करनाल: हरियाणा के करनाल में करोड़ों की जमीन का घोटाला सामने आया है. यहां 2500 करोड़ कीमत की करीब 1200 एकड़ जमीन को भूमाफियाओं ने फर्जी वारिस बनाकर हड़प ली. खास बात यह है कि यह जमीन पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के परिवार की है. अब पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने इस मामले को सीबीआई के हवाले कर दिया है और ग्रामीणों को न्याय की उम्मीद जगी है.
लियाकत अली के चचेरे भाई की थी यह जमीन
करनाल के डबकौली खुर्द गाँव में बसी यह 1200 एकड़ की ज़मीन लियाकत अली खान के चचेरे भाई उमरदराज अली खान की थी. लियाकत का जन्म भी यहीं हुआ था और उनके पिता नवाब रुकनुद्दौला को ब्रिटिश सरकार ने नवाब की उपाधि दी थी. उमरदराज की 1935 में मृत्यु के बाद उनकी ज़मीन उनके पांच बेटों नवाबजादा शमशाद, इरशाद, एजाज, मुमताज और इम्तियाज अली खान के नाम दर्ज हुई. लियाकत की शादी उमरदराज की बेटी जहांगीर बेगम से हुई थी.
बंटवारे के बाद चले गए थे पाकिस्तान
1947 के बंटवारे के बाद यह परिवार पाकिस्तान चला गया. 1945-46 में यमुना नदी के बहाव ने गांव का हिस्सा उत्तर प्रदेश की ओर धकेल दिया और 1950 में उत्तर प्रदेश के जमींदारी एबोलिशन एक्ट ने इस ज़मीन को एवाक्यूई प्रॉपर्टी बना दिया. 1962 में जनरल कस्टोडियन ऑफ इंडिया ने इसे कस्टोडियन के अधीन कर लिया. आज इस ज़मीन की कीमत 2500 करोड़ तक आँकी गई है, जिसमें करनाल शहर की 100 दुकानें और कुंजपुरा सैनिक स्कूल के पास 50 संपत्तियाँ शामिल हैं.
90 के दशक से शुरू हुआ खेल
1990 के दशक में भूमाफियाओं ने फर्जी वसीयत और झूठे वारिस बनाकर 1200 एकड़ ज़मीन पर कब्ज़ा शुरू किया. इसमें पटवारी, कानूनगो, राजस्व अधिकारी और कुछ नेताओं की मिलीभगत का आरोप है. ग्रामीणों का कहना है कि जमशेद अली खान, खुर्शीद अली खान, इम्तियाज बेगम जैसे फर्जी वारिस बनाकर 1813 बीघा 11 बिसवा ज़मीन की रजिस्ट्री कराई गई. इसमें राजस्व विभाग के बड़े अधिकारियों की भी साठगांठ थी. करनाल शहर की 800 करोड़ की संपत्तियाँ, जिसमें दुकानें और आवासीय मकान शामिल हैं, भी निशाने पर थीं.
ग्रामीण 20 साल से कर रहे संघर्ष
डबकौली खुर्द के किसान सोनू, धनप्रकाश, वेदप्रकाश, विष्णु, लखमीर और सरपंच सतपाल ने इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाई. 2005 में 150-200 शिकायतें हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री को सौंपी गईं, जिसके बाद इंद्री थाने में एफआईआर 291 दर्ज हुई, जिसमें धारा 420, 465, 467, 468, 471 और 120-बी लगाई गईं, लेकिन जांच को दबा दिया गया. 2007-08 में कब्ज़े की कोशिशें नाकाम हुईं, क्योंकि ग्रामीणों ने विरोध किया.
2009-10 में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई, जिसके बाद एसआईटी बनी, लेकिन वह भी निष्क्रिय रही. 2011-12 में गवाहों को रिश्वत और ज़मीन देकर चुप कराने की कोशिश हुई. 2018 में जांच अधिकारी अंग्रेज सिंह ने कोर्ट में कहा कि उन्हें कोई शिकायत नहीं मिली. ग्रामीण इसे भूमाफियाओं के दबाव का नतीजा मानते हैं.
हाईकोर्ट का सख्त रुख, सीबीआई की एंट्री
12 सितंबर 2025 को जस्टिस जसजीत सिंह बेदी की बेंच ने इस मामले को गंभीरता से लिया. कोर्ट ने कहा कि यह मामला गहन जांच माँगता है. सीबीआई को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया, और अगली सुनवाई 12 जनवरी 2026 तय की गई. सीबीआई ने डायरी नंबर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है. एडवोकेट कर्ण शर्मा और रामकिशन का कहना है कि यह ग्रामीणों के लिए न्याय की दिशा में बड़ा कदम है.