पटना: राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के प्रमुख घटक दलों, जदयू और भाजपा ने सीट शेयरिंग फॉर्मूले को सफलतापूर्वक अंतिम रूप दे दिया है। अन्य सहयोगी दलों के इधर-उधर झांकने की तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए, गठबंधन के रणनीतिकारों ने कठिन दिख रहे सीटों के बंटवारे को सुलझा लिया है। जदयू ने गठबंधन में बड़े भाई की भूमिका निभाई, लेकिन साथ ही नए सहयोगी दलों का भी पूरा ध्यान रखा। इस फॉर्मूले के तहत, जदयू को 101 सीटें, भाजपा को 100 सीटें, लोजपा (आर) को 29 सीटें, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) को 7 सीटें और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) को 6 सीटें मिली हैं।
बड़े भाई ने दी बड़ी कुर्बानी
वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव एक बार फिर बड़े भाई की भूमिका में दिखी। जदयू इस बार 101 विधानसभा सीटों पर चुनावी जौहर दिखाएगा। गत विधान सभा चुनाव 2020 में जेडीयू 115 सीटों पर लड़कर 43 सीटों पर जीत हासिल की थी। यानी मूल 72 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था। जदयू ने सीट शेयरिंग को बेहतर बनाने और सबकी बराबर हिस्सेदारी को ध्यान में रख कर गत चुनाव से 14 सीटें कम पर लड़ेगी। ये 14 सीटें अपने साथी दलों के लिए जेडीयू ने छोड़ा।
बीजेपी 100 सीटों पर लड़ेगी चुनाव
बीजेपी ने वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में छोटे भाई की भूमिका में उतरी है। लोकसभा चुनाव की हिस्सेदारी और गत विधानसभा चुनाव में अच्छे स्ट्राइक रेट के साथ 78 विधासनसभा सीटों पर जीतने के कारण माना जा रहा था कि बीजेपी इस बार बड़े भाई की भूमिका में रहेगी। मगर, गठबंधन की राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए बीजेपी छोटे भाई की भूमिका में रही। बीजेपी 2020 के विधानसभा चुनाव में 110 पर लड़ी थी। इस बार 10 सीटों की कुर्बानी साथी दलों के लिए देकर सीटों के बंटवारे को सुलझा लिया है।
साथी दलों को भी किया खुश
इस बार एनडीए के साथ दो नए साथी दल जुड़े तो एक साथी दल ने महागठबंधन का दामन थाम लिया। नए जुड़ने वालों में लोजपा (आर) और रालोमो ने फिर एनडीए का दामन थामा तो वीआईपी ने महागठबंधन की। लोजपा (आर) ने हालांकि 43 से 137 सीटों के बीच कोई संख्या की उम्मीद की थी। मगर और साथी दल को संतुष्ट करने के ख्याल से लोजपा (आर) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान भी बैक फूट पर आए। मिली जानकारी के अनुसार लोजपा (आर) को 29 विधानसभा सीटों पर जीत दिलाने की जिम्मेदारी मिली है। हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा सेक्युलर के संस्थापक अध्यक्ष जीतन राम मांझी 25 से 15 विधानसभा सीटों की दावेदारी पर लौटे। परन्तु साथी दल के नाम पर उनसे सीटों की कुर्बानी तो नहीं मांगी पर सीटों की संख्या बढ़ाया भी नहीं। जीतनराम मांझी अंततः 7 सीटों पर संतुष्ट हुए। राष्ट्रीय लोक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने 8 से 10 विधानसभा सीटों की मांग की थी, पर उन्हें भी छह सीटें देकर यथोचित हिस्सेदारी और जिम्मेदारी सौंप दी है।
क्या बना हिस्सेदारी का फॉर्मूला?
सीटों की हिस्सेदारी की बात करें तो इसके पीछे एनडीए के रणनीतिकारों का वो फॉर्मूला कार्य कर रहा है जो लोकसभा के सीटों पर आधारित है। इस लिहाज से देखें तो जदयू 17 लोकसभा जीती और बीजेपी ने 16। इसके बरक्स जदयू बड़े और बीजेपी छोटे भाई की भूमिका में दिख रही है। लोजपा पांच लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी, इसलिए उसे 29 सीटों पर चुनाव लड़ने को हरी झंडी मिली। हिंदुस्तानी आवाम मोर्च जिन सात सीटों पर लड़ी थी, इस बार भी उतनी सीटों पर लड़ेगी। राष्ट्रीय लोक मोर्चा न तो विधानसभा में न ही लोकसभा में कोई प्रतिनिधित्व है। एनडीए में ऐसे पार्टी लिए लोकसभा चुनाव के दौरान ये राय बनी थी कम से कम एक सीट दी जाएगी। इसी फॉर्मूला के तहत एक लोकसभा सीट के अनुसार छह विधानसभा सीटों की हिस्सेदारी उपेंद्र कुशवाहा को मिली है।