दूर खड़े RAW एजेंट ने खोले पूरे इंडियन मुजाहिद्दीन के नेटवर्क के धागे

नई दिल्‍ली. खामोश रात, ढाका एयरपोर्ट का शोर और एक संदिग्ध पासपोर्ट. यही वो पल था जिसने भारत के सबसे खतरनाक आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन (IM) के अंत की पटकथा लिख दी. यह कहानी किसी बॉलीवुड थ्रिलर से कम नहीं है, जहां दुश्मन की एक छोटी सी गलती भारतीय जासूसों के लिए सबसे बड़ा हथियार बन गई.

जब पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI ने अपने प्यादे जिया-उर-रहमान उर्फ वकास को नेपाल के रास्ते पाकिस्तान भेजने की साजिश रची तो उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ की नजरें उन पर जमी हैं. बिना एंट्री स्टैंप वाले पासपोर्ट ने एक ऐसी हलचल पैदा की जिसने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को वह मौका दे दिया जिसका उन्हें सालों से इंतजार था. अंधेरी गलियों से लेकर अंतरराष्ट्रीय सरहदों तक फैले इस जासूसी के खेल में भारतीय जासूसों ने न केवल आतंकियों को दबोचा बल्कि उनके ही जाल में उन्हें उलझाकर पूरे नेटवर्क को नेस्तनाबूद कर दिया. यह दास्तां है उस धैर्य, चालाकी और जज्बे की जिसने भारत की सरजमीं को दहलाने वालों को उनकी औकात दिखा दी.

‘शिकारी’ खुद बन गया ‘चारा’
अप्रैल 2014 की वह घटना भारतीय खुफिया इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है. ढाका एयरपोर्ट पर जब वकास के पासपोर्ट पर सवाल उठे तो वहां मौजूद रॉ के एक अधिकारी ने बिजली की तेजी से उसकी तस्वीर खींच ली. यह तस्वीर दिल्ली मुख्यालय पहुंची और वकास की पहचान उजागर हो गई. सुरक्षा एजेंसियों ने बिना शोर मचाए एक अत्यंत गुप्त ऑपरेशन चलाया. वकास को बांग्लादेश से चुपचाप भारत लाया गया. हिरासत में आने के बाद वकास को पता भी नहीं चला कि वह अब भारतीय एजेंसियों के हाथों की कठपुतली बन चुका है. एजेंसियों ने उसे गिरफ्तार दिखाने के बजाय चारे के रूप में इस्तेमाल करने का फैसला किया. वकास को निर्देश दिया गया कि वह अपने हैंडलर तहसीन अख्तर उर्फ मोनू से ऑनलाइन चैटिंग जारी रखे ताकि किसी को शक न हो.

नेपाल की सरहद और वह आखिरी मुलाकात
जासूसी का असली खेल तब शुरू हुआ जब वकास ने तहसीन को नेपाल में आमने-सामने मिलने के लिए राजी कर लिया. भारतीय खुफिया एजेंसियों ने इस ऑपरेशन में गजब का धैर्य दिखाया. तहसीन को पकड़ने के लिए नेपाल के उस मीटिंग स्पॉट को चारों तरफ से घेर लिया गया. जैसे ही तहसीन वहां पहुंचा, भारतीय जासूसों ने स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलकर उसे दबोच लिया. इसके बाद उसे चुपचाप भारत की सीमा में धकेला गया और आधिकारिक तौर पर गिरफ्तार कर लिया गया. यह ऑपरेशन जासूसी के ‘टेक्स्टबुक’ उदाहरण के रूप में जाना जाता है.

यूनानी डॉक्टर बने यासिन भटकल का अंत
इससे पहले अगस्त 2013 में सुरक्षा एजेंसियों ने आईएम के संस्थापक यासिन भटकल को पकड़कर संगठन की रीढ़ पहले ही कमजोर कर दी थी. यासिन नेपाल के पोखरा में एक ‘यूनानी डॉक्टर’ बनकर रह रहा था. वह केवल आतंकी हमलों की साजिश रचने या उन्हें अंजाम देने के लिए ही भारत में प्रवेश करता था. सुरक्षा एजेंसियों ने महीनों तक यासिन की हर हरकत पर नजर रखी. जासूसों ने उसके छिपने के ठिकाने की पहचान की और अंततः उसे उसके साथी असदुल्ला अख्तर उर्फ हड्डी के साथ गिरफ्तार कर लिया. यासिन 200 से अधिक निर्दोष लोगों की मौत का जिम्मेदार था. उसका पकड़ा जाना आईएम के लिए सबसे घातक प्रहार था.

क्यों सफल रहे ये ऑपरेशंस?
इन ऑपरेशंस की सफलता के पीछे तीन मुख्य कारण थे: धैर्य, समन्वय और तकनीकी महारत. भारतीय एजेंसियों ने जल्दबाजी में गिरफ्तारी करने के बजाय नेटवर्क की गहराई तक जाने का विकल्प चुना. आईएसआई की एक छोटी सी प्रशासनिक चूक (पासपोर्ट स्टैंप न होना) को एक बड़े इंटेलिजेंस ब्रेकथ्रू में बदलना भारतीय जासूसों की तीक्ष्ण बुद्धि को दर्शाता है. आज इंडियन मुजाहिदीन का नामोनिशान मिट चुका है, तो इसका श्रेय उन गुमनाम नायकों को जाता है जिन्होंने सरहदों के पार जाकर दुश्मन के हर चाल को मात दी. इन जासूसी कारनामों ने साबित कर दिया कि जब देश की सुरक्षा की बात आती है, तो भारतीय एजेंसियां पाताल से भी गुनहगारों को खींच लाने का दम रखती हैं.