Ahmedabad Plane Crash: आज ठीक एक साल हो गए उस खौफनाक दिन को, जब AI-171 विमान हादसे की ब्रेकिंग न्यूज ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. पिछले साल आज ही के दिन यानी 12 जून को गुजरात में वो भयानक प्लेन क्रैश हुआ था, जिसमें सब कुछ जलकर राख हो गया था. उस मलबे और धुआं उगलती आग के बीच से विश्वास कुमार रमेश नाम का एक यात्री चमत्कारिक रूप से जिंदा बाहर निकल आया था. उस वक्त पूरी दुनिया ने इसे भगवान का सबसे बड़ा चमत्कार माना था. लेकिन आज इस हादसे की पहली बरसी पर जब विश्वास ने अपनी जुबान खोली है, तो एक ऐसी कड़वी सच्चाई सामने आई है जिसे सुनकर आपका कलेजा फट जाएगा.
विश्वास का कहना है कि उस जलते हुए विमान से बाहर निकलना तो आसान था, लेकिन उसके बाद इस समाज और खुद के दिमाग से लड़ना मौत से भी ज्यादा बदतर साबित हुआ. आइए जानते हैं मौत को मात देने वाले इस जांबाज की वो अनसुनी दास्तान, जो उसने ठीक एक साल बाद दुनिया के सामने रखी है.
किस्सा पिछले साल 12 जून का है. विश्वास कुमार हमेशा की तरह अपनी फ्लाइट पर बैठे थे. सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन अचानक विमान अनियंत्रित होकर नीचे गिरने लगा. प्लेन के अंदर चीख-पुकार मची थी और अगले ही पल एक जोरदार धमाका हुआ. जब रेस्क्यू टीम मौके पर पहुंची, तो वहां सिर्फ लाशें और जलता हुआ मलबा था. दूर-दूर तक किसी के जिंदा बचने की उम्मीद नहीं थी. लेकिन तभी एक मलबे के नीचे से विश्वास कुमार को जिंदा बाहर निकाला गया. पूरी दुनिया ने इसे कुदरत का करिश्मा माना, क्योंकि विश्वास को बेहद मामूली चोटें आई थीं.
हादसे के बाद शुरू हुआ असली नर्क
लेकिन इस चमत्कार के पीछे एक ऐसा दर्द छिपा था, जो धीरे-धीरे विश्वास को अंदर ही अंदर खा रहा था. विश्वास बताते हैं कि अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद जब वो घर लौटे, तो जिंदगी वैसी नहीं रही जैसी वो छोड़कर गए थे. इस हादसे ने उनके शरीर पर भले ही जख्म न दिए हों, लेकिन उनके दिमाग पर एक ऐसा गहरा घाव छोड़ दिया, जिसे भर पाना नामुमकिन लग रहा है.
‘सर्वाइवर गिल्ट’ ने रातों की नींद उड़ाई
विश्वास आज एक साल बाद बताते हैं कि हादसे के बाद वो ‘सर्वाइवर गिल्ट’ के शिकार हो गए. यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है जहां इंसान को हर पल यह अहसास होता है कि जब उस फ्लाइट में मौजूद बाकी सभी लोग मर गए, तो सिर्फ मैं ही क्यों जिंदा बचा? विश्वास को रात-रात भर नींद नहीं आती थी. उन्हें सोते-जागते सिर्फ उन सह-यात्रियों की चीखें सुनाई देती थीं, जो उस दिन उनके बगल वाली सीट पर बैठे थे और आज इस दुनिया में नहीं हैं.
समाज के ताने और शक की नजरें
इस कहानी का सबसे दर्दनाक हिस्सा वो है जो समाज ने विश्वास को दिया. विश्वास ने बताया कि लोग उन्हें सांत्वना देने के बजाय एक अजूबे या शक की नजर से देखने लगे. कुछ लोग तो दबी जुबान में यहां तक कहने लगे कि ‘यही वो बदनसीब है जिसकी वजह से प्लेन क्रैश हुआ’. इस तरह के तानों और समाज के बर्ताव ने विश्वास को पूरी तरह तोड़कर रख दिया. उन्हें लगने लगा कि शायद उस दिन मलबे में ही मर जाना इस जिंदगी से बेहतर होता.
आज इस घटना को पूरा एक साल बीत चुका है. विश्वास कुमार अब थेरेपी और काउंसलिंग की मदद से खुद को संभालने की कोशिश कर रहे हैं. वो कहते हैं कि 12 जून उनके लिए सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि उनके वजूद की वो कड़वी हकीकत है जिसे वो चाहकर भी नहीं भूल सकते.