बिहार: कन्फर्म टिकट के बाद भी रातभर खड़े होकर की यात्रा, कोर्ट ने रेलवे पर ठोका जुर्माना; 4 साल बाद मिला न्याय

आरा। इंडियन रेलवे भले ही यात्रियों को आरामदायक सफर के बड़े-बड़े दावे करे, लेकिन भोजपुर की एक अदालत ने उसकी बड़ी लापरवाही पर कड़ा फैसला सुनाया है।जिला उपभोक्ता फोरम भोजपुर ने कन्फर्म टिकट होने के बाद भी यात्रियों को सीट न देने और उन्हें पूरी रात खड़े होकर सफर कराने के मामले में रेलवे को दोषी माना है। आयोग के अध्यक्ष कृष्ण प्रताप सिंह और सदस्य कमल किशोर सिंह की बेंच ने उत्तर मध्य रेलवे और रेल मंत्रालय पर जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने पीड़ित यात्री के टिकट का पूरा पैसा आठ फीसदी सालाना ब्याज के साथ लौटाने और मानसिक व शारीरिक परेशानी के बदले 35 हजार रुपये का हर्जाना देने का आदेश दिया है।

चार साल बाद मिला न्याय
यह मामला साल 2022 का है। कोईलवर प्रखंड के कायमनगर के रहने वाले रवि शंकर पांडेय ने अपने तीन दोस्तों के साथ विंध्याचल से आरा आने के लिए एलटीटी-पटना एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या 13202) के थर्ड एसी (3ए) कोच में चार कन्फर्म टिकट बुक कराए थे। इसके लिए उन्होंने 1,876 रुपये का ऑनलाइन भुगतान किया था। विंध्याचल स्टेशन पर जब ट्रेन आई तो कोच में भारी भीड़ थी और उनकी सीटों पर कुछ लोग अवैध रूप से कब्जा किए बैठे थे। पूछने पर उन्होंने खुद को रेलवे कर्मचारी बताया और सीट खाली करने से मना करते हुए बदतमीजी की।

ट्विटर पर लाइव शिकायत के बाद भी नहीं हुआ समाधान
पीड़ित यात्रियों ने ट्रेन में टीटीई और आरपीएफ को ढूंढने की कोशिश की,लेकिन कोई नहीं मिला। इसके बाद रवि शंकर ने सोशल मीडिया एक्स पर इंडियन रेलवे को टैग करके अपनी शिकायत दर्ज कराई।रेलवे के मांगने पर पीएनआर नंबर भी दिया गया। जिस पर शिकायत संख्या भी जारी हुई। इसके बावजूद ट्रेन में उन्हें कोई मदद नहीं मिली।  बक्सर स्टेशन पर जब एक टीटीई मिला तो उसने भी मदद करने के बजाय त्योहार की भीड़ का हवाला देकर मैनेज करने की गैर-जिम्मेदाराना सलाह दे डाली। इस वजह से चारों यात्रियों को पूरी यात्रा खड़े-खड़े तय करनी पड़ी।

अदालत में रेलवे का लचर तर्क खारिज
सुनवाई के दौरान रेलवे के वकीलों ने दलील दी कि ट्रेन में कानून-व्यवस्था देखना राजकीय रेलवे पुलिस का काम है। इसलिए इसके लिए रेलवे जिम्मेदार नहीं है। उपभोक्ता आयोग ने इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया। आयोग ने साफ कहा कि जब रेलवे यात्री से कन्फर्म सीट का पूरा पैसा लेता है, तो उसे सुरक्षित और आरामदायक सफर देना पूरी तरह रेलवे की जिम्मेदारी है। वैध टिकट के बाद भी यात्रियों को खड़ा रखना रेलवे की गंभीर लापरवाही है।

60 दिनों के भीतर भुगतान करने का निर्देश
उपभोक्ता आयोग ने अपने फैसले में रेलवे को आदेश दिया है कि वे टिकट के 1,876 रुपये आठ प्रतिशत ब्याज के साथ वापस करें। साथ ही मानसिक प्रताड़ना के लिए 20,000 रुपये और अदालती खर्च के रूप में 15,000 रुपये पीड़ित को दें। रेलवे को यह रकम 60 दिनों के भीतर चुकानी होगी, अगर तय समय में भुगतान नहीं हुआ, तो ब्याज दर बढ़कर 10 प्रतिशत हो जाएगी। इस मामले में शिकायतकर्ता की ओर से वकील वी. एन. सच्चू ने बहस की थी।