नई दिल्ली: दुनिया भर के 70 से ज्यादा बड़े साइंटिस्ट्स ने मिलकर एक बेहद डराने वाली रिपोर्ट जारी की है. इसके मुताबिक इंसानी हरकतों की वजह से हमारी धरती का तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. साल 2025 में वैश्विक तापमान प्री-इंडस्ट्रियल लेवल से 1.39 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया है. इसमें से 1.37 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने के लिए सीधे तौर पर इंसान जिम्मेदार है. साइंटिस्ट्स ने चेतावनी दी है कि साल 2030 तक यह आंकड़ा 1.5 डिग्री सेल्सियस को पार कर जाएगा. सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि जब धरती को बचाने के लिए कड़े कदम उठाने थे, तब अमेरिका समेत कई बड़े देश क्लाइमेट मॉनिटरिंग सिस्टम का बजट काट रहे हैं. इसके कारण समुद्र और स्पेस से मिलने वाले जरूरी डेटा मिलने बंद हो सकते हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस लापरवाही की वजह से हम आने वाले बड़े संकट को भांपने में नाकाम रहेंगे.
सिर्फ तीन साल… धरती को बचाने का आखिरी मौका!
पेरिस क्लाइमेट समझौते में दुनिया के देशों ने तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने का वादा किया था. अब साइंटिस्ट्स का कहना है कि यह लक्ष्य हासिल करना नामुमकिन लग रहा है. हमारा कार्बन बजट यानी कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन की तय सीमा सिर्फ तीन साल में खत्म हो सकती है. ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन लगातार अपने ऑल-टाइम हाई पर बना हुआ है.
प्रदूषण कम करने के चक्कर में एरोसोल की मात्रा घटी है, जिससे कूलिंग इफेक्ट कमजोर पड़ गया है. सूरज की सीधी किरणें अब धरती को ज्यादा गर्म कर रही हैं. कार्बन डाइऑक्साइड गैस हवा में मिलकर एक ऐसी चादर बना रही है जो गर्मी को बाहर नहीं जाने देती. अगर अगले तीन सालों में बड़े कदम नहीं उठाए गए तो तबाही को रोकना किसी के हाथ में नहीं होगा.
समुद्र की बढ़ती खतरनाक गर्मी दे रही है आने वाले महाविनाश का संकेत
धरती पर एनर्जी का बैलेंस पूरी तरह बिगड़ चुका है और इसका सीधा असर समुद्रों पर दिख रहा है. साल 1901 से 2025 के बीच समुद्र का वाटर लेवल लगभग 23 सेंटीमीटर तक बढ़ चुका है. हर साल समुद्र का जलस्तर 3.84 मिलीमीटर की तेजी से ऊपर उठ रहा है. जमीन पर जमी बर्फ तेजी से पिघल रही है और पानी फैल रहा है.
साल 1991 के बाद से मरीन हीटवेव यानी समुद्री लू के दिनों में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है. साल 2025 में समुद्र ने औसतन 65 दिन भयंकर गर्मी का सामना किया है. समुद्री जीवों का जीवन इस बढ़ी हुई गर्मी के कारण खतरे में पड़ गया है. महासागरों का गर्म होना सीधे तौर पर हमारे मानसून और चक्रवातों को खतरनाक बना रहा है.