पटना. बिहार की राजनीति में इन दिनों मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर हलचल तेज हो गई है.वर्तमान एनडीए सरकार में सीएम नीतीश कुमार के पद छोड़ने के बाद एनडीए सरकार में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों के बीच भारतीय जनता पार्टी के भीतर संभावित नामों पर मंथन जारी है. सूत्रों के अनुसार, पार्टी के 7 वरिष्ठ नेताओं के नाम पहले से चर्चा रहे हैं, लेकिन अब दिल्ली में बीजेपी कोर ग्रुप की बैठक से पहले एक और नाम इस चर्चा में जुड़ जाने से सियासी समीकरण और दिलचस्प हो गए हैं.
7 नेताओं की लिस्ट ने बढ़ाई हलचल
बता दें कि शुरुआती दौर में जिन नेताओं के नाम मुख्यमंत्री पद के लिए सामने आए, उनमें नित्यानंद राय (Nityanand Rai), सम्राट चौधरी (Samrat Choudhary), विजय कुमार सिन्हा (Vijay Kumar Sinha), दिलीप जायसवाल (Dilip Jaiswal), रेणु देवी (Renu Devi), संजीव चौरसिया (Sanjeev Chaurasia) और जनक राम (Janak Ram) शामिल हैं. इन नामों में संगठन और सरकार दोनों के अनुभवी चेहरे हैं. इससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी सामाजिक समीकरण, अनुभव और राजनीतिक संतुलन जैसे सभी पहलुओं पर विचार कर रही है. लेकिन अब इसमें आठवां नाम भी जुड़ गया है.
8वें नाम की एंट्री से बढ़ा सस्पेंस
सूत्रों से खबर है कि दिल्ली में चल रही भाजपा के शॉर्टर कोर ग्रुप की बैठक के दौरान अगले मुख्यमंत्री के नाम को लेकर मंथन में एक और नाम चर्चा में जुड़ गया है. यह नाम है डॉ संजय जायसवाल (Dr Sanjay Jaiswal) का . डॉ. संजय जायसवाल का नाम सामने आने के बाद मुख्यमंत्री की रेस और खुली हुई नजर आ रही है. बता दें कि वे संगठन में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं और बिहार भाजपा के बिहार प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं. उनकी एंट्री से साफ हो रहा है कि पार्टी अंतिम फैसले से पहले हर संभावित विकल्प को परखना चाहती है.
बता दें कि दिल्ली में हो रही भाजपा की अहम बैठक को इस पूरे घटनाक्रम में निर्णायक माना जा रहा है. इस बैठक में राज्य और केंद्र के कई बड़े नेता शामिल हैं. माना जा रहा है कि यहां मुख्यमंत्री के नाम को लेकर प्रारंभिक सहमति बन सकती है, हालांकि औपचारिक फैसला विधायक दल की बैठक में ही होगा. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह बैठक आगे की रणनीति तय करने में अहम भूमिका निभाएगी.
सामाजिक समीकरण और रणनीति पर फोकस
जानकारों की नजर में मुख्यमंत्री चयन में पार्टी केवल राजनीतिक अनुभव ही नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन को भी ध्यान में रख रही है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि बिहार जैसे राज्य में जातीय और क्षेत्रीय समीकरण काफी अहम होते हैं. इसी कारण अलग-अलग वर्गों और क्षेत्रों से आने वाले नेताओं के नामों पर चर्चा की जा रही है. पार्टी यह सुनिश्चित करना चाहती है कि नया चेहरा सभी वर्गों को साथ लेकर चल सके.
क्या सरप्राइज फेस की संभावना?
इतने नामों के बीच यह संभावना भी जताई जा रही है कि भाजपा किसी नए या कम चर्चित चेहरे को आगे कर सकती है. पार्टी पहले भी कई राज्यों में अचानक नए चेहरे को सामने लाकर सभी को चौंका चुकी है. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बिहार में भी वही रणनीति अपनाई जाती है या फिर किसी अनुभवी नेता पर ही भरोसा जताया जाता है.