा भी इसी हाल में है. नई सरकार को अफसरशाही पर नकेल कसनी होगी. डिजिटल गवर्नेंस, सीसीटीवी निगरानी, परफॉर्मेंस आधारित प्रमोशन और सख्त एंटी-करप्शन कानून लागू करने की जरूरत है. बिना इस सुधार के विकास योजनाएं कागजों तक सीमित रह जाएंगी. पूर्व हो चुके डेप्युटी सीएम विजय कुमार सिन्हा ने राजस्व विभाग संभालते जस तरह राजस्व कर्मियों और अंचलाधिकारियों के खिलाफ ऐक्शन शुरू किया था, उससे इतना तो साफ है कि उन्हें भी नौकरशाही की इस बींमारी का पता था. उन्होंने नीतीश के इस्तीफे के पहले ही 41 सीओ को निलंबित कर दिया.

पलायन रोकने की कारगर स्ट्रेटजी
पलायन बिहार की ज्वलंत समस्या बनी हुई है. अब तो यह राजनीतिक मुद्दा भी बनने लगा है. हालिया असेंबली इलेक्शन में कांग्रेस ने पलायन पर पदयात्रा ही निकाल दी. तेजस्वी पलायन रोकने के लिए हर घर सरकारी नौकरी का बेतुका वादा कर बैठे. प्रशांत किशोर पहले से ही इस पर अलख जगाए हुए थे. यहां तक सत्ताधारी एनडीए ने भी इस दिसा में कई घोषणाएं कीं. सच है कि बिहार में उद्योग-धंधे बंद हो चुके हैं. बड़े पैमाने पर लोग रोजगार की तलाश में दिल्ली, गुजरात, बेंगलुरु और कोलकाता जैसे शहरों में पलायन कर रहे हैं. 2025 के आंकड़ों के अनुसार बिहार से करीब 3 करोड़ लोग बाहर काम कर रहे हैं. यानी हर चार वयस्क में एक. दो-तिहाई घरों में कम से कम एक सदस्य बाहर है. 2011 की जनगणना में 74.54 लाख प्रवासी थे, लेकिन अब संख्या कई गुना बढ़ गई है. सभी पार्टियों ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया. एनडीए ने बंद पड़ी चीनी मिलों को खोलने का वादा किया. अमित शाह ने 2025 में कहा कि पांच साल में सभी बंद चीनी मिलें खुलेंगी. अन्य उद्योगों जैसे खाद्य प्रसंस्करण, टेक्सटाइल और आईटी में निवेश का आश्वासन भी दिया गया. नई सरकार को स्थानीय रोजगार सृजन, कौशल विकास और उद्योग स्थापना पर फोकस करना होगा. बिना कारगर स्ट्रेटजी के पलायन रोकना मुश्किल है.

क्वालिटी एजुकेशन के लिए सुधार
नीतीश कुमार के शासन में शिक्षा के ढांचे में सुधार हुआ. स्कूल भवन बने, लाखों शिक्षकों की नियुक्ति भी हुई. लेकिन क्वालिटी एजुकेशन अभी भी सपना बना हुआ है. एएसईआर की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार बिहार के ग्रामीण बच्चों में बुनियादी साक्षरता और गणित कौशल राष्ट्रीय औसत से नीचे है. परख के राष्ट्रीय सर्वेक्षण 2024 में भी कक्षा 3, 6 और 9 में भाषा, गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान में बिहार का प्रदर्शन राष्ट्रीय औसत से कम रहा. कक्षा 3 में भाषा और गणित में औसत स्कोर राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे है. नई सरकार को शिक्षक प्रशिक्षण, डिजिटल लर्निंग, पाठ्यक्रम सुधार और मूल्यांकन प्रणाली पर ध्यान देना होगा. शिक्षा में बुनियादी ढांचा तो बढ़ा, लेकिन सीखने का स्तर सुधारना अब सबसे बड़ी चुनौती है. इसके लिए योग्य शिक्षकों का चयन और प्रशिक्षण आवश्यक होगा. पढ़ाई में नई तकनीक को शामिल करना होगा. कर्पूरी ठाकुर के जमाने से बेपटरी हुई बिहार की शिक्षा में गुणात्मक सुधार नई सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए.

आर्थिक हालात को पटरी पर लाना
फ्री बीज की योजनाओं और शराबबंदी कानून से खजाने पर भारी बोझ पड़ा है. शराबबंदी से ही राज्य को करीब 4,500 करोड़ रुपए की राजस्व हानि हो रही है. इसके दूसरे दुष्परिणाम अलग हैं. 2025-26 में कल्याणकारी योजनाओं (महिलाओं को 10 हजार नकद ट्रांसफर, वृद्ध जन पेंशन बढ़ोतरी और 125 यूनिट फ्री बिजली आदि) का बोझ 40,000-80,000 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है. विकास कार्यों के लिए पैसे कम पड़ रहे हैं. बिहार का कर्ज जीएसडीपी का 37-39 प्रतिशत है. 2025 में वित्तीय घाटा 9.2 प्रतिशत तक पहुंच गया. जाते-जाते नीतीश कुमार ने समृद्धि यात्रा के दौरान 15 हजार करोड़ से अधिक की योजनाओं की घोषणा की है. नई सरकार के सामने राजस्व बढ़ाने, घाटे को नियंत्रित करने और ऋण को सस्टेनेबल स्तर पर लाने की बड़ी चुनौती होगी. बिना आर्थिक सुधार के विकास की गति रुक जाएगी. नई सरकार इन चुनौतियों से जूझते हुए बिहार को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकती है, लेकिन इसके लिए साहसिक फैसले और सख्ती जरूरी हैं. विरासत में चुनौतियां भरी पड़ी हैं, लेकिन अवसर भी कम नहीं हैं. नई सरकार की कमान संभालने वाले सीएम को विरासत में मिली चुनौतियों से जूझना जरूरी होगा.