Sovereign Gold Bonds: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने साल 2017-18 सीरीज-VI सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड्स (SGB) के लास्ट रिडेम्प्शन के लिए 6 नवंबर को ऐलान कर दिया है. 6 नवंबर 2017 को जारी किये गए बॉन्ड का इश्यू प्राइस 2,895 रुपये प्रति ग्राम था, जो कि अब रिडेम्प्शन प्राइस बढ़कर 12,066 तय हुआ है. यानी आठ साल में 316.78% का नेट प्रॉफिट. आसान भाषा में आप यह कह सकते हैं कि 2,895 रुपये आठ साल में चार गुने से भी ज्यादा बढ़कर 12,066 रुपये हो गए. 8 साल का 2.5% सालाना ब्याज अलग से है. ऑनलाइन पेमेंट पर 50 रुपये डिस्काउंट लेने वालों को इश्यू प्राइस 2,845 रुपये मानकर प्रॉफिट 324.11% तक पहुंच गया है.
8 साल बाद मैच्योरिटी पर होगा पेमेंट
आरबीआई की तरफ से 4 नवंबर को बयान जारी कर कहा गया कि 8 साल बाद मैच्योरिटी पर पेमेंट करना होगा. रिडेम्प्शन प्राइस इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन (IBJA) के 31 अक्टूबर, 3 और 4 नवंबर 2025 के क्लोजिंग गोल्ड प्राइस के एवरेज पर बेस्ड हैं. आपको बता दें SGB पर मिलने वाला 2.5% सालाना ब्याज इनकम टैक्स एक्ट 1961 के सेक्शन 43 के तहत टैक्सेबल है. लेकिन रिडेम्प्शन पर होने वाला कैपिटल गेन लोगों के लिए पूरी तरह टैक्स-फ्री है.
316% के प्रॉफिट पर किसी तरह का टैक्स नहीं
पैसा ट्रांसफर करने पर लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन को इंडेक्सेशन बेनिफिट भी दिया जाता है. यानी 316% प्रॉफिट पर किसी तरह का टैक्स नहीं देना होता. ब्याज सालाना आधार पर सीधे बैंक अकाउंट में क्रेडिट होता है. प्रीमैच्योर रिडेम्प्शन 5वें साल के बाद नेक्स्ट इंटरेस्ट पेमेंट डेट पर संभव था, लेकिन ज्यादातर निवेशकों ने 8 साल तक होल्ड कर मोटा मुनाफा कमाया है.
क्या है सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड स्कीम?
भारत सरकार की तरफ से नवंबर 2015 में SGB स्कीम लॉन्च की गई थी ताकि फिजिकल गोल्ड की जगह सुरक्षित निवेश रहे. RBI सेंटर की तरफ से ग्राम में डिनॉमिनेटेड बॉन्ड जारी किया जाता था. निवेशकों को इस पर डबल फायदा होता था, पहला 2.5% का फिक्स्ड सालाना ब्याज + गोल्ड प्राइस से जुड़ा कैपिटल एप्रिशिएशन. इसका मकसद इंपोर्टेड गोल्ड पर निर्भरता कम करना और घरेलू बचत को फाइनेंशियल एसेट में चैनलाइज करना था. इसमें कोई स्टोरेज रिस्क, चोरी का डर या मेकिंग चार्ज की चिंता नहीं थी.
नया SGB इश्यू अक्टूबर 2023 में क्यों हुआ बंद?
सरकार की तरफ से अक्टूबर 2023 में फ्रेश SGB इश्यू को बंद कर दिया गया. इसका कारण स्कीम का अपना मकसद हासिल करना था. इसमें मैनेजमेंट और सर्विसिंग कॉस्ट बढ़ गई. गोल्ड ETF, डिजिटल गोल्ड जैसे ऑप्शन उपलब्ध होने से पीरियोडिक इश्यू की जरूरत कम हो गई. हालांकि मौजूदा बॉन्ड वैलिड हैं – होल्ड या प्रीमैच्योर रिडेम्प्शन का ऑप्शन अभी भी निवेशकों के पास है.