इनकम टैक्स रिटर्न भरते समय भूलकर भी न करें ये 10 गलतियां, वरना आ सकता है टैक्स नोटिस

Income Tax Filing: इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) गलत तरीके से भरने पर टैक्सपेयर्स को पेनल्टी, इनकम टैक्स विभाग का नोटिस और रिफंड मिलने में देरी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. कई लोग सिर्फ तय समय सीमा से पहले ITR दाखिल करने पर ध्यान देते हैं. लेकिन, गलत ITR फॉर्म चुनना, सभी इनकम के सोर्स की जानकारी न देना, गलत टैक्स डिडक्शन क्लेम करना या ITR वेरिफाई करना भूल जाना बाद में महंगा साबित हो सकता है. असेसमेंट ईयर (AY) 2026-27 के लिए ITR फाइलिंग जारी है. ऐसे में जानते हैं 10 आम गलतियों के बारे में, जिनसे बचकर आप बिना किसी परेशानी के अपना ITR दाखिल कर सकते हैं.

1. अगर आप ITR फाइल करने की आखिरी तारीख से चूक गए तो…

सबसे आम गलतियों में से एक है तय समय सीमा के बाद ITR दाखिल करना होता है. आयकर अधिनियम की धारा 234F के तहत समय पर ITR दाखिल नहीं करने पर टैक्सपेयर्स को अधिकतम 5,000 रुपये तक की लेट फीस देनी पड़ सकती है. हालांकि, अगर किसी व्यक्ति की कुल आय 5 लाख रुपये से अधिक नहीं है, तो लेट फीस 1,000 रुपये तक सीमित रहेगी.

2. आय कम दिखाना या गलत जानकारी देना
अगर कोई टैक्सपेयर अपनी पूरी टैक्स योग्य इनकम की जानकारी नहीं देता है, तो उसे भारी जुर्माना भरना पड़ सकता है. आयकर अधिनियम की धारा 270A के तहत अगर कोई करदाता अपनी आय कम दर्शाता है, तो कम दर्शाई गई आय पर देय कर का 50% तक जुर्माना लगाया जा सकता है. अगर आयकर विभाग को ये पता चलता है कि टैक्सपेयर ने जानबूझकर आय छिपाई है. गलत एंट्री की है या गलत टैक्स छूट का दावा किया है, तो इसे मिसरिपोर्टिंग माना जाएगा. ऐसे मामलों में जुर्माना बढ़कर गलत बताई गई आय पर देय टैक्स का 200 फीसदी तक हो सकता है.

3. सिर्फ फॉर्म 16 पर निर्भर रहना
कई सैलरीड कर्मचारी ये मान लेते हैं कि Form 16 में ITR भरने के लिए जरूरी सारी जानकारी होती है. जबकि फॉर्म 16 में केवल वेतन और नियोक्ता द्वारा काटे गए TDS की जानकारी होती है. इसमें बैंक ब्याज, फिक्स्ड डिपॉजिट का ब्याज, डिविडेंड, कैपिटल गेन, किराये की आय या फ्रीलांस आय जैसी अन्य कमाई शामिल नहीं होती. ITR दाखिल करने से पहले फॉर्म 16 का एनुअल इनफार्मेशन स्टेटमेंट (AIS), फॉर्म 26AS, बैंक स्टेटमेंट और निवेश रिकॉर्ड से मिलान जरूर करें.

4. गलत ITR फॉर्म या टैक्स रिजीम चुनना
गलत ITR फॉर्म चुनने पर आपका रिटर्न डिफेक्टिव माना जा सकता है और उसकी प्रोसेसिंग में देरी हो सकती है. इसलिए अपनी इनकम के सोर्स और एलिजिबिलिटी के मुताबिक सही ITR फॉर्म का चयन करें. इसी तरह बिना तुलना किए गलत टैक्स रिजीम (Old Tax Regime या New Tax Regime) चुनने से जरूरत से ज्यादा टैक्स देना पड़ सकता है. ITR दाखिल करने से पहले दोनों टैक्स रिजीम के तहत टैक्स देनदारी की तुलना जरूर करें.

5. गलत टैक्स डिडक्शन का दावा करना
टैक्सपेयर्स को धारा 80C, 80D और 80G जैसी धाराओं के तहत केवल उन्हीं निवेशों या भुगतान पर टैक्स छूट का दावा करना चाहिए, जो वास्तव में संबंधित वित्त वर्ष के दौरान किए गए हों. अगर आपने नियोक्ता को निवेश करने का दावा किया था. लेकिन, बाद में वो निवेश नहीं किया और फिर भी ITR में डिडक्शन क्लेम कर दिया, तो भविष्य में अतिरिक्त टैक्स, ब्याज और जुर्माना भरना पड़ सकता है.

6. AIS और फॉर्म 26AS की जानकारी में अंतर
अगर ITR में दी गई जानकारी और AIS, फॉर्म 26AS या फॉर्म 16 में दर्ज जानकारी में अंतर पाया जाता है, तो आयकर विभाग नोटिस भेज सकता है. साथ ही आपका रिफंड भी अटक सकता है. ITR दाखिल करने से पहले सभी इनकम के सोर्स, TDS और हाई-वैल्यू वित्तीय लेनदेन का रिकॉर्ड अच्छी तरह जांच लें.

7. संशोधित ITR (Revised ITR) देर से दाखिल करना
अगर ITR दाखिल करने के बाद कोई गलती पता चलती है, तो टैक्सपेयर रिवाइज्ड रिटर्न दाखिल कर सकते हैं. लेकिन इसमें देरी करने पर अतिरिक्त शुल्क देना पड़ सकता है. धारा 234 के तहत अगर कुल आय 5 लाख रुपये तक है और निर्धारित समय के बाद रिवाइज्ड रिटर्न दाखिल किया जाता है, तो 1,000 रुपये का शुल्क देना पड़ सकता है, अन्य मामलों में देरी के आधार पर ये शुल्क 5,000 रुपये तक हो सकता है.

8. सभी आय के सोर्स की जानकारी नहीं देना
कई टैक्सपेयर केवल अपनी सैलरी की जानकारी देते हैं और बैंक ब्याज, एफडी का ब्याज, डिविडेंड, किराये की आय, फ्रीलांस इनकम या कैपिटल गेन जैसी अन्य आय को शामिल नहीं करते. भले ही इनकम पर TDS कट चुका हो, फिर भी सभी टैक्स योग्य इनकम की जानकारी ITR में देना अनिवार्य है. ऐसा नहीं करने पर टैक्स नोटिस, अतिरिक्त टैक्स, ब्याज और जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है. ITR दाखिल करने से पहले AIS, फॉर्म 26AS, बैंक स्टेटमेंट और निवेश रिकॉर्ड का मिलान जरूर करें.

9. बैंक खाते की गलत जानकारी देना
गलत बैंक खाता नंबर, गलत IFSC कोड या बैंक खाते का प्री-वैलिडेशन नहीं होने पर इनकम टैक्स रिफंड मिलने में देरी हो सकती है. ITR दाखिल करने से पहले ये सुनिश्चित करें कि आपका बैंक खाता PAN से लिंक हो और आयकर ई-फाइलिंग पोर्टल पर प्री-वैलिडेटेड हो.

10. ITR दाखिल करने के बाद वेरिफाई नहीं करना
सिर्फ ITR दाखिल करना ही पर्याप्त नहीं है. ITR तभी पूरा माना जाता है, जब उसे निर्धारित समय के भीतर आधार OTP, नेट बैंकिंग, डीमैट अकाउंट या अन्य स्वीकृत माध्यमों से वेरिफाई किया जाए. अगर ITR वेरिफाई नहीं किया जाता, तो उसे अमान्य (इनवैलिड) माना जाता है, यानी कानूनन ऐसा माना जाएगा कि आपने ITR दाखिल ही नहीं किया. इससे रिफंड में देरी हो सकती है और नॉन-फाइलिंग से जुड़े अन्य परिणाम भी भुगतने पड़ सकते हैं.