एक छोटी सी कुटिया से कैसे बना विश्व प्रसिद्ध कैंची धाम? जानिए किसने दी थी मंदिर के लिए जमीन

Kainchi dham foundation day: ये कहानी उत्तराखंड की खूबसूरत और शांत पहाड़ियों में छिपे एक बेहद पवित्र स्थान की है. आज इस जगह को पूरी दुनिया कैंची धाम के नाम से जानती है. इस पावन धाम के बनने की शुरुआत साल 1961 में हुई थी. तब इस शांत इलाके में पहली बार एक महान संत के कदम पड़े थे. उन संत को लोग आदर से नीम करोली बाबा कहते हैं. भक्तों का ऐसा मानना है कि बाबा साक्षात हनुमान जी के रूप थे.

बाबा जी जब इस पहाड़ी इलाके में पहुंचे तो वे अकेले नहीं थे. उनके साथ उनके एक बहुत ही करीबी मित्र और सच्चे साधक पूर्णानंद जी भी आए थे. ये दोनों लोग पैदल चलते हुए इस अनजान और बेहद शांत घाटी में पहुंचे थे. उस दौर में यह पूरी जगह बिल्कुल सुनसान हुआ करती थी. चारों तरफ सिर्फ घने जंगल, ऊंचे पहाड़ और एक छोटी सी नदी बहती थी. यहां का पूरा माहौल भक्ति के लिए एकदम सही था.

भक्ति और साधना के लिए सबसे बेस्ट
इस अनजान घाटी में कदम रखते ही बाबा जी को एक अलग सा अहसास हुआ. उन्हें इस जगह की हवा और मिट्टी में एक बहुत ही अनोखा दिव्य खिंचाव महसूस होने लगा. ऐसा लगा जैसे ये शांत जगह सदियों से किसी महान शक्ति का इंतजार कर रही थी. बाबा जी को ये शांत माहौल भगवान की भक्ति और साधना के लिए सबसे बेस्ट लगा. उन्होंने उसी पल एक बहुत बड़ा फैसला ले लिया.

पूर्णानंद जी की थी जमीन
बाबा जी ने तय किया कि वे अब आगे कहीं नहीं जाएंगे. वे इसी पवित्र भूमि पर रुकेंगे और अपनी साधना करेंगे. उन्होंने अपने रहने के लिए इसी शांत जगह पर घास और मिट्टी की एक छोटी सी कुटिया बनाने का विचार किया. उनका मकसद यहां एकांत में बैठकर भगवान का ध्यान लगाना था. पूर्णानंद जी ने भी बाबा के इस फैसले में उनका पूरा साथ दिया और कुटिया बनाने में मदद की. और वो जमीन भी पूर्णानंद जी की हीं थी.

इस मंदिर की जमीन और इसके निर्माण को लेकर भी एक बहुत ही दिलचस्प कहानी है. दरअसल यह जमीन स्थानीय वन विभाग और कुछ ग्रामीणों की हुआ करती थी. बाबा जी के इस जगह पर आने के बाद, स्थानीय लोग उनकी सादगी और विचारों से बहुत प्रभावित हुए. ग्रामीणों ने खुशी खुशी वह जमीन बाबा के आश्रम के लिए सौंप दी. इसके बाद साल 1964 में इस जगह पर हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना की गई, जिसे देखने आज लाखों लोग आते हैं.