बिहार चुनाव में अचानक पिछड़ता हुआ क्यों दिख रहा महागठबंधन? 6 बड़ी वजहों पर नजर डालिये

पटना. बिहार विधानसभा चुनाव 2025 अब सिर्फ कुछ ही महीनों की दूरी पर है और सियासी माहौल गरमा चुका है. हाल के सर्वेक्षणों में यह साफ झलक रहा है कि महागठबंधन जनता का भरोसा जीतने में पीछे रह गया है, जबकि एनडीए लगातार बढ़त बनाता दिख रहा है.पीएम मोदी की लोकप्रियता और नीतीश कुमार के अनुभव ने इस गठजोड़ को मजबूती दी है, वहीं विपक्षी खेमे में चेहरा, नैरेटिव और रणनीति सबकुछ बिखरा नजर आ रहा है. यही वजह है कि अलग-अलग सर्वे एजेंसियों के अनुमानों में चुनावी हवा महागठबंधन के खिलाफ और एनडीए के पक्ष में बहती दिख रही है और बिहार चुनाव में महागठबंधन लगातार पिछड़ता दिख रहा है.

दरअसल, पीएम मोदी और सीएम नीतीश की जोड़ी, तेजस्वी की नेतृत्व चुनौती, कांग्रेस की कमजोर उपस्थिति और नए राजनीतिक खिलाड़ियों ने विपक्ष के समीकरण बिगाड़ दिए हैं. जनसुराज और ओवैसी जैसे फैक्टर ने महागठबंधन की जमीन और कमजोर कर दी है. सबसे बड़ी कमी महागठबंधन के पास कोई ठोस नैरेटिव न होना माना जा रहा है. ऐसे में यही कारण है कि चुनावी हवा में एनडीए मजबूत और विपक्ष बिखरा हुआ नजर आ रहा है.

मोदी-नीतीश के चेहरे के आगे सब हुए धराशायी
बिहार की राजनीति में चेहरों का असर हमेशा निर्णायक रहा है. इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रशासनिक पकड़ ने चुनावी समीकरण को बदल दिया है. सर्वे बताते हैं कि नीतीश का अनुभव और मोदी का करिश्मा मिलकर एनडीए को मजबूत बना रहे हैं. इसके आगे महागठबंधन का कोई चेहरा बराबरी नहीं कर पा रहा. तेजस्वी यादव जरूर एक संभावना के तौर पर उभरकर सामने आए हैं, लेकिन विभिन्न ओपिनियन पोल में मोदी-नीतीश की जोड़ी जनता को ज्यादा भरोसेमंद लग रही है.

तेजस्वी यादव महागठबंधन का सबसे बड़ा चेहरा हैं, लेकिन उनके नेतृत्व को लेकर जनता और सहयोगी दलों दोनों में भ्रम है. कई बार उनके बयानबाजी और रणनीति को लेकर सवाल उठे हैं. अलग-अलग सर्वे अनुमानों में युवा नेता होने के बावजूद वे अभी तक स्थायी विश्वास पैदा नहीं कर पाए. यही कारण है कि कभी उन्हें सीएम के विकल्प के रूप में आगे बढ़ते हुए दिखाया जाता है, तो कभी विपक्षी खेमे में भी असहमति झलकती है. यह कन्फ्यूजन महागठबंधन को नुकसान पहुंचा रहा है.

महागठबंधन की ओर से दिख रहा नए नैरेटिव का अभाव
दरअसल, हर चुनाव एक नई कहानी मांगता है, एक ऐसा मुद्दा जो जनता से जुड़ सके. लेकिन, महागठबंधन अभी तक कोई ठोस नैरेटिव गढ़ने में नाकाम रहा है. न रोजगार का ठोस एजेंडा, न शिक्षा-स्वास्थ्य पर स्पष्ट विज़न. केवल नीतीश विरोध या मोदी विरोध से जनता को साधा नहीं जा सकता. जबकि, एनडीए लगातार “विकास, स्थिरता और नेतृत्व” की लाइन पर अपनी पकड़ मजबूत किए हुए है.

कांग्रेस का सीमित प्रभाव, महागठबंधन का बिगड़ता खेल
महागठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी उसके सहयोगी दलों में कांग्रेस है. राज्य में कांग्रेस का संगठन बेहद कमजोर है और उसकी जमीनी पकड़ नगण्य है. महज कुछ सीटों पर लड़कर कांग्रेस गठबंधन का हिस्सा तो बनती है, लेकिन कोई बड़ा वोट ट्रांसफर कराने की स्थिति में नहीं है. इस बार भी कांग्रेस की भूमिका ‘यूपीए के सहारे’ वाली ही दिख रही है जो गठबंधन को और कमजोर कर रही है.

बिहार की राजनीति में नया विकल्प, जनसुराज की चुनौती
प्रशांत किशोर की ‘जनसुराज’ यात्रा ने बिहार की राजनीति में एक नया विकल्प पैदा किया है. हालांकि, चुनावी नतीजों में इसका बड़ा असर कितना होगा ये कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव महागठबंधन पर साफ दिख रहा है. युवा और पढ़े-लिखे तबके में पीके की बात सुनी जा रही है. इससे विपक्ष के वोटबैंक में सेंध पड़ सकती है. सर्वे बता रहे हैं कि खासकर शहरी और शिक्षित मतदाताओं में पीके का क्रेज है.

ओवैसी की रणनीति, महागठबंधन का कमजोर समीकरण
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का बिहार में सीमांचल इलाका हमेशा से टारगेट रहा है. यहां मुस्लिम वोटों पर उनकी पकड़ बढ़ रही है, जिसका सीधा असर महागठबंधन के पारंपरिक वोट बैंक पर पड़ रहा है. विभिन्न ओपिनियन पोल के अनुसार, सीमांचल में आरजेडी को मुस्लिम-यादव समीकरण पर हमेशा भरोसा रहा है, लेकिन ओवैसी की सक्रियता इस समीकरण को कमजोर कर सकती है. यह भी महागठबंधन की हार की एक बड़ी वजह बन सकती है.