पिघलती बर्फ और डगमगाती धरती! भयंकर गर्मी के कारण अपनी धुरी से खिसक रही है पृथ्वी, वैज्ञानिकों ने दी बड़ी चेतावनी

Earth Axis Shifting Due To Climate Change: ग्लोबल वार्मिंग और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी को लेकर अब तक आपने सिर्फ मौसम बदलने या समंदर का जलस्तर बढ़ने की खबरें सुनी होंगी. लेकिन अब विज्ञान की दुनिया से एक ऐसी खौफनाक खबर आई है, जिसे सुनकर आपके पैरों तले की जमीन खिसक जाएगी. इंसानी गतिविधियों और अत्यधिक गर्मी के कारण पृथ्वी पर जमी बर्फ इतनी तेजी से पिघल रही है कि हमारी धरती अपनी धुरी (Axis) से खिसक रही है. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) और दुनिया भर के वैज्ञानिकों की नई रिसर्च में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि ध्रुवों (Polar Regions) पर अरबों टन बर्फ पिघलने के कारण हमारी पृथ्वी का संतुलन बिगड़ रहा है, जिससे इसके घूमने (Rotation) का तरीका धीरे-धीरे बदल रहा है.

क्या है पूरा मामला? कैसे डगमगा रही है हमारी पृथ्वी?
इस पूरे संकट को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के वजन के संतुलन (Redistribution of Mass) का हवाला दिया है. पृथ्वी लट्टू की तरह अपनी धुरी पर घूमती है. जब एक लट्टू के किसी एक हिस्से पर वजन बढ़ा या घटा दिया जाए, तो वह डगमगाने लगता है. ठीक ऐसा ही हमारी धरती के साथ हो रहा है. जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की वजह से उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों (ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका) पर जमी सदियों पुरानी ग्लेशियर की बर्फ पानी बनकर बह रही है. यह पानी ध्रुवों से निकलकर भूमध्य रेखा (Equator) यानी समंदर के बाकी हिस्सों में फैल रहा है. वजन का यह अचानक हुआ बदलाव पृथ्वी को अपनी धुरी से हटाने के लिए मजबूर कर रहा है.

1993 के बाद से आ गया बड़ा बदलाव: खिसक रहे ध्रुव
वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह बदलाव आज या कल में नहीं हुआ, बल्कि पिछले तीन दशकों में इसकी रफ्तार बहुत तेज हो गई है. सैटेलाइट डेटा और रिसर्च के अनुसार, साल 1995 से पहले पृथ्वी के भौगोलिक ध्रुव (Geographic Poles) दक्षिण की तरफ बढ़ रहे थे. लेकिन बर्फ पिघलने की रफ्तार जैसे ही बढ़ी, ध्रुवों ने अपनी दिशा बदल दी और वे पूर्व की तरफ खिसकने लगे. 1995 से 2020 के बीच ध्रुवों के खिसकने की औसत रफ्तार 1981 से 1995 के मुकाबले लगभग 17 गुना ज्यादा हो गई है. धरती अब हर साल कुछ सेंटीमीटर अपनी धुरी से दूर जा रही है.

क्या बढ़ जाएगी पृथ्वी के घूमने की रफ्तार
भौतिकी (Physics) के ‘कोणीय संवेग संरक्षण’ (Conservation of Angular Momentum) नियम के अनुसार, जब ध्रुवों की बर्फ पिघलकर भूमध्य रेखा के पास जमा होती है, तो पृथ्वी के घूमने की रफ्तार पर असर पड़ता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि इसी रफ्तार से वैश्विक तापमान बढ़ता रहा और बर्फ पिघलती रही, तो पृथ्वी के घूमने की गति में सूक्ष्म बदलाव आएगा. इसका सीधा असर हमारे ‘दिन की लंबाई’ पर पड़ेगा. हालांकि, यह बदलाव सेकेंड के कुछ लाखवें हिस्से के बराबर होगा, लेकिन भविष्य में यह हमारे बेहद संवेदनशील नेविगेशन सिस्टम (GPS) और सैटेलाइट्स की टाइमिंग को पूरी तरह बिगाड़ सकता है.

वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी
स्विट्जरलैंड की ज्यूरिख यूनिवर्सिटी और नासा के वैज्ञानिकों ने इस रिसर्च को पूरी मानवता के लिए एक बड़ा ‘वेक-अप कॉल’ (चेतावनी) बताया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसानों ने न सिर्फ हवा और पानी को प्रदूषित किया है, बल्कि अपनी हरकतों से पूरी पृथ्वी के भौतिक संतुलन को ही हिलाकर रख दिया है. अगर समय रहते कार्बन उत्सर्जन पर लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाली पीढ़ियों को इसके बेहद गंभीर और अप्रत्याशित परिणाम भुगतने होंगे.