जयपुर. राजस्थान में सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं के लिए एक बार फिर भर्ती एजेंसियां चर्चा में हैं. वजह यह है कि अब प्रदेश की दोनों बड़ी भर्ती संस्थाओं की कमान सेना से जुड़े रिटायर्ड अफसरों के हाथों में है. एक तरफ राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड में रिटायर्ड मेजर जनरल आलोक राज पहले से जिम्मेदारी संभाल रहे हैं तो दूसरी तरफ अब राजस्थान लोक सेवा आयोग यानी आरपीएससी की कमान कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में लेफ्टिनेंट कर्नल केसरी सिंह को सौंप दी गई है.
सरकार ने आरपीएससी में दो नए सदस्यों की भी नियुक्ति की है. प्रोफेसर संतोष आनंद और डॉ. दीपक कुमार शर्मा को आयोग का सदस्य बनाया गया है. संतोष आनंद भीलवाड़ा के एमएलवी कॉलेज के प्राचार्य रह चुके हैं और विद्याभारती के चित्तौड़ प्रांत के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी निभा चुके हैं. वहीं डॉ. दीपक कुमार शर्मा अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के प्रदेश संगठन मंत्री और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं.
पेपर लीक के दौर में लिया गया था बड़ा फैसला
राजस्थान में लगातार सामने आए पेपर लीक मामलों ने पिछली कांग्रेस सरकार की छवि को काफी नुकसान पहुंचाया था. विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सरकार ने भर्ती एजेंसियों में सेना के पूर्व अधिकारियों को जिम्मेदारी देकर एक बड़ा संदेश देने की कोशिश की थी. मकसद साफ था कि अनुशासन और सख्ती के लिए पहचाने जाने वाले सेना के अधिकारी भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी बनाएंगे और पेपर माफियाओं पर लगाम लगाने में मदद करेंगे. रिटायर्ड मेजर जनरल आलोक राज की नियुक्ति अगस्त 2023 में राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में हुई थी. वहीं लेफ्टिनेंट कर्नल केसरी सिंह को अक्टूबर 2023 में आरपीएससी का सदस्य बनाया गया था. दोनों नियुक्तियां विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुई थीं. आलोक राज के नेतृत्व में राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड ने दो साल के कार्यकाल में 130 परीक्षाओं का आयोजन किया है. अब निगाहें आरपीएससी पर टिकी हैं, जहां केसरी सिंह कार्यवाहक अध्यक्ष के तौर पर अपनी नई भूमिका में उतर चुके हैं.
केसरी सिंह के सामने मौका भी, चुनौती भी
केसरी सिंह के सामने यह जिम्मेदारी किसी परीक्षा से कम नहीं है. अगर उनके कार्यकाल में आरपीएससी समयबद्ध तरीके से परीक्षाएं करवा पाता है, पारदर्शिता बढ़ती है और भर्ती प्रक्रिया में कुछ नए प्रयोग देखने को मिलते हैं तो उनके लिए स्थायी अध्यक्ष बनने का रास्ता भी खुल सकता है. बताया जा रहा है कि आरपीएससी सदस्य के रूप में उनका कार्यकाल वर्ष 2029 तक है. ऐसे में यदि उन्हें स्थायी अध्यक्ष बनाया जाता है तो वे करीब तीन साल तक आयोग का नेतृत्व कर सकते हैं. हालांकि उनके सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं. आरपीएससी में उनकी सदस्य के रूप में हुई नियुक्ति को लेकर पहले भी सवाल उठे थे और विवाद भी सामने आए थे. अब कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में उनका प्रदर्शन ही तय करेगा कि वे आलोचकों को जवाब दे पाते हैं या नहीं.