तांत्रिकों से इलाज कराना बीमारी का सूबेत नहीं, महिला कांस्टेबल को हिमाचल हाईकोर्ट से झटका

शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने तांत्रिकों से इलाज को आधार बनाकर पुलिस ट्रेनिंग से लगातार गैर-मौजूद रहने को पूरी तरह अस्वीकार्य मानते हुए एक ट्रेनी लेडी कांस्टेबल की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने साफ कहा कि तांत्रिकों से इलाज कराने को बीमारी का प्रमाण नहीं माना जा सकता और यह दलील जानबूझकर ट्रेनिंग से दूर रहने की वजह को छिपाने के लिए स्वीकार्य आधार नहीं हो सकती।

न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की एकलपीठ ने पुलिस विभाग के 25 अगस्त 2010 के उस आदेश को सही बताया। इसके तहत याचिकाकर्त्ता को ट्रेनिंग के दौरान ही लेडी कांस्टेबल के पद से हटा दिया गया था। न्यायालय ने रिकॉर्ड देखने के बाद माना कि याचिकाकर्त्ता के पास अपनी लंबी अनुपस्थिति को साबित करने के लिए कोई मान्य मेडिकल सबूत नहीं था और उसने विभागीय प्रक्रिया के दौरान भी अपने दावों को प्रमाणित नहीं किया।

मामले के अनुसार 2010 में याचिकाकर्त्ता को बिलासपुर जिले में महिला कांस्टेबल के रूप में नियुक्त किया गया था। नियुक्ति के बाद उसे अनिवार्य पुलिस प्रशिक्षण पूरा करना था, लेकिन वह कुल 48 दिनों तक ट्रेनिंग से गैर-मौजूद रही। इस अवधि में उसने केवल 13 दिनों के लिए मेडिकल सर्टिफिकेट जमा किए और बाकी दिनों की कोई चिकित्सा पुष्टि पेश नहीं की। विभाग ने उसे नोटिस देकर ट्रेनिंग दोबारा शुरू करने के निर्देश भी दिए, लेकिन उसने उनका पालन नहीं किया।

लगातार अनुपस्थिति के चलते उसे सस्पेंड कर दिया गया और पंजाब पुलिस नियमों के तहत विभागीय जांच शुरू की गई। जांच में उसके खिलाफ जानबूझकर गैर-मौजूद रहने के दो आरोप तय किए गए। विभाग ने जवाब देने के लिए 15 दिनों का समय दिया लेकिन याचिकाकर्त्ता ने कोई स्पष्टीकरण जमा नहीं किया। इसके बाद उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

चार साल बाद दायर अपील भी खारिज कर दी गई। इसके बाद उसने तत्कालीन ट्रिब्यूनल में याचिका दाखिल कर अपनी बर्खास्तगी को चुनौती दी और कहा कि उसकी गैर-मौजूदगी बीमारी के कारण थी तथा वह तांत्रिकों से इलाज करवा रही थी। मामला हाईकोर्ट में पहुंचा, जहां अदालत ने पाया कि याचिकाकर्त्ता दो बार ट्रेनिंग के दौरान अनुपस्थित रही और अनुपस्थिति की अधिकांश अवधि के लिए उसके पास कोई वैध मेडिकल रिकॉर्ड नहीं था।

हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि कारण बताओ नोटिस मिलने के बाद भी उसने कोई जवाब दाखिल नहीं किया जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह विभागीय कार्यवाही को गंभीरता से नहीं ले रही थी। अदालत ने कहा कि पंजाब पुलिस नियमों का सही और वैध रूप से पालन किया गया और ऐसी अनुपस्थिति को जानबूझकर की गई लापरवाही ही माना जा सकता है।

न्यायालय ने कहा कि यदि कोई कांस्टेबल ट्रेनिंग के समय ही अनुशासन का पालन नहीं करता और अपने व्यवहार से यह संकेत देता है कि वह भविष्य में एक सक्षम पुलिस अधिकारी नहीं बन सकेगा तो उसे कानून के अनुसार सेवा से हटाया जा सकता है। कोर्ट ने सहानुभूति के आधार पर पुनर्विचार की उसकी दलील भी सिरे से खारिज कर दी और कहा कि सहानुभूति किसी वैध अनुशासनात्मक कार्रवाई को खत्म नहीं कर सकती।