अक्सर सरकारी कर्मचारी रिटायरमेंट के बाद भी अपने हक और लाभ पाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ते रहते हैं. लेकिन इस बार एक मामला ऐसा सामने आया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने साफ संदेश दे दिया कि देरी से किया गया दावा, न्याय से वंचित कर देता है. अक्सर सरकारी कर्मचारी रिटायरमेंट के बाद भी अपने हक और लाभ पाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ते रहते हैं. लेकिन इस बार एक मामला ऐसा सामने आया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने साफ संदेश दे दिया कि देरी से किया गया दावा, न्याय से वंचित कर देता है. केरल एक्साइज डिपार्टमेंट के पूर्व प्रिवेंटिव ऑफिसर कृष्णन को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. कोर्ट ने कहा कि रिटायरमेंट के 11 साल बाद प्रमोशन और एरियर की मांग करना कानूनन मान्य नहीं है.
कृष्णन ने जनवरी 2008 में रिटायर होने के बाद पाया कि उनके कई जूनियर कर्मचारियों को प्रमोशन और बकाया वेतन भत्ते मिले, लेकिन उन्हें नहीं. उन्होंने विभाग को कई पत्र लिखकर शिकायत की. जब कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो उन्होंने 2019 में यानी रिटायरमेंट के 11 साल बाद केरल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल में याचिका दायर की. ट्रिब्यूनल ने 2024 में उनके पक्ष में फैसला सुनाया और हाईकोर्ट ने भी 2025 में इसे बरकरार रखा. लेकिन केरल सरकार इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ले गई.
सुप्रीम कोर्ट ने 19 अगस्त 2025 को सुनवाई करते हुए कहा कि मामला बेहद पुराना है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बार-बार रिप्रजेंटेशन देने से पुराने दावे नए नहीं हो जाते.
कोर्ट ने पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कानून आलसी और देरी करने वाले दावेदारों को राहत नहीं देता. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी कर्मचारी को लगता है कि उसके साथ अन्याय हुआ है, तो उसे तुरंत कानूनी कदम उठाने चाहिए, न कि सालों इंतजार करना चाहिए.
एक्सपर्ट्स की राय
कानूनी एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के लिए एक बड़ा सबक है. दिल्ली हाईकोर्ट के एडवोकेट तुषार नायर का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने फिर से साफ किया कि रिपीटेड रिप्रजेंटेशन से डेड केस को जीवित नहीं किया जा सकता.