भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज होने के बाद बिहार की राजनीति में जबरदस्त हलचल मची है. यह मामला अब सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई या कानूनी जांच का विषय नहीं रह गया है, बल्कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सरकार की राजनीतिक परीक्षा बन गया है. विपक्ष लगातार सरकार पर दबाव बढ़ा रहा है, वहीं एनडीए के भीतर भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं. सरकार ने पिछले कुछ महीनों में अपराध और अपराधियों के खिलाफ सख्त अभियान चलाया था. पुलिस की सक्रियता और अपराध नियंत्रण को सरकार अपनी बड़ी उपलब्धि बता रही थी. लेकिन भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद उठे सवालों ने इस पूरे अभियान को कटघरे में खड़ा कर दिया है. पुलिस अधिकारियों के खिलाफ हत्या समेत गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज होने से विपक्ष को सरकार पर हमला करने का बड़ा मौका मिल गया है.
तेजस्वी यादव, प्रशांत किशोर, कांग्रेस और वाम दल लगातार सरकार को घेर रहे हैं. विपक्ष का कहना है कि यदि पुलिस कार्रवाई पूरी तरह सही थी तो फिर एफआईआर दर्ज करने की नौबत क्यों आई. विपक्ष इस मामले को कानून-व्यवस्था, मानवाधिकार और पुलिस जवाबदेही से जोड़कर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है.
एनडीए में ही एक जैसी राय नहीं
एनडीए के भीतर ही इस मामले को लेकर पूरी तरह एक जैसी राय नहीं दिख रही है. एक ओर कुछ नेता जांच पूरी होने तक इंतजार करने की बात कह रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी खुलकर पुलिस कार्रवाई के समर्थन में सामने आए हैं. मांझी ने कहा है कि अपराधियों के खिलाफ सख्ती जरूरी है और पुलिस का मनोबल नहीं टूटना चाहिए. उनके बयान को सरकार के लिए राहत के तौर पर देखा जा रहा है. लेकिन दूसरी तरफ गठबंधन के कुछ नेताओं का मानना है कि सरकार को निष्पक्षता दिखानी होगी और जांच के नतीजों के आधार पर कार्रवाई करनी होगी.
सरकार के सामने दोहरी चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सरकार इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रही है. एक तरफ उसे अपराधियों के खिलाफ चल रहे अभियान को जारी रखना है, दूसरी तरफ यह संदेश भी देना है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है. यदि सरकार पुलिस अधिकारियों को बचाती हुई दिखती है तो विपक्ष इसे बड़ा मुद्दा बनाएगा. वहीं यदि जल्दबाजी में कार्रवाई होती है तो पुलिस बल के मनोबल पर असर पड़ सकता है.
अपराध के खिलाफ अभियान कटघरे में
इस विवाद का सबसे बड़ा असर बिहार में चल रहे एंटी-क्राइम अभियान पर पड़ा है, जो अब कटघरे में दिख रहा है. पिछले कुछ महीनों में सरकार अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई को अपनी पहचान बना रही थी. लेकिन अब हर पुलिस मुठभेड़ और हर बड़ी कार्रवाई पर सवाल उठने लगे हैं. पुलिस अधिकारी भी भविष्य में ऐसे मामलों में अधिक सतर्क रह सकते हैं, जिससे अपराध विरोधी अभियान की गति प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है.
मामले के सुप्रीम कोर्ट पहुंचने और न्यायिक जांच शुरू होने के बाद सरकार पर दबाव और बढ़ गया है. यदि जांच में केवल मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों की नहीं, बल्कि उच्च अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं, तो कार्रवाई का दायरा और बड़ा हो सकता है. विपक्ष पहले ही पूरे आदेश तंत्र और कमांड चेन की जांच की मांग कर रहा है.
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उनकी सरकार की कानून-व्यवस्था पर पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा मानी जा रही है. सरकार फिलहाल न्यायिक जांच का इंतजार कर रही है, लेकिन राजनीतिक दबाव कम होने के बजाय लगातार बढ़ता जा रहा है.
कुल मिलाकर भरत तिवारी एनकाउंटर अब सिर्फ एक पुलिस केस नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका है. विपक्ष इसे सरकार के खिलाफ हथियार बना रहा है, एनडीए के भीतर भी अलग-अलग राय सामने आ रही हैं, हालांकि जीतन राम मांझी जैसे नेता खुलकर पुलिस कार्रवाई के समर्थन में खड़े हैं. अब सबकी नजर जांच पर है, क्योंकि उसी से तय होगा कि यह मामला केवल कुछ अधिकारियों तक सीमित रहेगा या फिर सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक संकट बन जाएगा.