क्या आखिरी वक्त में सम्राट चौधरी के हाथ से फिसल गई बिहार CM की कुर्सी? BJP की मीटिंग रद्द

Bihar New CM Politics: मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा सांसद बनते ही बिहार के नए सीएम की चर्चा तेज हो गई है. इसको लेकर शुक्रवार (10 अप्रैल) को दिल्ली में बिहार बीजेपी कोर कमेटी की बैठक होनी थी, लेकिन आखिरी वक्त में इसे रद्द कर दिया गया. इसको लेकर बिहार का सियासी पारा चढ़ गया है. सियासी गलियारों में चर्चा है कि सीएम पद के लिए आगे चल रहे सम्राट चौधरी के नाम पर बीजेपी आलाकमान सहमत नहीं है, यही वजह है कि आखिरी मौके पर मीटिंग को ही रद्द कर दिया गया. आइए जानते हैं कि क्यों सम्राट चौधरी के हाथों से अचानक सीएम की कुर्सी फिसल गई है?

सियासी जानकारों का कहना है कि गुरुवार (9 अप्रैल) तक सब कुछ नॉर्मल था. राज्यसभा सांसद पद की शपथ लेने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गुरुवार को पटना से दिल्ली पहुंचे थे. उनके पीछे-पीछे डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी भी दिल्ली पहुंच गए थे. इसी बीच पटना में स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय के बाहर सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग को लेकर एक पोस्टर लगा दिए गए. हालांकि, पोस्टर लगने के कुछ ही देर बाद वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों ने उसे फाड़कर हटा दिया. भाजपा की ओर से स्पष्ट किया गया कि यह पोस्टर पार्टी द्वारा नहीं लगाया गया था और इसका पार्टी से कोई आधिकारिक संबंध नहीं है.

इसके बाद बीजेपी आलाकमान की ओर से प्रदेश कोर कमेटी के नेताओं को दिल्ली तलब कर लिया. शुक्रवार (10 अप्रैल) को पार्टी आलाकमान के साथ बैठक होनी थी. इस कोर टीम में विजय सिन्हा के साथ श्रेयसी सिंह को भी दिल्ली बुलाया गया था. यहीं से सम्राट चौधरी के नाम पर सस्पेंस के बादल मंडराने लगे थे. सूत्रों के मुताबिक, राजद की तरफ से सम्राट चौधरी की तरफदारी करना, उनको भारी पड़ गया. दरअसल, वे राजद से भाजपा में आए थे और इसी को लेकर राजद काफी खुश थी. राजद का कहना था कि आखिरकार बीजेपी को भी लालू के सिपाही को ही बिहार का सीएम बनाना पड़ रहा है. राजद का यह बयान दिल्ली नेतृत्व को अखर गया.

इसके अलावा सम्राट चौधरी दागी नेताओं में गिने जाते हैं. वे 1995 में 7 लोगों की हत्या के मामले में फंस चुके हैं. इस केस के अभियुक्तों में उनका नाम भी शामिल था, हालांकि उस समय उन्होंने खुद को नाबालिग बताया था, जिसके कारण उन्हें राहत मिल गई थी. 2025 में हुए बिहार चुनाव के दौरान जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने उन पर गलत जानकारी देने का आरोप लगाया था. पीके का कहना है कि 1995 में सम्राट चौधरी ने एक आपराधिक मामले में खुद को 15 साल का बताया था, जबकि 2020 के चुनाव हलफनामे में अपनी उम्र 51 बताई, जो विरोधाभासी हैं. इसके अलावा उनकी शैक्षणिक योग्यता (डिग्री) संदिग्ध है, जिसे लेकर भी राजनीतिक बयानबाजी होती रही है.