लालू से नीतीश तक जातीय समीकरणों से ही मिली सत्ता, अगले CM सेलेक्शन में बदलेगा पैमाना?

बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण बहुत मायने रखता है. पहले का नहीं पता, लेकिन 1990 में जातीय-सामाजिक समीकरण का बिहार में उदय हुआ. अब तो सूबे में काम करने वाली सभी क्षेत्रीय पार्टियों के साथ राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की भी यह मजबूरी बन गई है. लालू यादव इसके जनक हैं तो नीतीश कुमार इसके पोषक. अलबत्ता दोनों के तरीकों में फर्क है. लालू और उनके बाद बेटे तेजस्वी यादव को आज भी उम्मीद है कि जातीय समीकरण के सहारे वे एक न एक दिन बिहार की सत्ता पर काबिज जरूर होंगे. लालू को जातीय समीकरण की जमीन तत्कालीन पीएम विश्वनाथ प्रताप सिंह (प्रचलित नाम वीपी सिंह) ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर मुहैया कराई थी. भूराबाल (भूमिहार+राजपूत+ब्राह्मण+वाला) साफ करो का स्लोगन देकर लालू ने इसे लहकाया. इसी समीकरण के सहारे बिहार में 15 साल तक उनके परिवार का राज रहा. पहले वे मुख्यमंत्री बने और चारा घोटाले में जेल जाने की नौबत आई तो पार्टी के तमाम वरिष्ठों को दरकिनार कर पत्नी को कुर्सी पर बिठा दिया.

M-Y के लिए SC/OBC/EBC गंवाया
जातीय गोलबंदी के पीछे लालू की मंशा दलित-पिछड़ों के कल्याण की रही या नहीं, यह तो वे ही बता सकते हैं; लेकिन इसका 15 साल तक सियासी लाभ उन्होंने जरूर उठाया. यह भी सच है कि उन्होंने दलितों-पिछड़ों के कल्याण के बजाय शहाबुद्दीन और तसलीमुद्दीन जैसे सांसदों के सहयोग से बनाए गए M-Y (मुस्लिम-यादव) के लाभुक खूब बनाए. इसमें भी उन्होंने सबसे अधिक तवज्जो अपने परिवार और परिजनों को दी. फिर अपनी बिरादरी को मौका दिया. इक्का-दुक्का मौका दूसरी जाति के लोगों को भी मिला, लेकिन आबादी के अनुपात में नहीं. परिजनों में अपने साला द्वय- साधु और सुभाष को उन्होंने राजनीति में स्थापित किया तो घर की इकलौती महिला को सियासत के शीर्ष पर बिठा दिया. यह लालू के जातीय समीकरण का लाभ था. मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद देश में अगड़ो-पिछड़ों का जो जातीय उन्माद भड़का, उसका भरपूर लाभ बिहार में लालू ने और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने उठाया. यादव-मुसलमान के गठजोड़ से दूसरी ओबीसी, ईबीसी और दलित जातियों को सहयोग का गिफ्ट रिटर्न कुछ नहीं मिला. नीतीश ने इन जातियों को कायदे से साधा.

नीतीश को लव-कुश समीकरण से ही सत्ता
बिहार के विकास का सपना पाले नीतीश कुमार को पहली बार सफलता भले न मिली, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. दूसरी बार वे कामयाब हो गए. नीतीश कुमार की सफलता की बुनियाद में भी उनका जातीय समीकरण ही था. 1994 में कुर्मी और कोइरी (कुशवाहा) जातियों को लेकर बने लव-कुश समीकरण ने उन्हें एकजुट होकर सहयोग किया. यह अलग बात है कि कालांतर में उन्होंने हर जाति को साधने के लिए राजनीति में नए ढंग का प्रयोग किया. उन्होंने हर जाति में अपने पाकेट वोट बैंक बना लिए. दलितों की दलित-महादलित 2 श्रेणी बनाई और मुसलमानों की साझी जमात से छांट-बाछ कर पिछड़े मुसलमानों (पसमांदा) की बड़ी आबादी को उनके लिए विशेष योजनाएं बना-लागू कर अपना मुरीद बना लिया. लव-कुश (कुर्मी-कोइरी) के उनके जातीय समीकरण की करीब 10 प्रतिशत आबादी के अलावा जेडीयू को अब तक 6-7 प्रतिशत अधिक वोट अगर मिलते रहे हैं तो यह नीतीश कुमार के नायाब सियासी प्रयोग का परिणाम ही है.

राष्ट्रीय पार्टियां भी तो अछूती नहीं बचीं!
अब तो हालत यह है कि कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियां भी बिहार के जातीय समीकरण वाले प्रयोग से अपने को बचा नहीं पाईं. भाजपा तो कभी इस तरह की बातों को स्वीकार नहीं करती है, लेकिन कांग्रेस ने तो अब अपना चोला ही उतार दिया है. कांग्रेस को अब सवर्ण जातियों के पारंपरिक वोटों की परवाह नहीं रही. उसे तो अब दलित, पिछड़ों और मुसलमानों से प्रेम हो गया है. सवर्ण के सवाल पर बात करने से ही कांग्रेस सकुचाती है. चुनावों के लिए टिकट बांटना हो या संगठन का विस्तार करना हो, उन्हें विरले ही उसमें सवर्ण दिखेंगे. कांग्रेस का असली रूप इस बार बंगाल चुनाव में दिखा है. कांग्रेस ने बंगाल की 294 विधानसभा सीटों में 284 पर उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं. इसमें 70 सीटों पर मुसलमान और 68 पर दलित उम्मीदवार हैं. यानी आधी से अधिक सीटें सिर्फ 2 जातियों के खाते में गई हैं. इससे ही कांग्रेस के जातीय स्टैंड में आए बदलाव को समझा जा सकता है.

राजद को अब भी M-Y से ही आस
लालू यादव की पार्टी राजद को अब भी M-Y समीकरण पर अधिक भरोसा है. हालांकि उसका यह भरोसा किसी कसौटी पर परिणाम में कभी नहीं बदलता है. इसकी 2 वजहें हैं. पहली कि लालू ने सियासी लाभ के लिए गैर सवर्ण समाज को गोलबंद तो कर लिया, लेकिन जब वे ठगे महसूस करने लगे तो खुद-ब-खुद किनारे होते गए. नीतीश ने उन्हें लपक लिया. तभी से दलित और पिछड़े लालू के राजद के बजाय नीतीश के जेडीयू को पसंद करने लगे. मुसलमानों का भी राजद से भ्रम टूटा. उनकी 17 प्रतिशत आबादी के अनुपात में टिकट न मिलना, आंखें खोलने के लिए काफी था. यही वजह है कि मुस्लिम और यादव के क्रमश: 17 और 14 (31 प्रतिशत) वोटों के बावजूद 2025 के विधानसभा चुनाव में राजद को 23 प्रतिशत ही वोट मिले. इसका संकेत साफ है कि राजद का मुस्लिम-यादव समीकरण दरक चुका है.

तेजस्वी यादव
नीतीश कुमार का नया ‘लव-कुश’ दांव!
यह अलग बात है कि सीएम बनने के बाद नीतीश कुमार जातीय समारोहों में जाने से बचते रहे. पर, उन्होंने अपने स्वजातीय नेताओं को बढ़ावा देकर लव-कुश समीकरण वालों का भरोसा कायम रखा. आरसीपी सिंह और मनीष वर्मा को कभी उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के रूप में बढ़ावा दिया तो नौकरशाही में भी जातीय समीकरण का ख्याल रखा. 20 साल बाद नीतीश केद्र की राजनीति में लौट रहे हैं. समीकरण दरकने न पाए, इसके लिए उन्होंने लव (नीतीश) समाज के सीएम के बाद अगले मुख्यमंत्री के रूप में कुश समीकरण के व्यक्ति को आशीर्वाद दे दिया. नीतीश की यह फिर एक नई जटिल चाल है. नीतीश ने सम्राट चौधरी को अगले सीएम का आशीर्वाद दिया है. सार्वजनिक रूप से. अब भाजपा चाह कर भी सम्राट या लव-कुश समाज के ही किसी व्यक्ति को सीएम बनाने को मजबूर होगी. नीतीश कुमार का लव-कुश समीकरण जिंदाबाद.