बिहार के सीएम की कुर्सी छोड़ कर नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले के बाद इतना तो स्पष्ट हो गया है कि एनडीए की सरकार भाजपा के नेतृत्व में ही बनेगी. नीतीश कुमार ने भी बेटे निशांत कुमार को अभी मुख्यमंत्री बनाए जाने की जेडीयू नेताओं की मांग ठुकरा कर भाजपा की राह आसान कर दी है. भाजपा भी इसे समझ गई है कि दशकों बाद मिले मौके को वह गंवाना ठीक नहीं होगा. नए मुख्यमंत्री के संभावित चेहरों पर भी कयास लगने लगे हैं. भाजपा से मुख्यमंत्री के जिन नामों की चर्चा जोरों पर है, उनमें सबसे आगे मौजूदा डेप्युटी सीएम सम्राट चौधरी का नाम है. उसके बाद केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय और दूसरे डेप्युटी सीएम विजय सिन्हा के नाम की चर्चा मीडिया की खबरों में उछल रहे हैं. अब एक नया नाम सोशल मीडिया पर अभय गिरि का भी आया है. उनके नाम की चर्चा कहां से शुरू हुई है, यह किसी को नहीं पता. हालांकि विश्लेषक उनके नाम को इसलिए खारिज नहीं कर रहे, क्योंकि भाजपा ऐसे नए नामों से चौंकाती रही है.
‘मामा’ की जगह मोहन से चौंकाया
मध्य प्रदेश विधानसभा के पिछले चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उर्फ मामा की कुशल और कारगर चुनावी रणनीति से भाजपा ने हारती बाजी जीत ली थी. शिवराज सिंह की लाडली बहना योजना की उनकी रणनीति कारगर साबित हुई थी. उनके सामने सीएम पद का कोई दूसरा दावेदार भी दूर-दूर तक नहीं दिखता था. पर, क्या हुआ, यह सबको पता है. उन्हें भाजपा ने केंद्र में बुला कर मंत्री बना दिया. उनकी जगह डाक्टर मोहन यादव को भाजपा ने सामने कर दिया. बेशक यह स्थिति तब शिवराज सिंह को विचलित करने वाली लगी होगी, लेकिन भाजपा हमेशा दूरगामी रणनीति पर काम करती है. संभव है कि शिवराज के बारे में उसे अच्छा या बुरा फीड बैक मिला हो. अच्छा यह कि भाजपा उन्हें लिए इससे भी आगे ले जाना चाहती है. बुरा यह कि उन्होंने फ्रीबीज पर भाजपा के स्टैंड के खिलाफ लाडली बहना योजना लागू की हो. कारण जो रहे हों, लेकिन भादपा ने अपने फैसले से चौंकाया जरूर.
हरियाणा व दिल्ली में भी सरप्राइज
वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी की देशव्यापी लहर थी. भाजपा ने एक नया प्रयोग किया. जिस तरह मोदी के चेहरे पर भाजपा को लोकसभा चुनाव में भारी सफलता मिली थी, उससे भाजपा को लगा कि विधानसभा चुनावों में भी उनके चेहरे का ही इस्तेमाल किया जाए. भाजपा का प्रयोग सफल रहा और हरियाणा और झारखंड में उसने विरोधियों से सत्ता झटक ली. भाजपा ने दूसरा प्रयोग मुख्यमंत्री का अप्रत्याशित चेहरा उतार कर किया. हरियाणा में मनोहर खट्टर और झारखंड में रघुवर दास सीएम के अप्रत्याशित नाम थे. भाजपा को अपनी रणनीति की सफलता ने इतना उत्साहित किया कि इसे हरियाणा में रिपीट किया. इस बार भी हरियाणा में भाजपा ने अप्रत्याशित सीएम ही बनाया. दिल्ली के हालिया चुनाव में अर्से बाद भाजपा को मिली सफलता के बाद भाजपा ने सीएम के चयन का यही फार्मूला अपनाया. रेखा गुप्ता के नाम की दूर-दूर तक चर्चा नहीं थी. उन्हें भाजपा ने सीएम बना दिया.
बिहार के सम्राट की इन दिनो चर्चा
इन दिनों बिहार में इसी बात की चर्चा जोरों पर है कि नीतीश कुमार की पसंद बताए जा रहे सम्राट चौधरी ही सीएम बनेंगे या भाजपा अपने चौंकाने वाली नीति का अनुसरण करेगी. सम्राट को ही बिहार का अगला सीएम मानने की 2 वजहें हैं. पहला कि हाल ही संपन्न अपनी समृद्धि यात्रा में नीतीश कुपार ने साथ चल रहे सम्राट चौधरी के बारे में बार-बार इशारा किया कि उनकी पसंद के अगले सीएम वे ही होंगे. सम्राट फिलहाल डेप्युटी सीएम हैं और गृह जैसा महत्वपूर्ण विभाग उन्हें देने में नीतीश ने तनिक भी आनाकानी नहीं की. नीतीश से उनकीट्ययूनिंग और केमिस्ट्री भी अच्छी रही है. भाजपा ने अब तक यही संकेत दिया है कि बिहार में नीतीश के विकल्प वे ही होंगे. पहले नेता प्रतिपक्ष बनाया, फिर पार्टी की कमान उन्हें सौंप दी. मौका मिला तो दूसरी बार उन्हें डेप्युटी सीएम बनाया. इस बार तो उन्हें बड़ा प्रमोशन मिला. नीतीश के पास शुरू से रहने वाला गृह विभाग भी उन्हें थमा दिया.
बिहार में CM नहीं बना Dy. CM!
बिहार के साथ चर्चाओं में एक और बात जोड़ी जाती है. यह कि कर्पूरी ठाकुर को छोड़ कर कोई भी डेप्युटी सीएम रहा व्यक्ति कभी सीएम नहीं बना. नीतीश कुमार के साथ सुशील मोदी वर्षों तक डेप्युटी सीएम रहे. अनुकूल स्थितियों में भी उन्हें सीएम बनने का सौभाग्य नहीं मिला. तेजस्वी यादव टुकड़ों-टुकड़ों में 2 बार डेप्युटी सीएम रहे. 2 टर्म से वे सीएम बनने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं. इसी जद्दोजहद में इस बार उनकी ऐसी हालत हुई है कि उन्हें इसे दुरुस्त करने में अब सैकड़ों जतन फिर से करने पड़ेंगे. इस बार तो 2 डेप्युटी सीएम हैं. दोनों भाजपा कोटे के. भाजपा इनमें चाहे भी तो किसी एक को ही मौका दे सकती है. तमाम तरह के स्रोतों की सूचनाओं और सियासी संकेतों को डिकोड कर विश्लेषक इस नतीजे पर दिखते हैं कि दोनों में सम्राट को ही भाजपा बिहार का ‘चौधरी’ बनाएगी. संदेह की वजह सिर्फ एक है. भाजपा सीएम के चयन में चौंकाती रहती है. बिहार में चौंकाने वाला फैसला हुआ तो यह मान लेना चाहिए कि भाजपा ने चौंकाने वाले प्रयोग को अब अपनी नीति की मान्यता दे दी है.