मिस्र की 4600 साल पुरानी मिस्ट्री सॉल्व, वैज्ञानिकों ने खोजा वो तरीका जिसने बनाए विशाल पिरामिड

दशकों से मिस्र के पिरामिड कैसे बने, यह वैज्ञानिक का एक बहुत बड़ा रहस्य बना हुआ है. अब तक माना जाता था कि पिरामिड बनाने के लिए मजदूर लंबे रैंप का इस्तेमाल करते थे और केवल शारीरिक ताकत और साधारण औजारों का ही इस्तेमाल होता था. खास तौर पर एक बहुत ही हाईटेक हाइड्रोलिक प्रणाली ने इसमें मुख्स भूमिका निभाई थी. यह शोध फ्रांस के सिविल इंजीनियर जेवियर लैंड्रेउ ने किया है और यह PLOS ONE नाम की वैज्ञानिक पत्रिका में छपा है. शोध में सबूत दिया गया है पिरामिड बनाने के लिए बड़े पत्थरों के ब्लॉकों को ऊपर उठाने के लिए क्या इस्तेमाल होता था.

शोध में क्या बताया गया?
वैज्ञानिकों ने बताया कि पिरामिड बनाने के लिए बड़े पत्थर के ब्लॉकों को ऊपर उठाने के लिए हाइड्रोलिक लिफ्टों का इस्तेमाल किया गया था. यह बाहरी रैंप या क्रेन पर निर्भर रहने के बजाय बनाने वाले लोगों ने एक अलग तरीका अपनाया होगा. उन्होंने ऊर्ध्वाधर गड्ढों और कमरों (Vertical Shafts and Chambers) की प्रणाली बनाई होगी. इसे चलाने के लिए उन्होंने रेगिस्तान में आने वाले बाढ़ के पानी का इस्तेमाल किया होगा.

पिरामिड का हाईटेक सीक्रेट
यह पूरा सिद्धांत साककारा में मौजूद सीढ़ीनुमा पिरामिड पर आधारित है. यह मिस्र की पहली बहुत बड़ी इमारत थी जिसे लगभग 4,600 साल पहले राजा फिरौन जोसर के समय में बनाया गया था. इस पिरामिड की अंदरूनी बनावट ने लंबे समय से वैज्ञानिकों को उलझन में डाल रखा है. इसके गहरे गड्ढे, बंद कमरे और बहुत बड़े भूमिगत हिस्से को सिर्फ की वास्तुकला मानना मश्किल था.

वैज्ञानिकों ने क्या खोज की?
वैज्ञानिकों ने साककरा के पठार पर कुछ ऐसी चीजें खोजी हैं जो आपस में जुड़ी हुई हैं जो बताती हैं कि वहां बड़े पैमाने पर पानी को मैनेज करने का एक सिस्टम था. इसका सबसे मुख्य हिस्सा है गिसर-अल-मुदिर जो पिरामिड के पश्चिम में बना एक बहुत बड़ा आयातरार पत्थरों का घेरा है. इस लंबे समय तक लोग कोई धार्मिक ढांचा मानते रहे. लेकिन, अब इसे एक चेक डैम माना जाता है.

क्यों बनाया गया चेक डैम?
वैज्ञानिकों के अनुसार, इसे मौसमी धाराओं के तल, अबुसिर वाडी से रेगिस्तानी पानी इकट्ठा करने और उसकी गति धीमी करने के लिए बनाया गया होगा. लैंड्रो की टीम ने सैटेलाइट की तस्वीरें, ऊंचाई के डेटा और जमीनी सर्वेक्षण का इस्तेमाल करके उस इलाके के पानी के बहाव को दोबारा बनाया. उनकी नतीजों से पता चला कि अचानक आई बाढ़ का पानी इंसानों द्वारा बनाए गए चैनलों की श्रृंखला में मोड़ा जाता था.

पत्थरों को उठाने की तकनीक?
शोधकर्ताओं का अंदाजा है कि यह हाइ़ड्रोलिक प्रणाली लगभग 300 किलो वजन पत्थरों को उठा सकती थी. यह वजन जोसर के स्टेप पिरामिड में इस्तेमाल हुए पत्थर के ब्लॉकों के औसत वजन के बराबर है. इस पिरामिड के निर्माण में 20 लाख से ज्यादा ब्लॉक्स इस्तेमाल किए गए थे. अध्ययन में बताया गया कि, मिस्र के बाद अल-कफारा बांध में भी इसी तरह की बांध निर्माण तकनीकें देखी गई हैं जो उसी समय की हैं जब पिरामिड बना था.