एक कंपनी ने आसिम मुनीर को ट्रंप की गोद में बिठा दिया! इस सौदेबाजी से शर्मसार होंगे पाकिस्तानी

दुनिया तो यही समझ रही है कि पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर ईरान और अमेरिका के बीच बड़ी ईमानदारी से सुलह कराने की कोशिशों में जुटे हैं. कभी वर्दी में दिखते हैं, कभी सूट-बूट में. तेहरान जाते हैं, इस्लामाबाद एयरपोर्ट पर भागते हैं. पाक पीएम शहबाज शरीफ भी अपने हर बयान में उनकी तारीफ करते नहीं अघाते. हालांकि, पाकस्तानी यह पढ़कर शर्मसार हो जाएंगे कि यह निकटता या गर्मजोशी भी पाकिस्तान ने ‘खरीदी’ है. अब आप भी जान लीजिए कि मुनीर अचानक बिजनेस माइंडेड राष्ट्रपति ट्रंप के दुलारे कैसे बन गए? असल में, इसके पीछे एक कंपनी काम कर रही थी.

हां, टेक्सास की इस कंपनी का नाम ‘लिंडन स्ट्रैटजीज’ है. इसी ने लॉबीइंग कर पाकिस्तान के लिए ऐसा माहौल पैदा किया कि मुनीर और शहबाज की जोड़ी मध्यस्थ के तौर पर आगे आ गई. असलियत यह है कि अमेरिका के करीब पहुंचने के लिए पाकिस्तान ने कई साल से इस कंपनी की ‘सेवा’ ले रखी थी. इसे आप लॉबीइंग कह सकते हैं. ईरान युद्ध शुरू हुआ, तो बैकचैनल और सेना में अपने संबंधों का हवाला देते हुए पाकिस्तान के आर्मी चीफ आगे बढ़कर उछलने लगे.

दूसरे राउंड की बातचीत टल गई है, लेकिन ट्रंप यही कह रहे हैं आसिम मुनीर ने कहा है कि सब ठीक हो जाएगा. असल में, आतंकिस्तान मुल्क के प्रति अमेरिकी प्रेसिडेंट का नजरिया बदलने के लिए टेक्सास की यह कंपनी काफी समय से पर्दे के पीछे लॉबीइंग कर रही थी. इसी कंपनी ने वॉशिंगटन में पाकिस्तान के घनिष्ठ संबंध तैयार कराए. ट्रंप के मुंह से पाकिस्तान का नाम सुनकर जो लोग उछल रहे हैं, वह नहीं जानते कि ये रातोंरात नहीं हुआ और इसके लिए कुछ देना भी पड़ा है.

पर्दे के पीछे एक कंपनी ने कराई सेटिंग
ह्यूस्टन की ‘लिंडन स्ट्रैटजीज’ लगातार बैकचैनल से प्रयास कर रही थी. इसके चेयरमैन स्टीफन पेन हैं. अब पता चल रहा है कि इसी कंपनी की मदद से मुनीर और शहबाज पिछले साल ट्रंप से मिल पाए थे. अप्रैल में, जब इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत शुरू हुई, तो कई पाकिस्तानी गर्व करने लगे. इसमें भी खेल हुआ, यह जानकर उन्हें थोड़ी शर्मिंदगी तो जरूर होगी. सवाल यह भी पूछा जाना चाहिए कि ट्रंप से करीबी दिखाने के लिए मुनीर और शहबाज ने उस कंपनी को कितने पैसे दिए?

मुनीर और शहबाज ने की ‘सौदेबाजी’?
इससे पहले, मुनीर और ट्रंप जब व्हाइट हाउस में मिले थे, तब काफी चर्चा हुई थी. यह मुलाकात अपने आप में अलग थी. इससे एक बात साफ हो गई थी कि व्हाइट हाउस के भीतर तक पहुंच दिलाने में पाकिस्तान की मदद कोई और कर रहा है. अब पता चला है कि पेन ने ही शहबाज शरीफ से कहा था कि वह ट्रंप को खुश करने के लिए ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ के लिए उन्हें नामित कर दें. यह सब एक रणनीति का हिस्सा था. ट्रंप खुश हुए और तब से शरीफ-शरीफ, मुनीर-मुनीर करने लगे. फिर से ‘धुरंधर’ का वो डायलॉग दोहरा लीजिए.

पाकिस्तान के लिए गर्व नहीं, शर्म की बात
ऐसा लगता है कि इस कनेक्शन के कूटनीतिक लाभ अब मिल रहे हैं. पिछले साल तो कंपनी ने ट्रंप से ‘कत्था-चूना’ लगाया, उसका फल ईरान युद्ध में पाकिस्तान को दिया जा रहा है. अब दुनिया को भी समझ में आ रहा है कि पाकिस्तान को मध्यस्थ की कुर्सी किस शर्त पर मिली है? एक हाथ से तुम खर्च करो, दूसरे हाथ से हम राग अलापेंगे.