बिहार में एक महिला के मृत और जिंदा होने की हैरान करने वाली कहानी, फिल्मों में भी इतना सस्पेंस नहीं

पटना/समस्तीपुर : बिहार के समस्तीपुर जिले से एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया, जहां एक जीवित महिला को पुलिस की रिपोर्ट में मृत घोषित कर दिया गया. यह मामला इतना गंभीर हो गया कि पटना हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई, संबंधित अधिकारियों से जवाब-तलब किया और ताजपुर थानाध्यक्ष को निलंबित तक कर दिया गया.

क्या है पूरा मामला? : पूरा मामला ताजपुर थाना क्षेत्र से जुड़ा है. दरअसल, वर्ष 2011 में एक नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म और हत्या की घटना हुई थी. इस मामले में पीड़िता की नानी ने मुख्य शिकायतकर्ता के रूप में केस लड़ा था. बाद में समस्तीपुर कोर्ट ने वर्ष 2013 में आरोपी को बरी कर दिया, जिसके खिलाफ पीड़िता की नानी ने पटना हाईकोर्ट में अपील दायर की थी.

समस्तीपुर के ताजपुर थाना का मामला
हाईकोर्ट में पेश रिपोर्ट से गड़बड़ी : इसी अपील की सुनवाई के दौरान पुलिस की ओर से हाईकोर्ट में एक रिपोर्ट पेश की गई, जिसमें कहा गया कि याचिकाकर्ता की मृत्यु हो चुकी है. यह रिपोर्ट समस्तीपुर पुलिस और ताजपुर थाना की ओर से अदालत में जमा कराई गई थी. पुलिस रिपोर्ट के आधार पर मामला प्रभावित होने लगा और अदालत ने भी इसे गंभीरता से लिया.

हाजिर हुईं मुर्दा घोषित पीड़िता की नानी : लेकिन पूरे मामले में तब बड़ा मोड़ आया, जब खुद पीड़िता की नानी अदालत में उपस्थित हो गईं और अपने जीवित होने के दस्तावेज पेश कर दिए. एक ‘मृत’ महिला को कोर्ट में जीवित देखकर अदालत भी हैरान रह गई. इसके बाद पटना हाईकोर्ट ने इस मामले को बेहद गंभीर मानते हुए समस्तीपुर के एसपी अरविंद प्रताप सिंह और ताजपुर थानाध्यक्ष राकेश कुमार शर्मा से जवाब मांगा.

जिंदा को मृत बताने पर भड़की हाईकोर्ट : चीफ जस्टिस संगम कुमार साहू की खंडपीठ ने अधिकारियों से पूछा कि आखिर गलत रिपोर्ट अदालत में कैसे दाखिल कर दी गई और क्यों न उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू की जाए. कोर्ट ने दोनों अधिकारियों को वर्चुअल मोड में उपस्थित रहने और व्यक्तिगत शपथपत्र दाखिल करने का आदेश भी दिया था.

थानाध्यक्ष को एसपी ने किया निलंबित : मामले की गंभीरता को देखते हुए समस्तीपुर एसपी ने ताजपुर थानाध्यक्ष राकेश कुमार शर्मा को निलंबित कर दिया. हालांकि 12 मई 2026 को हुई सुनवाई में जब सभी अधिकारी और संबंधित दस्तावेज कोर्ट में पेश किए गए, तब पूरे मामले की असली वजह सामने आई.

पटना हाईकोर्ट के आदेश पर निलंबन वापस
यहां हुई चूक : जांच में पता चला कि यह पूरा विवाद एक लिपिकीय भूल और अधूरी जानकारी के कारण हुआ. अदालत से जो पत्र जांच के लिए पुलिस को भेजा गया था, उसमें याचिकाकर्ता के पति या पिता का नाम दर्ज नहीं था. केवल नाम और क्षेत्र के आधार पर जांच की गई थी.

क्लर्कियल मिस्टेक : पुलिस जब दिए गए पते पर पहुंची तो वहां उसी नाम की दूसरी महिला मिली, जिसकी मृत्यु हो चुकी थी. स्थानीय सत्यापन और पंचायत स्तर की पुष्टि के बाद पुलिस ने उसी आधार पर रिपोर्ट तैयार कर कोर्ट में जमा कर दी. बाद में स्पष्ट हुआ कि वह दूसरी महिला थी, जबकि असली याचिकाकर्ता जीवित थीं और मुसरीघरारी थाना क्षेत्र की रहने वाली थीं.

हाईकोर्ट ने खत्म किया थानाध्यक्ष का निलंबन : स्थिति स्पष्ट होने के बाद पटना हाईकोर्ट ने ताजपुर थानाध्यक्ष राकेश कुमार शर्मा का निलंबन समाप्त कर दिया. साथ ही अदालत ने भविष्य में ऐसी गलती न हो, इसके लिए महत्वपूर्ण निर्देश भी जारी किए. कोर्ट ने कहा कि किसी भी याचिकाकर्ता की सही पहचान सुनिश्चित करने के लिए पुलिस या प्रशासन से पत्राचार करते समय उसके पति या पिता का नाम भी अनिवार्य रूप से दर्ज किया जाए.

न्याय प्रक्रिया में पहचान संबंधि त्रुटि का उदाहरण : सुनवाई के दौरान अदालत को यह भी बताया गया कि 293 अपीलीय मामलों में रजिस्ट्री द्वारा बार-बार रिमाइंडर भेजने के बावजूद रिपोर्ट नहीं भेजी गई थी, जिसे कोर्ट ने गंभीर प्रशासनिक लापरवाही माना. इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विकास कुमार पंकज ने पक्ष रखा. यह मामला अब सिर्फ एक लिपिकीय भूल नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड, पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया में पहचान संबंधी त्रुटियों के गंभीर परिणाम का उदाहरण बन गया है.