Justice ujjal bhuyan on transfer: सुप्रीम कोर्ट के जज उज्जल भुइयां ने जजों के तबादले को लेकर कॉलेजियम सिस्टम पर खुलकर नाराजगी जताई है. उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा अब बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से ही पैदा हो रहा है. उन्होंने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन के तबादले के मामले का जिक्र किया है. यह तबादला केंद्र सरकार के सुझाव पर किया गया. पहले उन्हें छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट भेजने की सिफारिश हुई थी. बाद में सरकार के कहने पर फैसला बदल दिया गया और उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया. जस्टिस भुइयां ने इसे कार्यपालिका का दखल बताया और कहा कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है.
उन्होंने बिना नाम लिए सवाल उठाया कि किसी जज को सिर्फ इसलिए एक हाईकोर्ट से दूसरे हाईकोर्ट क्यों भेजा जाए, क्योंकि उसने सरकार के खिलाफ कोई असुविधाजनक आदेश दिया था. उन्होंने कहा कि यह न्यायपालिका की गरिमा और स्वतंत्रता दोनों को चोट पहुंचाता है. जस्टिस भुइयां ने कहा कि जब कॉलेजियम अपने ही प्रस्ताव में लिखता है कि सरकार के कहने पर तबादला बदला गया, तो इससे कॉलेजियम सिस्टम पर सवाल खड़े होते हैं. इससे साफ दिखता है कि कार्यपालिका कॉलेजियम के फैसलों को प्रभावित कर रही है.
सरकार का जजों के तबादले में कोई रोल नहीं होना चाहिए
जस्टिस भुइयां ने याद दिलाया कि मई में जस्टिस अतुल श्रीधरन की अगुवाई वाली बेंच ने बीजेपी मंत्री विजय शाह के खिलाफ संज्ञान लिया था. मंत्री ने कर्नल सोफिया कुरैशी पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी. इसके बाद उनका तबादला होना कई लोगों को सजा जैसा लगा. कई कानूनी विशेषज्ञों ने भी इसे सरकार को नापसंद फैसलों का बदला बताया है. उन्होंने कहा कि सरकार का जजों के तबादले में कोई रोल नहीं होना चाहिए. यह पूरी तरह न्यायपालिका का काम है. अगर सरकार के कहने पर तबादले हो रहे हैं, तो इसका मतलब है कि न्यायपालिका की आजादी से समझौता किया जा रहा है.
यह बातें उन्होंने पुणे के आईएलएस लॉ कॉलेज में दिए गए एक व्याख्यान में कहीं. उन्होंने कहा कि कॉलेजियम सिस्टम भले ही सबसे अच्छा न हो, लेकिन उसकी ईमानदारी बनाए रखना बहुत जरूरी है. उन्होंने कहा कि जज संविधान की शपथ लेते हैं. उन्हें बिना डर और बिना किसी पक्षपात के काम करना होता है. अगर जजों की साख ही खत्म हो गई, तो अदालतें तो रहेंगी, मामले भी चलेंगे, लेकिन न्याय का असली मतलब खो जाएगा. उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के पास न तो पैसा है और न ही ताकत. उसके पास सिर्फ लोगों का भरोसा है. अगर यह भरोसा टूट गया, तो कुछ भी नहीं बचेगा.
जज भी इंसान होते हैं
जस्टिस भुइयां ने कहा कि संविधानिक नैतिकता लोकतंत्र की आत्मा है. इसका मतलब है कि देश कानून से चले, लोगों की मर्जी या ताकत से नहीं. उन्होंने माना कि जज भी इंसान होते हैं और उनके अपने विचार हो सकते हैं. लेकिन इन विचारों का असर उनके फैसलों पर नहीं पड़ना चाहिए. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर किसी केस का नतीजा पहले से तय लगने लगे, तो यह न्यायपालिका और लोकतंत्र दोनों के लिए खतरनाक होगा. उन्होंने कहा कि कॉलेजियम सिस्टम में सुधार की गुंजाइश है. लेकिन सबसे पहले इसकी स्वतंत्रता और ईमानदारी को हर हाल में बचाए रखना होगा.